ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअसंभव है ऐसा होना । अशक्य है ऐसा सोचना ।
जगतमें ज्ञान समान । पवित्र नहीं कछु ॥ ७८ ॥
ज्ञान यहां अति उत्तम है । ऐसा क्या अन्य समान है ।
ज्ञान जो महा चैतन्य है । विश्वमें ॥ ७९ ॥
इस महातेज पे कसनेसे । निर्मल है यह सूर्य बिंबसे ।
समेटलें यह समेटनेसे । आकाशको भी ॥ १८० ॥
या तौलकर देखनेमें । इस पृथ्वीकी तुलनामें ।
यदि कुछ है तो विश्वमें । ज्ञान ही है ॥ ८१ ॥
बहुविध विचारनेसे । पुनः पुनः सोचनेसे ।
पवित्र यहां ज्ञानसे । ज्ञान ही है ॥ ८२ ॥
खोजनेसे अमृतका रस जैसा । अमृतमें ही मिलता है वैसा ।
ज्ञानके समान ज्ञान ही वैसा । जानना पार्थ ॥ ८३ ॥
इस पर है अब बोलना । व्यर्थका है समय बिताना ।
सच कहता सुन अर्जुन । जो कहा तूने ॥ ८४ ॥
उस ज्ञानको तब कैसे जानना । अर्जुनके मनमें यह पूछना ।
जानकर उसकी मनो कामना । कहा अच्युतने ॥ ८५ ॥
फिर कहता है किरीटी । चित दे सुन यह गोष्ठी ।
कहता हूँ ज्ञानकी भेटी । होगी कैसी ॥ ८६ ॥
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥ ३९ ॥
आत्म-सुखकी माधुरीसे । उकताता है विषयोंसे ।
इंद्रियोंका कभी उनसे । न होता भाव ॥ ८७ ॥
मनमें जो चाह नहीं धरता । प्रकृति कर्मको न स्वीकारता ।
सुख रूप होकरके रहता । श्रद्धा भोगमें ॥ ८८ ॥
श्रद्धालु ज्ञान पाता है संयमी नित्य सावध ।
ज्ञानसे शीघ्र पाता है शांति अंतिम पावन ॥ ३९ ॥
१२७ ज्ञान-कर्म-संन्यास योग