ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसत्याकार वह परम । अक्षर है वह निःसीम ।
उस गांवके है निष्काम । अधिकारी जो ॥ ४६ ॥
महर्षियोंका जहाँ अधिकार । विरक्तोंका है अंश सुंदर ।
संशय रहितोंका निरंतर । फलरूप वह ॥ ४७ ॥
कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् ।
अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम् ॥ २६ ॥
मानवके निःसीम स्थितिका विवेचन—
विषयोंसे जिन्होंने खींचलिया । अपना चित्त आपही जीत लिया ।
निश्चित ही वहां लीन किया । सदैवही ॥ ४८ ॥
वह है परब्रह्म निर्वाण । आत्मज्ञानके ही कारण ।
उन्हींको तू पुरुष है जान । धनंजय ॥ ४९ ॥
वैसे वे कैसे हुए । देहमें ब्रह्मत्व पाए ।
संक्षेपमें हरि कहे । अर्जुनसे ॥ १५० ॥
स्पर्शान् कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः ।
प्राणापानौ समौकृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ॥ २७ ॥
वैराग्यका सहारा ले करके । तजे विषय अंतःकरणके ।
अंतर्मुख किये वेग मनके । शरीरमें ही ॥ ५१ ॥
सहज होती त्रिवेणीकी भेंट । पड़ती जहां भ्रूमध्यमें गांठ ।
वहां स्थिर करके जो दीठ । फेरते हैं ॥ ५२ ॥
छोडकर दक्षिण बाम । प्राणापान करके सम ।
चित्तको करने व्योम । मार्गी पार्थ ॥ ५३ ॥
जीतते काम औ' क्रोध यलसे चित्त रोधके ।
देखते ब्रह्म-निर्वाण ब्रह्मज्ञ सब ओरसे ॥ २६ ॥
विषयोंका बहिष्कार दृष्टि भ्रूमध्यमें स्थिर ।
नाकसे चलते श्वास प्राणापान करे सम ॥ २७ ॥
ज्ञानेश्वरी १४८