ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
४
ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग
श्रोताओंको ज्ञानेश्वर महाराजका उद्बोधन-
सुकाल हुआ श्रवणेंद्रियोंका । दर्शन हुआ गीता-निधानका ।
अजी ! साकार ही हुआ स्वप्नका । उनको यहां ॥ १ ॥
मूलमें है विवेककी गोष्ठि । कहनेवाला श्रीकृष्ण श्रेष्ठी ।
भक्तराज जो स्वयं किरीटी । सुनते हैं ॥ २ ॥
पंचमालाप है सुगंध । तथा परिमल सुस्वाद ।
वहां है भलासा विनोद । कथानकका ॥ ३ ॥
श्री हरिकी कृपा हुई । अमृतकी गंगा बही ।
तपस्या सफल हुई । श्रोताओंकी ॥ ४ ॥
इंद्रियोंको अब संपूर्ण । बनकर स्वयं श्रवण ।
अनुभवना गीताख्यान । संवाद सुखका ॥ ५ ॥
अब यह अप्रासंगिक । विस्तार छोडके अधिक ।
कहो कृष्णार्जुन हो एक । बोले क्या हैं ॥ ६ ॥
तब संजय बोले राजासे । सुदैव जुड़ा है अर्जुनसे ।
तभी अति प्रीति है उनसे । नारायणकी ॥ ७ ॥
जो न कहा पिता वसुदेवसे । औ' न जो कहा माता देवकीसे ।
या न कहा गुह्य बलभद्रसे । कहा वह पार्थसे ॥ ८ ॥
देवी लक्ष्मी इतनी नजदीक । वह भी न जानती यह सुख ।
कृष्ण प्रेमका फल जो अधिक । मिला अर्जुनको ॥ ९ ॥
थी सनकादिकोंकी जो आस । सुननेकी यह उपदेश ।
किंतु उनको भी ऐसा यश । मिला नहीं ॥ १० ॥
जगदीश्वरका है प्रेम । दीखता यहां निरुपम ।
पार्थने ऐसा सर्वोत्तम । किया पुण्य ॥ ११ ॥
अजी ! जिसकी अति प्रीति । अमूर्तको बनाती व्यक्ति ।
: उसकी है एकात्म स्थिति । जंचती बहु ॥ १२ ॥
योगियोंको जो नहीं मिलता । वेदार्थमें भी जो नहीं आता ।
ध्यानस्थका नहीं पहुंचता । ध्यान चक्षुभी ॥ १३ ॥
ऐसा यह निज स्वरूप । अनादि तथा औ' निष्कंप ।
किंतु कैसा हुआ सरूप । इस भांतिसे ॥ १४ ॥
यह त्रिलोक पटका थान । जो है आकारके परे जान ।
प्रेमसे करमें है अर्जुन । कर लिया है ॥ १५ ॥
भगवान उवाच
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥१॥
इस योगकी प्राचीनता—
कहता है देव पांडुसुत । हमसे यह है विवस्वत ।
सुनी है योगकी गुह्य बात । बहुत पहले ॥ १६ ॥
बोले फिर वह भास्कर । योग स्थिति यह सुंदर ।
पूर्ण रूपसे सुअवसर । मनुसे तब ॥ १७ ॥
मनुने इसका अनुष्ठान । कर दिया ज्ञानोपदेश दान ।
इक्ष्वाकुको, ऐसी है महान । आदि परंपरा ॥ १८ ॥
पहले सूर्यसे मैंने कहा था योग अव्यय ।
मनुसे वह बोला था वह इक्ष्वाकुसे फिर ॥ १ ॥
१०७ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग
एवं परंपराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परंतप ॥२॥
कितने ही इस योगसे और । हुए हैं राजऋषि जानकार ।
किंतु इस युगमें पृथ्वो पर । कोई न जानता ॥ १९ ॥
जिन प्राणियोंका आधार । देह तथा कामना पर ।
जिससे विस्मृति अपार । आत्म बोधकी ॥ २० ॥
अजी ! बदल गयी आस्था बुध्दि । विषय सुखकी परमावधि ।
इससे जीव हुवा है उपाधि । उन्हे भाता यही ॥ २१ ॥
गांवमें सुनो नग्न लोगोंके । काम क्या महीन कपडोंके ।
तथा जन्मांधोंमें सूरजके । कहो मुझे ॥ २२ ॥
