ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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मळयानिलय मंद सुगंध । उसमें मिला अमृतका स्वाद ।
उसके साथ हो सुस्वर नाद । दैव-गतिसे ॥ २२० ॥
स्पर्शसे सर्वांग शांत करता । माधुरीसे रसनाको नचाता ।
श्रवणेंद्रियसे है कहलाता । भला भला ॥ २१ ॥
वैसे है इस कथाका सुनना । कानोंका है प्रसन्न होना ।
संसार-दुःखका मूलसा होना । उच्चाटन ही ॥ २२ ॥
मंत्रसे यदि शत्रु मरता । कौन तलवार बांधता ।
दूध मधुसे रोग जाता । कौन पीवे नीम ॥ २३ ॥
वैसे मनको न मारते । इंद्रियोंको न सताते ।
अनायास ही मोक्ष पाते । श्रवण-मात्रसे ॥ २४ ॥
सुन सब हो प्रसन्न मन । करके गीतार्थका चिंतन ।
ज्ञानदेवका यह वचन । जो है निवृत्तिका दास ॥ २२५ ॥
गीता श्लोक ४२
ज्ञानेश्वरी ओवी २२५