ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतस्मादज्ञानसंभूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः ।
छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ॥ ४२ ॥
इस कारणसे तू पार्थ । नष्ट करके हृदयस्थ ।
संशय अब सर्वथा । ऊठ सत्वर ॥ ९ ॥
ऐसा सर्वज्ञोंका बाप । श्रीकृष्ण जो ज्ञानदीप ।
कहता वह सकृप । सुनो राजन् ॥ २१० ॥
कथा यह पूर्वापर । अर्जुन विचारकर ।
पूछेगा प्रश्न सत्वर । समयोचित ॥ ११ ॥
उस कथाकी संगति । भावकी है संपत्ति ।
उसकी है उन्नति । कहेगा हरि ॥ १२ ॥
उसकी उत्तमता पर । आठो रस हैं न्योच्छावर ।
वह है सज्जनोंका घर । आसरेका ॥ १३ ॥
प्रकट करेगा शांति-रस निर्मल । है वह महासागरसे भी खोल ।
मेरी देश-भाषाका अनमोल बोल । अर्थपूर्ण ॥ १४ ॥
बिंब दीखता है हथेली समान । प्रकाशमें ओछा होता त्रिभुवन ।
अनुभवना ऐसी व्याप्ति महान । शब्दार्थकी ॥ १५ ॥
अजी ! कामितार्थकी जो आशा । फलती कल्पवृक्षमें जैसा ।
बोल हैं अति व्यापक ऐसा । सुननाजी ॥ १६ ॥
रहने दो अब है क्या कहना । सर्वज्ञ जानते मनो कामना ।
फिर भी करता नम्र प्रार्थना । सुनना चित्त देके ॥ १७ ॥
यहां साहित्य तथा शांति । वैसे रेखा शब्द पद्धति ।
जैसे लावण्य गुण कुलवति । तथा पतिव्रता ॥ १८ ॥
पहले ही प्रिय है शक्कर । मिलती पथ्यके नाम पर ।
खाना या न ग्वाना बात फिर । रहती कहां ? ॥ १९ ॥
तभी हृदयका सारा अज्ञान-कृत संशय ।
ज्ञानके खड्गसे तोड ऊठ तू योग साधके ॥ ४२ ॥
ज्ञानेश्वरी १३०