या बहिरोंकी सभामें । गावें गीत सु-रागोंमें ।
सियारको चांदनीमें । होगी क्या चाह ? ॥ २३ ॥
अथवा पहले चंद्रोदयके । चक्षु होते हैं व्यर्थ जिनके ।
चंद्रोदयसे उन कागोंके । लाभ क्या हुआ ॥ २४ ॥
जैसे वैराग्यकी सीमा न जानते । विवेककी भाषा नहीं है सुनते ।
वैसे मूर्ख कहो कैसे जानते । मुझ ईश्वरको ॥ २५ ॥
मोहके बहुत बढनेसे । काल बहुत बीत जानेसे ।
लोप हुआ है योग इससे । इस लोकमें ॥ २६ ॥
स एवायं मयातेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥३॥
वही योग तुझसे अर्जुन । कहा है मैंने इसी क्षण ।
उसको तू तत्वता जान । न करके भ्रांति ॥ २७ ॥
ऐसी परंपरासे जो मिला राजर्षि-वृंदको ।
आगे समय जानेसे विश्वमें लोप होगया ॥२॥
वही आज तुझे मैंने कहा योग पुरातन ।
कहा है गुह्य जो सार भक्त है तू सखा मम ॥ ३ ॥
ज्ञानेश्वरी १०८
मेरे जीवनका यह गुपित । तुझसे छिपाना नहीं उचित ।
तू है मेरा आत्मीय बहुत । इसीलिये ॥ २८॥
प्रेमका तू पुतला । भक्तिका है जिव्हाला ।
मित्रताकी चित्कला । धनुर्धर ॥ २९॥
मेरा निकट तू अर्जुन । कैसे करूं तेरी वंचना ।
रण सज्ज हुए समान । हम दोनों ॥ ३० ॥
अन्य सब अब रहने देना । कोलाहलका विचार न करना ।
अज्ञान सब तेरा दूर करना । इसी समय ॥ ३१॥
अर्जुन उवाच
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ॥४॥
आजके तूने विवस्वतसे कैसे कहा ?—
अर्जुन कहता है तब श्रीधर । माता प्रेम करती संतान पर ।
इसमें विस्मय क्या है चक्रधर । कृपानिधि ॥ ३२ ॥
संसार भ्रांतोंकी ह छाया । अनाथ जीवोंकी तू माय ।
हमने जो जन्म है पाया । तव कृपासे ही ॥ ३३ ॥
जन्म देकर पंगुको माता । कष्ट उठाती है स-ममता ।
ऐसी देव कैसे कहें वार्ता । तेरी तुझसे ही ॥ ३४॥
अब पूछूंगा देव एक बात । उस पर देना भला स्व-चित्त ।
प्रश्न पर क्रोध तू न किंचित । करो देव ॥ ३५॥
पिछली जो वह बात । तूने कही थी अनंत ।
न मानता मेरा चित्त । क्षण भी देव ॥ ३६॥
अजी ! वह विवस्वत नामका । अ-परिचित है बाप-दादाका ।
कैसा किया है तूने उनका । उपदेश देव ॥ ३७॥
अर्जुनने कहा
अभीका जन्म है तेरा पूर्वका उस सूर्यका ।
पहले ही कहा तूने कैसे मैं वह मान लूं ॥ ४ ॥
१०९ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग
वह है देव किस कालका । तू भीहरि है इस कालका ।
तभी दीखता तेरी बातका । असंगत पन ॥ ३८ ॥
किंतु तेरा चरित्र वैसे । हम उसको जाने कैसे ।
तभी वह असत्य ऐसे । नहीं कहता ॥ ३९ ॥
यह बात संपूर्ण ऐसे । कहना मैं समझूं वैसे ।
तूने उस सूर्यको कैसे । किया उपदेश ॥ ४० ॥
भगवान उवाच
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप ॥५॥
तेरे मेरे अनेक जन्म मैं जानता हूं—
कृष्ण कहे तब पांडुसुत । जब था वह विवस्वत ।
तब मैं नहीं था ऐसा चित्त- । भ्रम है तेरा ॥ ४१ ॥
अजी ! तू नहीं जानता सब । जन्म हमारे तुम्हारे अब ।
बीते हैं कितने कैसे कब । यह तू भूला है ॥ ४२ ॥
