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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 209

सबके जीवनमें जो बसता । किंतु किसीका कोई न होता ।
विश्व बनता औ' उजाड़ता । उसका कुछ नहीं ॥ ७९ ॥
नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।
अज्ञानेनाऽवृतंज्ञानं तेन मुह्यंति जन्तवः ॥ १५ ॥
अशेष पाप पुण्य उसके । समीप रहते हैं विश्वके ।
किंतु साक्षी न होता उसके । अन्य बात क्या ॥ ८० ॥
वह रहता मूर्तिके साथ । मूर्ति रूप होकर सतत ।
किंतु न मलता रूप अमूर्त्त । उस पुरुषका ॥ ८१ ॥
पालता वह सृजता संहारता । चराचर सब है यही बोलता !
सुन तू यह अज्ञान ही है पार्थ । सबका यहां ॥ ८२ ॥
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः ।
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् ॥ १६ ॥
अज्ञान यह समूल टूटता । भ्रांतिका तम भी है दूर होता ।
फिर अकर्तृत्व प्रकट होता । ईश्वरका ॥ ८३ ॥
ईश्वर है यहां एक अकर्ता । तब चित्त यदि ऐसा मानता ।
तब वही मैं यह स्वभावता । आदिसे हूँ ॥ ८४ ॥
होता जब ऐसा विवेक चित्तमें । उसको भेद कैसा त्रिभुवनमें ।
देखता अपने ही अनुभवमें । विश्व है मुक्त ॥ ८५ ॥
सूर्योदय होता पूर्व दिशामें । प्रकाश होता दश दिशामें ।
उस समय किसी दिशामें । तम न रहता ॥ ८६ ॥
किसीका भी न लें पाप वैसे ही पुण्य भी प्रभु ।
अज्ञानसे ढका ज्ञान इससे जीव मोहित ॥ १५ ॥
हुवा अज्ञानका नाश जिनका आत्म ज्ञानसे ।
स्वच्छ दीखे पर-ब्रह्म मानो सूर्य-प्रकाश है ॥ १६ ॥
१४१ कर्म-संन्यास योग