ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
असंभव है ऐसा होना । अशक्य है ऐसा सोचना ।
जगतमें ज्ञान समान । पवित्र नहीं कछु ॥ ७८ ॥
ज्ञान यहां अति उत्तम है । ऐसा क्या अन्य समान है ।
ज्ञान जो महा चैतन्य है । विश्वमें ॥ ७९ ॥
इस महातेज पे कसनेसे । निर्मल है यह सूर्य बिंबसे ।
समेटलें यह समेटनेसे । आकाशको भी ॥ १८० ॥
या तौलकर देखनेमें । इस पृथ्वीकी तुलनामें ।
यदि कुछ है तो विश्वमें । ज्ञान ही है ॥ ८१ ॥
बहुविध विचारनेसे । पुनः पुनः सोचनेसे ।
पवित्र यहां ज्ञानसे । ज्ञान ही है ॥ ८२ ॥
खोजनेसे अमृतका रस जैसा । अमृतमें ही मिलता है वैसा ।
ज्ञानके समान ज्ञान ही वैसा । जानना पार्थ ॥ ८३ ॥
इस पर है अब बोलना । व्यर्थका है समय बिताना ।
सच कहता सुन अर्जुन । जो कहा तूने ॥ ८४ ॥
उस ज्ञानको तब कैसे जानना । अर्जुनके मनमें यह पूछना ।
जानकर उसकी मनो कामना । कहा अच्युतने ॥ ८५ ॥
फिर कहता है किरीटी । चित दे सुन यह गोष्ठी ।
कहता हूँ ज्ञानकी भेटी । होगी कैसी ॥ ८६ ॥
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥ ३९ ॥
आत्म-सुखकी माधुरीसे । उकताता है विषयोंसे ।
इंद्रियोंका कभी उनसे । न होता भाव ॥ ८७ ॥
मनमें जो चाह नहीं धरता । प्रकृति कर्मको न स्वीकारता ।
सुख रूप होकरके रहता । श्रद्धा भोगमें ॥ ८८ ॥
श्रद्धालु ज्ञान पाता है संयमी नित्य सावध ।
ज्ञानसे शीघ्र पाता है शांति अंतिम पावन ॥ ३९ ॥
१२७ ज्ञान-कर्म-संन्यास योग
अध्याय ४: ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
ज्ञान है जो थिर वांछित । मिले वह उसे निश्चित ।
जिसमें होती अचुंबित । शांति-सुख ॥ ८९ ॥
हृदयमें जब ज्ञान होता । तब शांति-अंकुर फूटता ।
उससे विस्तार प्रकटता । आत्मबोधका ॥ ९० ॥
फिर जहां देखे वहां । सर्वत्र ही जहां तहां ।
न दीखे तीर है कहां । शांति सिंधुका ॥ ९१ ॥
ऐसा यह उत्तरोत्तर । ज्ञान बीजका है विस्तार ।
कहा है उसको अपार । धनंजय ॥ ९२ ॥
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥ ४० ॥
संदेह विनाशका घर है—
जिन प्राणियोंमें ज्ञानकी । चाह नहीं वह पानेकी ।
क्या कहें ऐसे जीवनकी । उससे भली मौत ॥ ९३ ॥
शून्य है जैसे गृह । या प्राण बिनु देह ।
है जीवित सम्मोह । ज्ञानके बिन ॥ ९४ ॥
हुआ नहीं प्राप्त वह ज्ञान । चाह करता पानेका मन ।
तब है आशा यह तू जान । पानेकी वह ॥ ९५ ॥
किंतु बात है कैसे ज्ञानकी । आस्था नहीं मनमें उसकी ।
तो पड़ा है संदेह रूपकी । अग्निमें वह ॥ ९६ ॥
जब अमृत भी नहीं भाता । ऐसा आस्वाद-स्वभाव होता ।
तभी जानना मरण आता । निकट सत्वर ॥ ९७ ॥
विषय सुखमें जो है रंगता । ज्ञानसे नित विमुख रहता ।
निश्चय ही संशयमें पड़ता । जानना वह ॥ ९८ ॥
न है ज्ञान न है श्रद्धा संशयीका विनाश है ।
दोनों ही लोकमें पार्थ न पाता सुख संशयी ॥ ४० ॥
ज्ञानेश्वरी १२८
डूबा यदि संशय सागरमें । नष्ट हुआ निश्चित जीवनमें ।
वंचित हुआ इह औ' परमें । सुखसे वह ॥ ९९ ॥
किसीको जब कालज्वर आता । वह जैसे शीतोष्ण न जानता ।
जैसे वह चांदनी औ' उष्णता । मानता एक-सा ॥ २०० ॥
वैसे वह जो सत औ' असत । अनुकूल औ' प्रतिकूल बात ।
नहीं जानता हित औ' अहित । संशयग्रस्त जो ॥ १ ॥
यह है दिवस औ' यह रात । जन्मांध न जानता यह बात ।
वैसे ही होता है संशयग्रस्त । मनमें सदा ॥ २ ॥
तभी संशयसे भयंकर । अन्य नहीं पाप कोई घोर ।
वह है विनाशका भंवर । प्राणियोंका ॥ ३ ॥
इस कारणसे तुझे तजना । पहले इस बातको जानना ।