मैं जिस जिस अवसरमें । अवतरा हूं जिस रूपमें ।
वह सब अपने मनमें । स्मरता पार्थ ॥ ४३ ॥
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोपि सन् ।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया ॥६॥
धर्म रक्षणके लिये मेरा अवतार--
इसीलिये मुझे संपूर्ण । बीतेका होता है स्मरण ।
रहित मैं जन्म मरण । जन्मता प्रकृति योगसे ॥ ४४ ॥
श्रीभगवानने कहा
बीते मेरे कयी जन्म तेरे भी बहु अर्जुन ।
जानता मैं सभी बातें तू उन्हे जानता नहीं ॥ ५ ॥
होते हुये अजन्मा मैं निर्विकार जगत्प्रभु ।
जन्मता हूं स्वमायासे प्रकृति ओढके निज ॥ ६ ॥
ज्ञानेश्वरी ११०
अव्ययत्व मेरा नहीं मिटता । किंतु जन्म मरण हे दीखता ।
यह सब प्रकृतिसे भासता । मुझमें नहीं ॥ ४५ ॥
मिटती नहीं मेरी स्वतंत्रता । दीखती मुझमें कर्माधीनता ।
यह हे भ्रम-बुद्धिसे घड़ता । अन्यथा नहीं ॥ ४६ ॥
एक ही दीखता दूसरा । जो दर्पणका ले आधार ।
किंतु वहां वस्तु विचार । एक मात्र ॥ ४७ ॥
निराकार हूं मैं धनुर्धर । लेकर प्रकृतिका आधार ।
नटता हूं लेकर आकार । कार्यके लिये ॥ ४८ ॥
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥७॥
धर्ममात्र जो संपूर्ण । युगयुगमें रक्षण ।
करना मेरा लक्षण । आदिकालसे ॥ ४९ ॥
भूलता हूं तब अजत्व । छोड़ता हूं निराकारत्व ।
गिरता जब धर्म तत्त्व । अधर्मसे ॥ ५० ॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥८॥
हितार्थ अपने भक्तोंके । आता हूं अवतार लेके ।
मिटाता तब अज्ञानके । अंधकारको ॥ ५१ ॥
अधर्मकी सीमा तोड़ता । पापकी सनद फाड़ता ।
सुखका ध्वज उभारता । सज्जनोंसे ॥ ५२ ॥
दैत्य कुलका संहार करता । साधु जनोंका सम्मान करता ।
धर्म नीतिका मेल बिठाता । धनुर्धर ॥ ५३ ॥
जब है गिरता धर्म जगमें तब अर्जुन !
अधर्म उठता भारी लेता हूं जन्म मैं स्वयं ॥ ७ ॥
रक्षण कर संतोंका दुष्टोंका नाश करने ।
स्थापना करने धर्म जन्मता मैं पुनः पुनः ॥ ८ ॥
१११ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग
मिटाकर अविवेकका काजल । करता हूं विवेक दीप उज्ज्वल ।
जिससे योगियोंकी दीपमाळ । जले निरंतर ॥ ५४ ॥
आत्म-सुखसे विश्व खिलता । जगतमें धर्म ही रहता ।
सात्विकताका वसंत आता । भक्त जनोंमें ॥ ५५ ॥
पापका जहां पहाड टूटता । पुण्यका है प्रभात प्रकटता ।
मेरा रूप जब प्रकट होता । धनंजय ॥ ५६ ॥
ऐसे कार्यार्थ जगतमें । जनमता हूं युगयुगमें ।
जानता जो यह विश्वमें । विवेकी वही ॥ ५७ ॥
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्वतः ।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥९॥
जो मेरा रूप जानते हैं वे मद्रूप होते हैं—
मैं जो अजत्वमें ही जनमता । अक्रियतामें सक्रिय रहता ।
अविकारत्व यह जो जानता । पाता वह मोक्ष ॥ ५८ ॥
संगमें वह असंग रहता । देहमें निर्देह अनुभवता ।
पंचतत्वमें जब मिल जाता । मेरे ही रूपमें ॥ ५९ ॥
