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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 196

ज्ञान है जो थिर वांछित । मिले वह उसे निश्चित ।
जिसमें होती अचुंबित । शांति-सुख ॥ ८९ ॥
हृदयमें जब ज्ञान होता । तब शांति-अंकुर फूटता ।
उससे विस्तार प्रकटता । आत्मबोधका ॥ ९० ॥
फिर जहां देखे वहां । सर्वत्र ही जहां तहां ।
न दीखे तीर है कहां । शांति सिंधुका ॥ ९१ ॥
ऐसा यह उत्तरोत्तर । ज्ञान बीजका है विस्तार ।
कहा है उसको अपार । धनंजय ॥ ९२ ॥
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥ ४० ॥
संदेह विनाशका घर है—
जिन प्राणियोंमें ज्ञानकी । चाह नहीं वह पानेकी ।
क्या कहें ऐसे जीवनकी । उससे भली मौत ॥ ९३ ॥
शून्य है जैसे गृह । या प्राण बिनु देह ।
है जीवित सम्मोह । ज्ञानके बिन ॥ ९४ ॥
हुआ नहीं प्राप्त वह ज्ञान । चाह करता पानेका मन ।
तब है आशा यह तू जान । पानेकी वह ॥ ९५ ॥
किंतु बात है कैसे ज्ञानकी । आस्था नहीं मनमें उसकी ।
तो पड़ा है संदेह रूपकी । अग्निमें वह ॥ ९६ ॥
जब अमृत भी नहीं भाता । ऐसा आस्वाद-स्वभाव होता ।
तभी जानना मरण आता । निकट सत्वर ॥ ९७ ॥
विषय सुखमें जो है रंगता । ज्ञानसे नित विमुख रहता ।
निश्चय ही संशयमें पड़ता । जानना वह ॥ ९८ ॥
न है ज्ञान न है श्रद्धा संशयीका विनाश है ।
दोनों ही लोकमें पार्थ न पाता सुख संशयी ॥ ४० ॥
ज्ञानेश्वरी १२८