ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ।
एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् ॥ ४ ॥
नहीं तो सुन पार्थ । हैं जो मूर्ख सर्वथा ।
वे सांख्य कर्म संस्था । जानेंगे कैसे ॥ २६ ॥
स्वभावसे जो अज्ञान । तभी कहते हैं भिन्न ।
एकेक दीपका भिन्न । प्रकाश होता क्या ? ॥ २७ ॥
करके एकका आचरण । अनुभव किया है संपूर्ण ।
कहते हैं अनुभव ज्ञान । दोनोंका एक ॥ २८ ॥
यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते ।
एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥ ५ ॥
सांख्यसे जो मिलता । योगसे वही प्राप्त होता ।
तभी है दोनोंमें एकता । सहज भावसे ॥ २९ ॥
देख आकाश औ' अवकाश । जिसमें भेद नहीं है जैसा ।
योग तथा संन्यास भी ऐसा । है अभिन्न ॥ ३० ॥
जिसने सांख्य योग अभिन्न । देखा है उसको हुवा ज्ञान ।
उसने आत्मरूप दर्शन । किया सहज ॥ ३१ ॥
संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः ।
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति ॥ ६ ॥
है जो युक्त पंथसे पार्थ । चढते हैं मोक्ष पर्वत ।
महा सुखका वे निश्चित । पायेंगे शिखर ॥ ३२ ॥
सांख्य औ' योग है भिन्न कहते अज्ञ-लोग जो ।
दोनोंमें एकसी निष्ठा दोनोंका फल एक है ॥ ४ ॥
पाते हैं स्थान जो सांख्य योगीको मिलता वह ।
दोनोंका एक ही रूप देखे जो जानता वह ॥ ५ ॥
योगके बिन संन्यास सुखसे मिलता नहीं ।
मुनि जो योगसे युक्त पाता है शीघ्र ब्रह्मको ॥ ६ ॥
१३५ कर्म-संन्यासयोग