ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजो यह योग स्थिति है तजता । व्यर्थ ही उलझनमें पड़ता ।
उससे प्राप्त कभी नहीं होता । संन्यास साध्य ॥ ३३ ॥
योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः ।
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ ७ ॥
संकल्पशून्य मन चैतन्यमय हो, सर्वव्यापी बनता है—
जिसने भ्रांतिसे है छुड़ा लिया । गुरुवाक्यसे मनको धो दिया ।
आत्म रूपमें फिर ढाल दिया । धुलकर ॥ ३४ ॥
सागरमें जब नून गिरता । तब तक वह अल्प रहता ।
फिर वह समुद्रसा बनता । विलीन होकर ॥ ३५ ॥
वैसे तो संकल्पसे हुआ भिन्न । चैतन्य रूप हुआ उसका मन ।
सीमित होकर भी तनसे मन । व्यापता लोकत्रय ॥ ३६ ॥
कर्ता कर्म फिर काज । कटा जिसका सहज ।
अनुभवता वह सहज । अकर्तापन ॥ ३७ ॥
नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्ववित् ।
पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपन्श्वसन् ॥ ८ ॥
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥ ९ ॥
जिसका मन अर्जुन । मैं देह हूं यह भान ।
भूला उसे न रहा जान । कर्तापन कछु ॥ ३८ ॥
चित्तसे शुद्ध जो योगी जीतके मन इंद्रिय ।
बना है जीव भूतोंका करके भी अलेप जो ॥ ७ ॥
मानके अकर्ता आप योगी तत्वज्ञ जो नित ।
देखें सुने छुये सूंघे खाये सुवे चले करे ॥ ८ ॥
बोले छोडे पकडे या हिलावे बरुनी यदि ।
इंद्रिया करतीं आप अपना कर्म जानता ॥ ९ ॥
ज्ञानेश्वरी १३६