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ॥१०॥
वे अपना पराया न सोचते । सदा कामना शून्य हो रहते ।
कभी वे राह भी नहीं देखते । क्रोधकी ॥ ६० ॥
सदा वे मद्भावमें ही रहते । मेरी सेवामें ही रत रहते ।
आत्म-बोधमें ही मगन होते । वीत राग हो ॥ ६१ ॥
मेरे जन्म तथा कर्म दिव्य जो जानता सही ।
तजके देह पुनर्जन्म न पाता मिलके मुझे ॥ ९ ॥
नहीं तृष्णा भय क्रोध जो मेरे कार्यमें रत ।
हुये ज्ञान तपोपूत तथा मद्भावमें कयी ॥ १० ॥
ज्ञानेश्वरी ११२
होते वे तप तेजके पुंज । एकायत-ज्ञान-निकुंज ।
पवित्रतामें हैं तीर्थराज । धनुर्धर ॥ ६२ ॥
सहजमें वे मद्भाव हुये । मेरे ही रूपमें एक भये ।
फिर मेरे उनमें न आये । बीच परदा ॥ ६३ ॥
जैसे पीतलके गंज कालिख । मिटे यदि वे दोनों निःशेष ।
सुवर्णत्व इससे अधिक । क्या रहा ? ॥ ६४ ॥
पूर्ण जो यम नियममें । शुद्ध है जो तपज्ञानमें ।
हुये वे मेरे ही रूपमें । निःसंदेह ॥ ६५ ॥
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥ ११ ॥
केवल भ्रमवश मुझ एकको अनेक देखते हैं —
मुझे जो जैसा भजता । उसको वैसा ही देखता ।
दोनोंमें आती एकता । जान यह् ॥ ६६ ॥
वैसे ही मनुष्य मात्र सकल । स्वभावसे ही है भजन-शील ।
हुए ऐस मुझमें ही केवल । पांडुकुमार ॥ ६७ ॥
किंतु ज्ञानाभावसे नाश होता । उससे ही बुद्धिभेद होता ।
उससे जगती है कल्पकता । अनेकत्वकी ॥ ६८ ॥
तभी अभेदमें भेद देखते । मुझे अनामको हैं नाम देते ।
देव देवीके रूपमें पूजते । है जो शब्दसे परे ॥ ६९ ॥
जहां जो सर्वत्र सदा सम । वहां विभाग अधमोत्तम ।
करते हैं मतिसे संभ्रम । विवेचन ॥ ७० ॥
काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥ १२ ॥
भजते मुझ जो जैसे वैसे मैं भजता उन्हे ।
मेरे ही मार्गमें आते सभी हैं सब मार्गसे ॥ ११ ॥
देवोंको पूजते जो हैं चाहसे कर्म-सिद्धिकी ।
कर्मकी सिद्धि वे शीघ्र पाते हैं नर-लोकमें ॥ १२ ॥
(15) ११३ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग
फिर नाना हेतु प्रकारसे । यथोचित पूजोपचारसे ।
देवदेवान्तरोंको मान्यतासे । उपासते ॥ ७१ ॥
जो हैं ऐसे अपेक्षित । पाते हैं वैसे समस्त ।
कर्मफल वे निश्चित । जान ले तू ॥ ७२ ॥
बिन कर्मके लेना देना अधिक । निर्भ्रान्त ऐसा नहीं कुछ सम्यक ।
यहां है कर्म ही फल रूपक । मनुष्य लोकमें ॥ ७३ ॥
खेतमें जैसे जो कछु बोया जाता । उसके बिना अन्य न उपजता
अथवा जो देखता वही दीखता । देर्पणमें जैसे ॥ ७४ ॥
या गिरिकंदरामें जैसे । अपने ही शब्द वैसे ।
गूंजते हैं दश दिशासे । निमित्तयोग ॥ ७५ ॥
ऐसे ये सभी भजन । साक्षीभूत हूं अर्जुन ।
प्रति-फलती भावना । अपनी ही ॥ ७६ ॥
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥ १३ ॥
चातुर्वर्ण्य प्राकृतिक गुणोंके कारण—
इसी भांति तू जान । चार हैं ये वर्ण ।
रचे हैं मैंने गुण- । कर्म वि भागसे ॥ ७७ ॥
जो प्रकृतिके आधारसे । गुणोंके व्यभिचारसे ।