ज्ञानाभावमें इसका रहना । जान निश्चित ॥ ४ ॥
पड़ता अज्ञानका गहरा अंधार । बढ़ता यह चितमें अपरंपार ।
जिससे है पथावरोध धनुर्धर । श्रद्धाका सदा ॥ ५ ॥
योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम् ।
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय ॥ ४१ ॥
ज्ञान खड्ग—
हियमें ही यह नहीं समाता । बुद्धि पर भी पर्दा डालता ।
जिससे संशयात्मक हो जाता । भुवन-त्रय ॥ ६ ॥
इतना है इसका बडप्पन । उसे जीवनका एक साधन ।
यदि करमें होता है महान । ज्ञान खड्ग ॥ ७ ॥
उस तीखे ज्ञान खड्गसे । मिटता यह मूल रूपसे ।
मल होता मनका जिससे । सदा निर्मूल ॥ ८ ॥
योगसे छांटके कर्म ज्ञानसे छिन्न संशय ।
जो सावधान आत्मामें उसे कर्म न बांधते ॥ ४१ ॥
(17) १२९ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग
तस्मादज्ञानसंभूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः ।
छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ॥ ४२ ॥
इस कारणसे तू पार्थ । नष्ट करके हृदयस्थ ।
संशय अब सर्वथा । ऊठ सत्वर ॥ ९ ॥
ऐसा सर्वज्ञोंका बाप । श्रीकृष्ण जो ज्ञानदीप ।
कहता वह सकृप । सुनो राजन् ॥ २१० ॥
कथा यह पूर्वापर । अर्जुन विचारकर ।
पूछेगा प्रश्न सत्वर । समयोचित ॥ ११ ॥
उस कथाकी संगति । भावकी है संपत्ति ।
उसकी है उन्नति । कहेगा हरि ॥ १२ ॥
उसकी उत्तमता पर । आठो रस हैं न्योच्छावर ।
वह है सज्जनोंका घर । आसरेका ॥ १३ ॥
प्रकट करेगा शांति-रस निर्मल । है वह महासागरसे भी खोल ।
मेरी देश-भाषाका अनमोल बोल । अर्थपूर्ण ॥ १४ ॥
बिंब दीखता है हथेली समान । प्रकाशमें ओछा होता त्रिभुवन ।
अनुभवना ऐसी व्याप्ति महान । शब्दार्थकी ॥ १५ ॥
अजी ! कामितार्थकी जो आशा । फलती कल्पवृक्षमें जैसा ।
बोल हैं अति व्यापक ऐसा । सुननाजी ॥ १६ ॥
रहने दो अब है क्या कहना । सर्वज्ञ जानते मनो कामना ।
फिर भी करता नम्र प्रार्थना । सुनना चित्त देके ॥ १७ ॥
यहां साहित्य तथा शांति । वैसे रेखा शब्द पद्धति ।
जैसे लावण्य गुण कुलवति । तथा पतिव्रता ॥ १८ ॥
पहले ही प्रिय है शक्कर । मिलती पथ्यके नाम पर ।
खाना या न ग्वाना बात फिर । रहती कहां ? ॥ १९ ॥
तभी हृदयका सारा अज्ञान-कृत संशय ।
ज्ञानके खड्गसे तोड ऊठ तू योग साधके ॥ ४२ ॥
ज्ञानेश्वरी १३०
मळयानिलय मंद सुगंध । उसमें मिला अमृतका स्वाद ।
उसके साथ हो सुस्वर नाद । दैव-गतिसे ॥ २२० ॥
स्पर्शसे सर्वांग शांत करता । माधुरीसे रसनाको नचाता ।
श्रवणेंद्रियसे है कहलाता । भला भला ॥ २१ ॥
वैसे है इस कथाका सुनना । कानोंका है प्रसन्न होना ।
संसार-दुःखका मूलसा होना । उच्चाटन ही ॥ २२ ॥
मंत्रसे यदि शत्रु मरता । कौन तलवार बांधता ।
दूध मधुसे रोग जाता । कौन पीवे नीम ॥ २३ ॥
वैसे मनको न मारते । इंद्रियोंको न सताते ।
अनायास ही मोक्ष पाते । श्रवण-मात्रसे ॥ २४ ॥
सुन सब हो प्रसन्न मन । करके गीतार्थका चिंतन ।
ज्ञानदेवका यह वचन । जो है निवृत्तिका दास ॥ २२५ ॥
गीता श्लोक ४२
ज्ञानेश्वरी ओवी २२५
५
कर्म-संन्यासयोग
अर्जुन उवाच
संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ।
यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥ १ ॥
पार्थका प्रश्न, कर्म-संन्यास या कर्म-योग—
पार्थ कहता फिर श्रीकृष्णसे । आपका बोलना यह भी कैसे ।
एक हो तो अंतःकरणसे । सोचे उसको ॥ १ ॥
पहले कहा संन्यास कर्मका । तूने किया था निरूपण् उसका ।
अब कहता अतिशय कर्मका । कैसे अनंत ॥ २ ॥
