ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 220, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ें६
आत्म-संयमयोग
छठे अध्यायकी भूमिका—
राजासे कहता संजय । सुनिये अब अभिप्राय ।
श्रीकृष्ण कहता है वाक्य । योग-रूप ॥ १ ॥
ब्रह्म-रसका सहज पारण । देता अर्जुनको श्रीनारायण ।
अतिथिरूप पहुँचे उसी क्षण । हम भी वहाँ ॥ २ ॥
न जाने देवकी महत्ता । तृषित जब पानी पीता ।
तब स्वाद लेके देखता । अमृत है यह ॥ ३ ॥
ऐसे हमें तुम्हें हुआ है । अनायास तत्व मिला है ।
किंतु धृतराष्ट्र बोला है । यह न पूछा हमने ॥ ४ ॥
इस बोलसे तब संजय । समझा है राजाका हृदय ।
हुआ है इन्हें मोह संचय । स्व कुमारोंका ॥ ५ ॥
सोचकर वह हँसा मनमें । बुद्धि नासी है बूढेकी मोहमें ।
योग जो अमृतोपम क्षणमें । चला है अब ॥ ६ ॥
किंतु इन्हें यह कैसा भायेगा । जन्मांध भला कैसा देखेगा ।
यह सब इन्हें कौन कहेगा । सोचता संजय ॥ ७ ॥
होकर वह प्रमुदित । देकर अपना सुचित्त ।
श्रवण की हुई जो बात । नरनारायणमें ॥ ८ ॥
अमृतानंदकी उस तृप्तिसे । साभिप्राय अंतःकरणसे ।
कहेगा वह अत्यादरसे । धृतराष्ट्रको ॥ ९ ॥