ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 201, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंहुआ जो वह जाने देना । अबकी यह सुलझा देना ।
इन दोनोंमें अब बताना । मार्ग उत्तम ॥ ६ ॥
अन्त है जिसका मंगल । निश्चित है जिसका फल ।
अनुष्ठानमें जो सकल । शुद्ध सहज ॥ ७ ॥
जिसमें न होता नींदका भंग । किंतु कटता प्रवास मारग ।
ऐसा सुखासनसा सुभग । तथा सरल ॥ ८ ॥
अर्जुनके इस वचनसे । रीझे हरि अंतःकरणसे ।
फिर कहा अति संतोषसे । ऐसा ही होगा ॥ ९ ॥
माय जो कामधेनुसी । रहती साथ छायासी ।
मांगनेसे चंदा भी जैसी । देती खेलने ॥ १० ॥
शंभुने प्रसन्न चित्त । उपमन्युको जो आर्त ।
दिया जैसा दूध भात । क्षीराब्धी ही ॥ ११ ॥
वैसा सागर जो औदार्यका । सखा बना आप अर्जुनका ।
क्यों न हो तब सर्व सुखका । वसति-स्थान वह ॥ १२ ॥
इसमें क्या है कौतुक । लक्ष्मीकांत है मालिक ।
तो क्यों न मांगे ऐच्छिक । वरदान ॥ १३ ॥
मांगा था जो अर्जुनने । “दिया” कहा श्रीकृष्णने ।
कहा क्या तब हरिने । वही कहूंगा ॥ १४ ॥
भगवान उवाच
संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयस्करावुभौ ।
तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥ २ ॥
कर्मयोग अधिक श्रेयस्कर—
हरि कहे सुन कुंती-सुत । विचार करने पर चित्त ।
संन्यास योग दोनों तत्वतः । हैं मोक्ष-दायक ॥ १५ ॥
श्रीभगवानने कहा
कर्म-संन्यास औ' योग एक-से मोक्ष-दायक ।
किंतु संन्याससे माना कर्म-योग विशेष है ॥ २ ॥
१३३ कर्म-संन्यासयोग