कैसी यह दो अर्थकी बात । हमारा अज्ञानियोंका चित्त ।
अपने आप कहे अनंत । समझेगा कैसे ॥ ३ ॥
सार तत्वको कहना । एक निष्ठासे बोलना ।
और क्या कहूं कहना । तुझसे अब ॥ ४ ॥
तभी कहा मैंने तुझसे । प्रभुजनोंसे विनयसे ।
परमार्थको द्वि-अर्थसे । कहना नहीं ॥ ५ ॥
अर्जुनने कहा
कहता कर्म-संन्यास वैसे ही योग भी कभी ।
दोनोंमें जो भला एक कह तू मुझ निश्चित ॥ १ ॥
हुआ जो वह जाने देना । अबकी यह सुलझा देना ।
इन दोनोंमें अब बताना । मार्ग उत्तम ॥ ६ ॥
अन्त है जिसका मंगल । निश्चित है जिसका फल ।
अनुष्ठानमें जो सकल । शुद्ध सहज ॥ ७ ॥
जिसमें न होता नींदका भंग । किंतु कटता प्रवास मारग ।
ऐसा सुखासनसा सुभग । तथा सरल ॥ ८ ॥
अर्जुनके इस वचनसे । रीझे हरि अंतःकरणसे ।
फिर कहा अति संतोषसे । ऐसा ही होगा ॥ ९ ॥
माय जो कामधेनुसी । रहती साथ छायासी ।
मांगनेसे चंदा भी जैसी । देती खेलने ॥ १० ॥
शंभुने प्रसन्न चित्त । उपमन्युको जो आर्त ।
दिया जैसा दूध भात । क्षीराब्धी ही ॥ ११ ॥
वैसा सागर जो औदार्यका । सखा बना आप अर्जुनका ।
क्यों न हो तब सर्व सुखका । वसति-स्थान वह ॥ १२ ॥
इसमें क्या है कौतुक । लक्ष्मीकांत है मालिक ।
तो क्यों न मांगे ऐच्छिक । वरदान ॥ १३ ॥
मांगा था जो अर्जुनने । “दिया” कहा श्रीकृष्णने ।
कहा क्या तब हरिने । वही कहूंगा ॥ १४ ॥
भगवान उवाच
संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयस्करावुभौ ।
तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥ २ ॥
कर्मयोग अधिक श्रेयस्कर—
हरि कहे सुन कुंती-सुत । विचार करने पर चित्त ।
संन्यास योग दोनों तत्वतः । हैं मोक्ष-दायक ॥ १५ ॥
श्रीभगवानने कहा
कर्म-संन्यास औ' योग एक-से मोक्ष-दायक ।
किंतु संन्याससे माना कर्म-योग विशेष है ॥ २ ॥
१३३ कर्म-संन्यासयोग
किंतु जान अनजानको सकल । आचरणमें कर्मयोग सरल।
जैसे स्त्री बालक भी नांवके बल । तैरते सागर ॥ १६ ॥
सरासरी विचारनेसे । मार्ग यह सरल ऐसे ।
संन्यास फल मिले इससे । अनायास ॥ १७ ॥
करूंगा अब कथन । संन्यासका जो लक्षण ।
सहज हैं ये अभिन्न । जानेगा तू ॥ १८ ॥
ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति ।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥ ३ ॥
नैष्कर्म्यका अर्थ आलस्य नहीं—
गतको जो भुलाना । प्राप्तव्यको तजना ।
मेरु-सा स्थिर होना । अंतरमें ॥ १९ ॥
मैं मेरा ऐसा सब स्मरण । भूला जिसका अंतःकरण ।
उसीको तू संन्यासी जान । निरंतर ॥ २० ॥
मनसे जो ऐसा हुवा । संगसे सदा मुक्त हुआ ।
जिसको है प्राप्त हुआ । शाश्वत सुख ॥ २१ ॥
गृह आदिका तब पूर्ण । तजनेका नहीं कारण ।
आसक्त स्वभावका मन । हुआ असंग ॥ २२ ॥
आग जब बुझ जाती । केवल राख रहती ।
कपास भी लपेटती । वैसे ही ॥ २३ ॥
रहकर भी उपाधिमें । न पड़ता कर्म-बंधमें ।
न रहा जिसकी बुद्धिमें । संकल्प बीज ॥ २४ ॥
कल्पनाका साथ जब टूटता । तभी संन्यास सहज बनता ।
इससे दोनों एक हो जाता । कर्म औ' संन्यास ॥ २५ ॥
जानो जो नित्य संन्यासी राग-द्वेष नहीं जिसे ।
द्वंद्वसे दूर जो होता सुखसे बंध-मुक्त भी ॥ ३ ॥
ज्ञानेश्वरी १३४
सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ।
एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् ॥ ४ ॥
नहीं तो सुन पार्थ । हैं जो मूर्ख सर्वथा ।
वे सांख्य कर्म संस्था । जानेंगे कैसे ॥ २६ ॥
स्वभावसे जो अज्ञान । तभी कहते हैं भिन्न ।
एकेक दीपका भिन्न । प्रकाश होता क्या ? ॥ २७ ॥
