सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 218, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 218

अगले अध्यायकी भूमिका रूप योग-मार्ग-दर्शन-
अर्जुन कहता तब देव । पर चित्त लक्षणका ठाव ।
जान लिया तूने भला भाव । मनका मेरा ॥ ६३ ॥
स विवरण मेरा जो पूछना । देव ! उसीको पहले कहना ।
कहा जो उसीको फिर कहना । स्पष्ट रूपसे ॥ ६४ ॥
वैसे तेरे कहनेके अनुसार । पगदंडीसी है यह पानी पर ।
ऐसा सरल पथ जो शांगंधर । कहा अब ॥ ६५ ॥
सांख्यसे है यह सरल । हम जैसोंको जो दुर्बल ।
समझनेमें कुछ काल । सहना पडे ॥ ६६ ॥
इसीलिये मधुसूदन । मेरा है यह निवेदन ।
इसीका सविस्तर कथन । करना साद्यंत ॥ ६७ ॥
श्रीकृष्ण कहते हैं ऐसा । तुझे लगा यह भलासा ।
कहता हूँ सुखसे वैसा । सुनो अब ॥ ६८ ॥
अर्जुन तू यदि सुनेगा । सुनकर वैसा चलेगा ।
तब कहनेमें करूंगा । क्यों संकोच ॥ ६९ ॥
चित्त है जो पहले ही माताका । निमित्त है वहां मन-मानेका ।
अब उस अद्भुत स्नेहका । करना ही क्या ॥ १७० ॥
कहना उसे कारुण्यकी वृष्टि । अथवा स्नेहकी नूतन सृष्टि ।
या वह थी हरिकी अनुग्रह दृष्टि । हरिही कहें ॥ ७१ ॥
वह थी क्या अमृतसे है ढली । या प्रेम रससे मस्त थी भली ।
पार्थ प्रेममें उल्झी पहली । जो छूटे ही ना ॥ ७२ ॥
करना इसका जितना वर्णन । टूटेगा उतना कथाका संधान ।
किंतु न होगा प्रभु स्नेहका ज्ञान । शब्दसे कभी ॥ ७३ ॥
इसमें है क्या आश्चर्य महान । नहीं जिसे अपना ही ज्ञान ।
करेगा कैसे वह आकलन । ईश्वरका भला ॥ ७४ ॥
अबतककी कृष्णवाणीकी ध्वनिसे । लगता पार्थ प्रेममें उलझनेसे ।
हरि कहता है मानों बलात्कारसे । सुनो बाबा ॥ ७५ ॥
ज्ञानेश्वरी १५०