कर्मकी तदनुसारसे । योजना की ॥ ७८ ॥
है यहां यह एक अर्जुन । किंतु हुए हैं ये चार-वर्ण ।
ऐसे गुण कर्मके कारण । सहज हुआ ॥ ७९ ॥
तभी सुन तू पार्थ । ये वर्ण-भेद संस्था ।
कर्ता मैं न सर्वथा । इसीलिये ॥ ८० ॥
सृजे मैं ने वर्ण चार गुण-कर्म विभागसे ।
करके सब तू जान अकर्ता निर्विकार मैं ॥ १३ ॥
ज्ञानेश्वरी ११४
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥ १४ ॥
मेरे कारणसे यह भया । किंतु मैंने यह नहीं किया ।
ऐसे जिसने प्रतीत किया । हुआ वह सूझ ॥ ८१ ॥
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ॥ १५ ॥
पूर्ववर्ती मुमुक्षु जन । ऐसा हूं मैं, यह जान ।
करते कर्माचरण । धनुर्धर ॥ ८२ ॥
किंतु जैसे भुने हुए बीज । उगते नहीं कभी सहज ।
वैस ही उन्हे कर्म महज । होते मोक्ष हेतु ॥ ८३ ॥
यहां और एक बात अर्जुन । यह् कर्माकर्मका विवेचन ।
अपने ही बुध्दिसे है करना । नहीं योग्य ॥ ८४ ॥
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥ १६ ॥
कर्माकर्म विवेचनमें ज्ञानी भी भ्रममें—
कर्म करते हैं वह कौन । या अकर्मका है क्या लक्षण ।
ऐसे सोचनेमें विचक्षण । पडते उलझनमें ॥ ८५ ॥
अजी ! खोटा सिक्का जैसा होता है । सच्चेकी समानता करता है ।
देखनेवालोंको जो डालता है । भ्रममें जैसे ॥ ८६ ॥
न लीपते मुझे कर्म न मुझे फल-कामना ।
मुझे जो जानते ऐसे कर्ममें भी अलिप्त वे ॥ १४ ॥
कर्म जो मुमुक्षुओंने किये हैं इस ज्ञानसे ।
कर तू कर्म वैसे ही उनसे पाठ लेकर ॥ १५॥
जाननेमें कर्माकर्म भ्रमते बुध्दिमान भी ।
तुझे मैं कहता कर्म छूटेगा जानके यह ॥ १६ ॥
११५ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग
वैसे निष्कर्म्यके भ्रममें । पड़ते हैं कर्म-पाशमें ।
जो दूसरी सृष्टि मनमें । कर सकते ॥ ८७ ॥
मूर्खोंकी यहां कहें क्या बात । क्रांतदर्शी होते मोह-ग्रस्त ।
तभी कहता तुझसे बात । वही अब ॥ ८८ ॥
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः ।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ॥ १७ ॥
तभी कर्म जिसके स्वभावसे । विश्वाकार संभव हो उससे ।
जानना उसे संपूर्ण रूपसे । यहां सर्व प्रथम ॥ ८९ ॥
वर्णाश्रममें फिर उचित । तथा विशेष कर्म विहित ।
जानना उसको सुनिश्चित । उपयोगी जो ॥ ९० ॥
फिर जानना जो निषिद्ध । उसका भी रूप विशद ।
तभी न हो सकता बद्ध । सहज कर्ममें ॥ ९१ ॥
नहीं तो विश्व है कर्माधीन । उसका फैलाव है गहन ।
सुन लक्षण अब तू अर्जुन । बोध प्राप्तोंका ॥ ९२ ॥
कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥ १८ ॥
कर्मका तिरस्कार और कर्मफलोंमें आशा दोनों नहीं --
करते हुए सकल कर्ममें । अकर्म देखता जो अपनेमें ।
निरपेक्ष होता कर्म संगमें । फलाशासे ॥ ९३ ॥
तथा कर्त्तव्य करनेमें । अन्य न कोई जगतमें ।
ऐसेको बोध अकर्ममें । अच्छा होता है ॥ ९४ ॥
क्रिया कलापका वह संपूर्ण । करता है उत्तम आचरण ।