करके एकका आचरण । अनुभव किया है संपूर्ण ।
कहते हैं अनुभव ज्ञान । दोनोंका एक ॥ २८ ॥
यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते ।
एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥ ५ ॥
सांख्यसे जो मिलता । योगसे वही प्राप्त होता ।
तभी है दोनोंमें एकता । सहज भावसे ॥ २९ ॥
देख आकाश औ' अवकाश । जिसमें भेद नहीं है जैसा ।
योग तथा संन्यास भी ऐसा । है अभिन्न ॥ ३० ॥
जिसने सांख्य योग अभिन्न । देखा है उसको हुवा ज्ञान ।
उसने आत्मरूप दर्शन । किया सहज ॥ ३१ ॥
संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः ।
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति ॥ ६ ॥
है जो युक्त पंथसे पार्थ । चढते हैं मोक्ष पर्वत ।
महा सुखका वे निश्चित । पायेंगे शिखर ॥ ३२ ॥
सांख्य औ' योग है भिन्न कहते अज्ञ-लोग जो ।
दोनोंमें एकसी निष्ठा दोनोंका फल एक है ॥ ४ ॥
पाते हैं स्थान जो सांख्य योगीको मिलता वह ।
दोनोंका एक ही रूप देखे जो जानता वह ॥ ५ ॥
योगके बिन संन्यास सुखसे मिलता नहीं ।
मुनि जो योगसे युक्त पाता है शीघ्र ब्रह्मको ॥ ६ ॥
१३५ कर्म-संन्यासयोग
जो यह योग स्थिति है तजता । व्यर्थ ही उलझनमें पड़ता ।
उससे प्राप्त कभी नहीं होता । संन्यास साध्य ॥ ३३ ॥
योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः ।
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ ७ ॥
संकल्पशून्य मन चैतन्यमय हो, सर्वव्यापी बनता है—
जिसने भ्रांतिसे है छुड़ा लिया । गुरुवाक्यसे मनको धो दिया ।
आत्म रूपमें फिर ढाल दिया । धुलकर ॥ ३४ ॥
सागरमें जब नून गिरता । तब तक वह अल्प रहता ।
फिर वह समुद्रसा बनता । विलीन होकर ॥ ३५ ॥
वैसे तो संकल्पसे हुआ भिन्न । चैतन्य रूप हुआ उसका मन ।
सीमित होकर भी तनसे मन । व्यापता लोकत्रय ॥ ३६ ॥
कर्ता कर्म फिर काज । कटा जिसका सहज ।
अनुभवता वह सहज । अकर्तापन ॥ ३७ ॥
नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्ववित् ।
पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपन्श्वसन् ॥ ८ ॥
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥ ९ ॥
जिसका मन अर्जुन । मैं देह हूं यह भान ।
भूला उसे न रहा जान । कर्तापन कछु ॥ ३८ ॥
चित्तसे शुद्ध जो योगी जीतके मन इंद्रिय ।
बना है जीव भूतोंका करके भी अलेप जो ॥ ७ ॥
मानके अकर्ता आप योगी तत्वज्ञ जो नित ।
देखें सुने छुये सूंघे खाये सुवे चले करे ॥ ८ ॥
बोले छोडे पकडे या हिलावे बरुनी यदि ।
इंद्रिया करतीं आप अपना कर्म जानता ॥ ९ ॥
ज्ञानेश्वरी १३६
तन त्यागके बिन । अमूर्तके जो गुण ।
दीखते हैं संपूर्ण । योग-युक्तमें ॥ ३९ ॥
वैसे उसका भी होता शरीर । अन्योंकी भाँति करता व्यापार ।
एक जैसा सबका व्यवहार । उसका भी ॥ ४० ॥
वह भी आंखोंसे देखता । वैसे ही कानसे सुनता ।
किंतु वह लिप्त न होता । उसमें कभी ॥ ४१ ॥
यदि वह सबको स्पर्शता । घ्राणसे परिमल भी लेता ।
समयोचित वह बोलता । सबके भाँति ॥ ४२ ॥
आहारको स्वीकारता । तजना जो तजता ।
निद्रा समयमें सोता । सुखसे वह ॥ ४३ ॥
अपनी ही इच्छासे । वह चलता जैसे ।
सकल कर्म वैसे । चलते हैं ॥ ४४ ॥
यह कहना क्या एकेक । देखें श्वासोच्छ्वासादिक ।
वैसे ही निमिषोन्निमिष । आदि सब ॥ ४५ ॥
पार्थ वह सब करता । कोई कर्म नहीं छोड़ता ।
किया ऐसा बोध न होता । प्रतीतिसे ॥ ४६ ॥
भ्रांतिकी सेज पर जो सोया था । स्वप्न रंजनमें जो उलझा था ।
