ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसभी कर्म है वह करता । कर्म बंधनमें नहीं आता ।
जैसे पानीमें नहीं भीगता । पद्मपत्र ॥ ५० ॥
कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिंद्रियैरपि ।
योगिनः कर्म कुर्वंति संगं त्यक्त्वाऽत्मशुद्धये ॥ ११ ॥
कर्मकी विविधता-विवेचन—
जो बुद्धिकी भाषा नहीं जानता । मनमें अंकुर नहीं फूटता ।
ऐसा व्यापार जो तनसे होता । वह शरीर कर्म ॥ ५१ ॥
इसीको स्पष्ट रूपसे कहता । जैसा बालकका कर्म है होता ।
योगीका कर्म वैसे ही रहता । केवल तनसे ॥ ५२ ॥
जब पंच भौतिक तन । रहता है निद्रामें लीन ।
कार्य करता तब मन । स्वप्न रूपमें ॥ ५३ ॥
आश्चर्य देख तू धनुर्धर । कितना है वासना विस्तार ।
देहको नहीं होता जागर । भोगता सुख दुःख ॥ ५४ ॥
इंद्रियोंका स्पर्श भी न करता । ऐसा व्यापार जो होता रहता ।
यह केवल कर्म कहलाता । मनका ही ॥ ५५ ॥
वह कर्म भी योगी करता । किंतु उससे बद्ध न होता ।
उसका साथ छूटा रहता । अहंकारसे ॥ ५६ ॥
जैसे होता है भ्रम हत । पिशाच स्पर्शसे जो चित्त ।
करता इंद्रियां चेष्टित । विकल रूपसे ॥ ५७ ॥
रूप भी है वह देखता । कानसे भी वह सुनता ।
शब्द भी है वह बोलता । पर बेभान हो ॥ ५८ ॥
यह जो है बिन प्रयोजन । जो कुछ वह करता जान ।
वह केवल कर्म है मान । इंद्रियोंका ॥ ५९ ॥
केवल इंद्रियोंसे या शरीर मन बुद्धिसे ।
आत्म-शुद्ध्यर्थ ही योगी करे कर्म असंग हो ॥ ११ ॥
ज्ञानेश्वरी ११८