किंतु इन लक्षणके कारण । जानना ज्ञानी ॥ ९५ ॥
जानना कर्म सामान्य विकर्म भी विशेष जो ।
जानना अकर्ममें भी गूढ जो कर्मकी गति ॥ १७ ॥
अकर्म कर्ममें देखें तथा कर्म अकर्ममें ।
विज्ञ है वह लोगोंमें योगी वह कृतार्थ भी ॥१८॥
ज्ञानेश्वरी ११६
जैसे जलाशयके पास रहकर । देखता अपना प्रतिबिंब सुंदर ।
किंतु जानता है निभ्रांत होकर । मैं हूं भिन्न ॥ ९६ ॥
या चलता जब नांवमें बैठकर । देखता वृक्षोंका चलना निरंतर ।
किंतु कहता है मनमें सोचकर । वृक्ष होते अचल ॥ ९७ ॥
करता वह सब कामोंमें वास । किंतु मानता यह है आभास ।
अपनेको जानता है सविश्वास । मैं हूं अकर्मी ॥ ९८ ॥
उदयास्त कारणसे होता भान । न चलते ही सूर्य गमन ।
वैसे होता उसे नैष्कर्म्यका ज्ञान । कर्म-रत रहते ॥ ९९ ॥
मनुष्य जैसा ही है वह दीखता । उसमें मनुष्यत्व नहीं रहता ।
वैसे जलमें पढ भी न डूबता । भानुबिंब ॥ १०० ॥
उसने विश्वदेखा कछु न देखते । सब कार्य किया कुछ भी न करते ।
सब भोग किये नहीं कछु भोगते । भोग-मात्र ॥ १ ॥
बैठ कर एक ही स्थल पर । करता रहता है विश्व संचार ।
बना वह विश्वरूप निरंतर । अपनेमें ही ॥ २ ॥
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः ।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः ॥ १९ ॥
ऐसे पुरुषमें कहीं । कर्मका तिरस्कार नहीं ।
कर्म फलापेक्षा भी नहीं । छूती कभी ॥ ३ ॥
और मैं यह कर्म करूंगा । किया जो उसे पूर्ण करूंगा ।
ऐसा संकल्प नहीं छूएगा । उसके मनको ॥ ४ ॥
ज्ञानाग्निके ही मुखसे । सारे कर्म जलनेसे ।
ब्रह्म है मनुष्य रूपसे । जान ले तू वह ॥ ५ ॥
उद्योग करता सारे काम संकल्प त्यागके ।
जलाये ज्ञानसे कर्म उसको कहते बुध ॥ १९ ॥
११७ ज्ञान कर्म-संन्यासयोग
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः ।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः ॥ २० ॥
कर्मयोगीके लक्षण—
शरीरमें जो उदास । फल-भोगमें निरास ।
निरंतर स-उल्हास । रहता है ॥ ६ ॥
संतोष-भवनके भोजमें । आत्मयोग मृष्टान्न भोगमें ।
न कहता कभी न मनमें । जान तू पार्थ ॥ ७ ॥
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥ २१ ॥
यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः ।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥ २२ ॥
नित्य अधिकाधिक प्यारी । ले महासुखकी माधुरी ।
आशाको न्योच्छावर करी । अहंभाव-सह ॥ ८ ॥
तभी जिस अवसरमें जो पाया । उससे ही वह नित है सुखाया ।
उसको अपना और पराया । दोनों नहीं ॥ ९ ॥
दृष्टिसे यह जो देखता । वह है आपही हो जाता ।
जिसको है वह सुनता । बनता वही ॥ १० ॥
पैरसे जो चलता । मुखसे जो बोलता ।
वह जो चेष्टा करता । बनता स्वयं ॥ ११ ॥
नित्य तृप्त निराधार न रखे फल वासना ।
हुआ है लीन कर्मोंमें तो भी कुछ करें नहीं ॥ २० ॥
संयमी तजके सारा इच्छा सह परिग्रह ।
देहसे करता कर्म उसे दोष न स्पर्शता ॥ २१ ॥
मिले जो उसमें तुष्ट न जाने द्वंद्व मत्सर ।