ज्ञानोदयसे वह 'है, जगा था । इसीलिये ॥ ४७ ॥
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि संगं त्यक्त्वा करोति यः ।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवांभसा ॥ १० ॥
चैतन्यके आश्रयसे अब । इंद्रियोंकी वृत्तियां सब ।
बरतती हैं अपने तब । स्वभावसे ॥ ४८ ॥
जैसे दीपकके प्रकाशसे । व्यापार होते घरके जैसे ।
चलते शरीर कर्म वैसे । योगयुक्तके ॥ ४९ ॥
ब्रह्मार्पित करे कर्म करता संग छोड़के ।
न होता पापसे लिप्त जलमें पद्म-पत्रसा ॥ १० ॥
(18) १३७ कर्म-संन्यासयोग
सभी कर्म है वह करता । कर्म बंधनमें नहीं आता ।
जैसे पानीमें नहीं भीगता । पद्मपत्र ॥ ५० ॥
कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिंद्रियैरपि ।
योगिनः कर्म कुर्वंति संगं त्यक्त्वाऽत्मशुद्धये ॥ ११ ॥
कर्मकी विविधता-विवेचन—
जो बुद्धिकी भाषा नहीं जानता । मनमें अंकुर नहीं फूटता ।
ऐसा व्यापार जो तनसे होता । वह शरीर कर्म ॥ ५१ ॥
इसीको स्पष्ट रूपसे कहता । जैसा बालकका कर्म है होता ।
योगीका कर्म वैसे ही रहता । केवल तनसे ॥ ५२ ॥
जब पंच भौतिक तन । रहता है निद्रामें लीन ।
कार्य करता तब मन । स्वप्न रूपमें ॥ ५३ ॥
आश्चर्य देख तू धनुर्धर । कितना है वासना विस्तार ।
देहको नहीं होता जागर । भोगता सुख दुःख ॥ ५४ ॥
इंद्रियोंका स्पर्श भी न करता । ऐसा व्यापार जो होता रहता ।
यह केवल कर्म कहलाता । मनका ही ॥ ५५ ॥
वह कर्म भी योगी करता । किंतु उससे बद्ध न होता ।
उसका साथ छूटा रहता । अहंकारसे ॥ ५६ ॥
जैसे होता है भ्रम हत । पिशाच स्पर्शसे जो चित्त ।
करता इंद्रियां चेष्टित । विकल रूपसे ॥ ५७ ॥
रूप भी है वह देखता । कानसे भी वह सुनता ।
शब्द भी है वह बोलता । पर बेभान हो ॥ ५८ ॥
यह जो है बिन प्रयोजन । जो कुछ वह करता जान ।
वह केवल कर्म है मान । इंद्रियोंका ॥ ५९ ॥
केवल इंद्रियोंसे या शरीर मन बुद्धिसे ।
आत्म-शुद्ध्यर्थ ही योगी करे कर्म असंग हो ॥ ११ ॥
ज्ञानेश्वरी ११८
सर्वत्र फिर जाननेका । कार्य रहता जो बुद्धिका ।
यह कथन है हरिका । अर्जुनसे ॥ ६० ॥
बुद्धिको आधार मानकर । कर्म करते चित्त देकर ।
किंतु वे नैष्कर्म्यसे पर । मुक्त दीखते ॥ ६१ ॥
बुध्दिसे तन तक कहीं । अहंकारका चिन्ह भी नहीं ।
ये कर्म करके ही वही । शुद्ध रहते ॥ ६२ ॥
कर्तृत्वभाव बिन कर्म । होता वही सही निष्कर्म ।
जानते ये उसका मर्म । गुरु-गम्य जो ॥ ६३ ॥
नैष्कर्म्य भावका दर्शन—
शांति-रसका अब पूर । छलके पात्रके ऊपर ।
बोल जो वाणीसे भी पर । होते हैं व्यक्त ॥ ६४ ॥
पराधीनता इंद्रियोंकी । मिटी है संपूर्ण जिनकी ।
सुननेमें योग्यता उनकी । मानना यहां ॥ ६५ ॥
रहने दो अति प्रसंग । न छोड़ो जी कथाका संग ।
होगा श्लोक संगति भंग । इसीलिये ॥ ६६ ॥
अनाकलन जो मनसे । प्रज्ञा-घर्षण करनेसे ।
वही मुझे दैव कृपासे । हुआ सहज ॥ ६७ ॥
स्वभावसे जो शब्दातीत । आया शब्दके अंतर्गत ।
औरोंकी रही क्या है बात । क्या कहो ॥ ६८ ॥
आग्रह विशेष श्रोताओंका । जानकर दास निवृत्तिका ।
कहता है संवाद दोनोंका । सुनो ध्यानसे ॥ ६९ ॥
कहता है कृष्ण अर्जुनसे । प्राप्तोंका लक्षण होता कैसे ।
कहता तुम्हें पूर्ण रूपसे । सुनो चित्त देकर ॥ ७० ॥
युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शांतिमाप्नोति नैष्ठिकम् ।
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ॥ १२ ॥
फलको तजके योगी पाता है शांति निश्चल ।
अ-योगी फलका भोगी वासनामें फंसा रहा ॥ १२ ॥
