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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 213

विषयोंमें वैसा कुछ सुख है । कहने जैसा भी कुछ नहीं है ।
विद्युल्लतासे जैसे न होता है । प्रकाश जगतमें ॥ १३ ॥
बात वर्षा आतपमें यदि साया । करती है घने बादलकी काया ।
व्यर्थ है तब बांधना धनंजय । महलादिक ॥ १४ ॥
विषयोंको सुख कहना । व्यर्थकी बात है कहना ।
विषकंदको ही कहना । जैसा अति-मधुर ॥ १५ ॥
कहते जैसे भूमिपुत्रको मंगल । अथवा मृगजलको कहते जल ।
विषयानुभव कहलाता गरल । वैसे ही व्यर्थ ॥ १६ ॥
जाने वे पार्थ सब ये बोल । सर्प फनकी साया शीतल ।
होगी कह कहाँ तक निश्चल । मूशकको ॥ १७॥
आमिष ग्रास जैसा अर्जुन । न खाये तब तक भला मीन ।
वैसा विषय संग संपूर्ण । जान तू निश्चित ॥ १८ ॥
विरक्तियोंकी जो दृष्टि । देखती इसे किरीटी ।
पांडुरोगकी है पुष्टि । वैसे ही ॥ १९॥
तभी विषय भोगमें सुख । जानो है वह साद्यंत ही दुःख ।
किंतु क्या करेंगे जन मूर्ख । भोगके न थकते ॥ १२० ॥
न जानते अंतरंग बेचारे । इसीलिये सब सेवन करे ।
कहो पूय 'पंकके है जो कीरे । क्या करेंगे घृणा ॥ २१ ॥
दुख ही उन दुखितोंका घर । है विषय कर्दम ही दुर्दर ।
भोग-जल जलके जलचर । छोड़ें कैसे ॥ २२ ॥
और जो ये दुःख योनी हैं । सब निरर्थक होती हैं ।
यदि जीव सब विरत हैं । विषयोंमें ॥ २३ ॥
वैसे ही गर्भवासका कष्ट । या जन्म-मरणादि संकट ।
• अविश्रांत रूप यह बाट । चलेगा कौन ॥ २४ ॥
विषयी यदि विषय छोड़ेंगे । महादोष ये जो कहाँ रहेंगे ।
संसारादि नाम ये व्यर्थ होंगे । इस जगतके ॥ २५ ॥
तभी किया सुख बुद्धिसे स्वीकार । विषय सुखका है जीवन भर ।
कर दिखाया मिथ्याको सच कर । अविद्याजात ॥ २६ ॥
१४५ कर्म-संन्यासयोग
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