फले जले उसे एक करके कर्म-मुक्त जो ॥ २२ ॥
ज्ञानेश्वरी ११८
अजी ! वह विश्वमें जब देखता । अपने बिन भिन्न नहीं दीखता ।
उसको अब कौन कहां क्या बंधता । कर्म कैसा ॥ १२ ॥
जहांसे उपजता यह मत्सर । वह द्वैत ही नहीं जहांपर ।
उसको कहना क्या निर्मत्सर । शब्दके लिये ॥ १३ ॥
इसलिये रहता सर्व मुक्त । कर्म करके भी कर्म रहित ।
सगुण होकर भी गुणातीत । निभ्रांत जो ॥ १४॥
गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ।
यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥ २३॥
देह संगमें यदि होता । चैतन्यसा वह दीखता ।
कसौटी पर खरा उतरता । परब्रह्मकी ॥ १५ ॥
ऐसा ही वह सकौतुक । करता कर्म यज्ञादिक ।
मिट जाते सब अशेष । उसीमें सब ॥ १६ ॥
अकालके बादल जैसे । उर्मी बिन मिटते वैसे ।
नभमें सहज भावसे । उदय होके ॥ १७ ॥
वैसे विधि विधान विहित । आचरण करता समस्त ।
तो भी ऐक्य भावसे अद्वैत । पाता वह ॥ १८ ॥
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥ २४॥
यह है हवन मैं होता । या यह यज्ञ यह भोक्ता ।
बुद्धिमें ऐसी नही भंगता । इसीलिये ॥ १९ ॥
इष्ट जो यज्ञ यजन । हवि मंत्रादि सम्पूर्ण ।
आत्म बुद्धिसे दर्शन । अविनाश भावसे ॥ १२० ॥
छूटा संग हुवा मुक्त ज्ञानमें स्थिर चित जो ।
यज्ञार्थ करता कर्म हो जाता सब ही लय ॥ २३ ॥
ब्रह्ममें होमके ब्रह्म ब्रह्मने ब्रह्म लक्ष्यके ।
ब्रह्ममें सानके कर्म पाया ब्रह्मत्व ही तब ॥ २४ ॥
११९ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग
तभी ब्रह्म ही उसका कर्म । बोध हुआ ऐसा उसका सम ।
उसका कर्तव्य ही नैष्कर्म्य । धनुर्धर ॥ २१ ॥
जिसका अविवेक कौमार्य गया । औ' विरक्तिसे पाणिग्रहण भया ।
फिर उपासना वहां लाया । योगाग्निसे ॥ २२ ॥
दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते ।
ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति ॥ २५ ॥
योगाग्निसे सतत उपासना—
यजनशील है जो दिन-रात । होमते अविद्या मन सहित ।
गुरुवाक्य हुताशनमें नित । किया हवन ॥ २३ ॥
ये हैं योगाग्निमें यजते । इसे दैवयज्ञ हैं कहते ।
इससे आत्म-सुख चाहते । धनंजय ॥ २४ ॥
दैवास्तव देहका पालन । ऐसा निश्चय जिसका पूर्ण ।
जो न सोचता देहाभरण । दैवयोगका महायोगी ॥ २५ ॥
अब सुन तू और एक । जो हैं ब्रह्माग्निमें साग्निक ।
वे यज्ञमें ही यज्ञ देख । करते हैं ॥ २६ ॥
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति ।
शब्दादीन्विषयानन्ये इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ॥ २६ ॥
कर्मयोगीका ब्रह्मयज्ञ—
संयम जिनका अग्नि होत्र । युक्तित्रय ही उनका मंत्र ।
देते इंद्रिय द्रव्य पवित्र । आहुति नित्य ॥ २७ ॥
वैराग्य रविका उदय होते । संयमका यज्ञ कुंड रचते ।
वहां वे प्रज्वलित करते । इंद्रियानल ॥ २८ ॥
कोयी योगी करे मात्र देव यज्ञ उपासना ।
कोयी ब्रह्माग्निमें वैसे जलाते यज्ञ यज्ञसे ॥ २५ ॥