१९९ कर्म-संन्यासयोग
संपन्न होता जो आत्म योगसे । उदासीन कर्म फल भोगसे ।
रमती शांति सदैव उससे । अपने आप ॥ ७१ ॥
अर्जुन जो कर्म बंधसे । अभिलाषाकी ही डोरीसे ।
बांधा जाता है खूंटेसे । फल भोगके ॥ ७२ ॥
सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्याऽस्ते सुखं वशी ।
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ॥ १३ ॥
करता जैसे फलकामनासे । सभी कर्म वह करता वैसे ।
करता है फिर पूर्ण रूपसे । उपेक्षा उसकी ॥ ७३ ॥
जिस ओर उसकी दृष्टि । होती वहां सुखकी सृष्टि ।
जहां वह कहता वृष्टि । होती महा-बोधकी ॥ ७४ ॥
नवद्वारके देहमें जैसे । रहकर न रहता वैसे ।
करके सब न करे वैसे । रहे फलत्यागी ॥ ७५ ॥
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥ १४ ॥
निष्काम कर्मयोगीकी महानता--
होता है जैसे सर्वेश्वर । जब चाहे तब निर्व्यापार ।
करता वही सब विस्तार । त्रिभुवनका ॥ ७६ ॥
कहें यदि उसको कर्ता । कर्ममें वह न डूबता ।
हाथ पैर लिप्त न होता । उदास वृत्तिसे ॥ ७७ ॥
योग-निद्राका भंग न होता । अ-कर्तापन नहीं मलता ।
दलभार जो खड़ा करता । महाभूतोंका ॥ ७८ ॥
मनसे छोड़के कर्म सुखसे संयमी सभी ।
नौ द्वार पुरमें देही कराता करता नहीं ॥ १३ ॥
नहीं कर्तृत्व लोगोंका न कर्म सृजता प्रभु ।
न कर्म-फल संयोग होता सब स्वभावसे ॥ १४ ॥
ज्ञानेश्वरी १४०
सबके जीवनमें जो बसता । किंतु किसीका कोई न होता ।
विश्व बनता औ' उजाड़ता । उसका कुछ नहीं ॥ ७९ ॥
नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।
अज्ञानेनाऽवृतंज्ञानं तेन मुह्यंति जन्तवः ॥ १५ ॥
अशेष पाप पुण्य उसके । समीप रहते हैं विश्वके ।
किंतु साक्षी न होता उसके । अन्य बात क्या ॥ ८० ॥
वह रहता मूर्तिके साथ । मूर्ति रूप होकर सतत ।
किंतु न मलता रूप अमूर्त्त । उस पुरुषका ॥ ८१ ॥
पालता वह सृजता संहारता । चराचर सब है यही बोलता !
सुन तू यह अज्ञान ही है पार्थ । सबका यहां ॥ ८२ ॥
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः ।
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् ॥ १६ ॥
अज्ञान यह समूल टूटता । भ्रांतिका तम भी है दूर होता ।
फिर अकर्तृत्व प्रकट होता । ईश्वरका ॥ ८३ ॥
ईश्वर है यहां एक अकर्ता । तब चित्त यदि ऐसा मानता ।
तब वही मैं यह स्वभावता । आदिसे हूँ ॥ ८४ ॥
होता जब ऐसा विवेक चित्तमें । उसको भेद कैसा त्रिभुवनमें ।
देखता अपने ही अनुभवमें । विश्व है मुक्त ॥ ८५ ॥
सूर्योदय होता पूर्व दिशामें । प्रकाश होता दश दिशामें ।
उस समय किसी दिशामें । तम न रहता ॥ ८६ ॥
किसीका भी न लें पाप वैसे ही पुण्य भी प्रभु ।
अज्ञानसे ढका ज्ञान इससे जीव मोहित ॥ १५ ॥
हुवा अज्ञानका नाश जिनका आत्म ज्ञानसे ।
स्वच्छ दीखे पर-ब्रह्म मानो सूर्य-प्रकाश है ॥ १६ ॥
१४१ कर्म-संन्यास योग
तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥ १७ ॥
बुद्धिनिश्चयसे हो आत्मज्ञान । अपनेको ब्रह्म स्वरूप मान ।
ब्रह्मनिष्ठासे है तत्परायण । रहता दिनरात ॥ ८७ ॥
ऐसा भला व्यापक ज्ञान । जिनके हियमें पायास्थान ।
उनकी सम-दृष्टिका वर्णन । विशेष कैसे ॥ ८८ ॥
देखते अपने को जैसे । विश्वको देखते हैं वैसे ।
सहज कहनेमें इसे । आपत्ति क्या ॥ ८९ ॥
दैव जैसे लीलासे । न देखें दैन्य जैसे ।
न जाने विवेक जैसे । भ्रांतिको ॥ ९० ॥
अथवा अंधःकारका प्रकार । न देखता स्वप्नमें भी भास्कर ।
न आती अमृतके कान पर । मृत्युवार्ता ॥ ९१ ॥
जाने दो संताप है कैसा । न जानता चंद्र वैसा ।
ज्ञानी भी प्राणियोंमें वैसा । न जाता भेद ॥ ९२ ॥
विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पंडिताः समदर्शिनः ॥ १८ ॥
यह है झींगुर यह गज । या यह चांडाल यह द्विज ।
या वह अन्य यह आत्मज । यह रहे कैसे ॥ ९३ ॥
या वह धेनु औ' यह श्वान । एक महान औ' दूजा हीन ।
इसका स्वप्नमें भी न भान । जगनेमें कैसे ॥ ९४ ॥
जहां है अहंकार भाव । वहीं है द्वेतका संभव ।
जहां अहंका ही अभाव । वहां विषमता कैसी ॥ ९५ ॥
बुद्धि निश्चय निष्ठाको उसीमें कर अर्पित ।
नहीं लेते पुनः जन्म ज्ञानसे पाप धो कर ॥ १७ ॥
विद्या विनय संपन्न द्विज गाय तथा गज ।
श्वान चांडाल जो सारे तत्वज्ञ सम देखते ॥ १८ ॥
ज्ञानेश्वरी १४२
इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः ।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः ॥ १९ ॥
इसीलिये सर्वत्र सदा सम । आप ही है जो आद्य ब्रह्म ।
जानकर यह संपूर्ण मर्म । समदृष्टिका ॥ ९६ ॥
विषय संग नहीं छोड़ते । इंद्रिय डंडन न करते ।
असंगता है ये भोगते । निरिच्छामे ॥ ९७ ॥
सब लोगोंके ही अनुसार । करता है लौकिक व्यापार ।
किंतु अज्ञानको छोड़कर । लौकिकका ॥ ९८ ॥
जन-जनमें जैसा खेचर । होकर भी न होता गोचर ।
वैसे देहधारीको संसार । नहीं जानता ॥ ९९ ॥
जैसे पवन-गतिके साथ । जल पे खेले जल सतत ।
जानते जन उसमें द्वैत । तरंग रूप ॥ १०० ॥
वैसे नाम-रूप भिन्नताका । वैसे ब्रह्म ही सच है एक ।
मन साम्य हुआ है जिसका । सदा सर्वत्र ॥ १ ॥
ऐसी जिसकी समदृष्टि है । उस नरके जो लक्षण हैं ।
संक्षेपमें हरि कहता है । अर्जुनसे ॥ २ ॥
न प्रहृष्येत् प्रियं प्राप्य नोद्विजेत् प्राप्य चाप्रियम् ।
स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः ॥ २० ॥
जैसे मृगजलका महापूर । हिला नहीं सकता गिरिवर ।
वैसे शुभ अशुभमें विकार । उठते नहीं ॥ ३ ॥
वही है निश्चित । समदृष्टि प्राप्त ।
हरि कहे पार्थ । वही ब्रह्म ॥ ४ ॥
यहीं जीत लिया जन्म स्थिर हो सम-बुद्धिमें ।
निर्दोष सम जो ब्रह्म उसीमें जो हुए स्थिर ॥ १९ ॥
न होता प्रियसे हर्ष अप्रियसे न व्याकुल ।
बुद्धि निश्चल निर्मोह ब्रह्मज्ञ ब्रह्ममें स्थिर ॥ २० ॥
१४३ कर्म-संन्यासयोग
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विंदत्यात्मनि यत्सुखम् ।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥ २१ ॥
निज वृत्तिको छोड़कर । न आता इंद्रियग्राम पर ।
विषय सेवन वहां पर । विचित्र ही है ॥ ५ ॥
अपार सहज-स्व-सुखमें । स्थित होनेसे अपने ही में ।
न झांकता कभी बाहरमें । पांडुकुमार ॥ ६ ॥
थाली है जिसकी कुमुददल । भोजन चंद्रकिरण शीतल ।
औ' वह चकोर खायेगा धूल । यह संभव है क्या ॥ ७ ॥
मिला जिसे निज सहज सुख । अपनेमें स्थित अंतर-सुख ।
उसका छूटेगा विषय सुख । अपने आप ॥ ८ ॥
वैसे भी स-कौतुक । विचार करके देख ।
यह जो विषय सुख । चाहता कौन ॥ ९ ॥
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।
आद्यंतवंतः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥ २२ ॥
जिसने अन्तर्सुख नहीं देखा वही विषय सुखके पीछे पड़ते हैं—
देखा नहीं जिसने निज सुख । रमता वही इंद्रियार्थी देख ।
बासी रोटी देख कर भी रंक । जैसे चाहता उसे ॥ १० ॥
अथवा मृग जो तृषा पीडित । भ्रमसे छोड़कर जल सोत ।
दौड़ते रहते मृग-जलार्थ । ऊसरमें सदा ॥ ११ ॥
जिसे नहीं निज सुखका अनुभव । औ' जिसको स्वरूपानंदका अभाव ।
उसको है विषय सुखका वैभव । भाते अपार ॥ १२ ॥
असंग विषयोंमें जो जानके आत्मका सुख ।
लीन होके ब्रह्ममें ही पाता है सुख अक्षय ॥ २१ ॥
इंद्रियोंके सभी भोग दुःख कारण केवल ।
उठते गिरते जान ज्ञानी न रमता वहां ॥ २२ ॥
ज्ञानेश्वरी १४४
विषयोंमें वैसा कुछ सुख है । कहने जैसा भी कुछ नहीं है ।
विद्युल्लतासे जैसे न होता है । प्रकाश जगतमें ॥ १३ ॥
बात वर्षा आतपमें यदि साया । करती है घने बादलकी काया ।
व्यर्थ है तब बांधना धनंजय । महलादिक ॥ १४ ॥
विषयोंको सुख कहना । व्यर्थकी बात है कहना ।
विषकंदको ही कहना । जैसा अति-मधुर ॥ १५ ॥
कहते जैसे भूमिपुत्रको मंगल । अथवा मृगजलको कहते जल ।
विषयानुभव कहलाता गरल । वैसे ही व्यर्थ ॥ १६ ॥
जाने वे पार्थ सब ये बोल । सर्प फनकी साया शीतल ।
होगी कह कहाँ तक निश्चल । मूशकको ॥ १७॥
आमिष ग्रास जैसा अर्जुन । न खाये तब तक भला मीन ।
वैसा विषय संग संपूर्ण । जान तू निश्चित ॥ १८ ॥
विरक्तियोंकी जो दृष्टि । देखती इसे किरीटी ।
पांडुरोगकी है पुष्टि । वैसे ही ॥ १९॥
तभी विषय भोगमें सुख । जानो है वह साद्यंत ही दुःख ।
किंतु क्या करेंगे जन मूर्ख । भोगके न थकते ॥ १२० ॥
न जानते अंतरंग बेचारे । इसीलिये सब सेवन करे ।
कहो पूय 'पंकके है जो कीरे । क्या करेंगे घृणा ॥ २१ ॥
दुख ही उन दुखितोंका घर । है विषय कर्दम ही दुर्दर ।
भोग-जल जलके जलचर । छोड़ें कैसे ॥ २२ ॥
और जो ये दुःख योनी हैं । सब निरर्थक होती हैं ।
यदि जीव सब विरत हैं । विषयोंमें ॥ २३ ॥
वैसे ही गर्भवासका कष्ट । या जन्म-मरणादि संकट ।
• अविश्रांत रूप यह बाट । चलेगा कौन ॥ २४ ॥
विषयी यदि विषय छोड़ेंगे । महादोष ये जो कहाँ रहेंगे ।
संसारादि नाम ये व्यर्थ होंगे । इस जगतके ॥ २५ ॥
तभी किया सुख बुद्धिसे स्वीकार । विषय सुखका है जीवन भर ।
कर दिखाया मिथ्याको सच कर । अविद्याजात ॥ २६ ॥
१४५ कर्म-संन्यासयोग
(19)
सुन अर्जुन इस कारणसे । विष है विषय विचारनेसे ।
नहीं जा तू कभी इस राहसे । भूल कर भी ॥ २७ ॥
इससे ये विरक्त पुरुष । त्यजते हैं जैसे मान विष ।
न भाता उन्हे सुख रूप दुःख । विषयोंका कभी ॥ २८ ॥
शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् ।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥ २३ ॥
बात नहीं ज्ञानियोंमें । विषयकी सपनेमें ।
देह भावको देहमें । मिटाया है ॥ २९ ॥
सदा जिसका अंतःकरण । अनुभवता सुख महान ।
न जाने अन्य कछु अर्जुन । विषयादिक ॥ १३० ॥
वे हैं भोगते द्वैत भावसे । पक्षीके फल चुगने जैसे ।
यहां संपूर्ण विसर्जनसे । भोक्ता भावके ॥ ३१ ॥
भोगमें ऐसी अवस्था आती । अहंताका परदा हटाती ।
महासुखालिंगन कराती । ऐक्य भावका ॥ ३२ ॥
उस आलिंगनके समय । जलमें होता जलका लय ।
मिट जाता है वैसा उभय । न दीखता भेद ॥ ३३ ॥
या आकाशमें खो जाता वात । मिटती वह "दो" ऐसी बात ।
रहता सुख मात्र शाश्वत । भोगमें वहाँ ॥ ३४ ॥
द्वैतकी भाषा मिटती है जहाँ । रहता है फिर ऐक्य ही वहाँ ।
रहता फिर साक्षी कौन कहाँ । जानता जो ॥ ३५ ॥
योऽन्तः सुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः ।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥ २४ ॥
यलसे मृत्युके पूर्व देहमें जो पचा सका ।
काम क्रोधादिके वही योगी वही सुखी ॥ २३ ॥
प्रकाश स्थिरता सौख्य मिला अंतरमें जिन्हे ।
ब्रह्म ही बनके योगी पाता निर्वाण ब्रह्ममें ॥ २४ ॥
ज्ञानेश्वरी १४६