श्रोत्रादि इंद्रियां कोयी होमते संयमाग्निमें ।
कोयी विषय शब्दादि होमते इंद्रियाग्निमें ॥ २६ ॥
ज्ञानेश्वरी १२०
उससे विरक्ति ज्वालायें निकलतीं । उसमें विकारोंकी समिधा जलती ।
तब है आशाकी घुमकडी छूटती । पांचही कुंडोंमें ॥ २९ ॥
फिर वे विधि वाक्यके ही अनुकूल । विषय आहुतियां देकर बहुल ।
हवन करते कुंडमें स-कुशल । इंद्रियाग्निके ॥ १३० ॥
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे ।
आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ॥ २७ ॥
इस भांति कोई पार्थ । दोष धोते हैं सर्वथा ।
हृदयारणिमें मंथा । विवेक किया ॥ ३१ ॥
उसे पकड कर निग्रहसे । दबाकर अति धीरजसे ।
गुरु उपदेशके जोरसे । रवींचा पार्थ ॥ ३२ ॥
समरसतासे मंथन किया । तत्काल इसका फल आया ।
फिर वहां उद्दीपन भया । ज्ञानाग्निका ॥ ३३ ॥
पहला ऋध्दि सिध्दिका संभ्रम । वह निवारण हुआ तो धूम ।
फिर वहां प्रकट हुआ सूक्ष्म । विस्फुलिंग ॥ ३४ ॥
उसमें डाला मन मुक्त । यम दमसे जो था रिक्त ।
इंधन बना जो सयुक्त । अपने आप ॥ ३५ ॥
उठीं उसमें ज्वालायें समृद्ध । पडी तब वासनाकी समिध ।
समता स्नेह-युत नाना विध । जलनेमें ॥ ३६ ॥
वहां सोऽहं मंत्रसे दीक्षित । इंद्रिय कर्मकी आहुति नित ।
देना ज्ञानानलमें प्रदीप्त । यज्ञ-कुंडमें ॥ ३७ ॥
फिर प्राण क्रियाकी सुवासे । यज्ञमें पड़ी पूर्णाहुतिसे ।
होता अवभृत सहजतासे । समरसका ॥ ३८ ॥
प्राणेंद्रिय क्रिया कोयी सभी आहुति देकर ।
अंतरमें समाधिको जगाते चिंतनाग्निसे ॥ २७ ॥
१२१ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग
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तब है आत्म-बोधका सुख । जो संयमाग्निका हुत-शेष ।
वही पुरोडासु किया देख । सहज सेवन ॥ ३९ ॥
ऐसे यज्ञ-कार्यसे अनेक । मुक्त हुए त्रिभुवनमें देख ।
यहां यज्ञ क्रियायें हैं अनेक । प्रापव्य एक ॥ १४० ॥
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे ।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ॥ २८ ॥
कर्मयोगीके विविध यज्ञ—
एक द्रव्य यज्ञ कहलाता । दूजा तप उत्पन्न करता ।
तथा योगयाग ही बनता । ऐसा है कहा ॥ ४१ ॥
जिसमें शब्दमें शब्द यजना । उसको वाग्यज्ञ है कहना ।
जिसमें ज्ञानसे ज्ञेयकी जानना । वह है ज्ञानयज्ञ ॥ ४२ ॥
अर्जुन यह सब कठिन । अनुष्ठानका महा-बंधन ।
किंतु जितेंद्रियको आसान । योग्यता रूप ॥ ४३ ॥
यहां है जो प्रवीण । योग समृद्धि संपन्न ।
किया आत्म-हवन । अपनेसे ॥ ४४ ॥
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे ।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ॥ २९ ॥
अपानाग्निके मुखमें फिर । प्राण द्रव्यको अर्पण कर ।
हवन करते हैं धनुर्धर । अभ्यास-योगसे ॥ ४५ ॥
कोई अपानको प्राणमें होमते । या प्राणापानका निरोध करते ।
ये प्राणायामी है कहलाते । पांडुकुमार ॥ ४६ ॥
द्रव्य जप तप योग स्वाध्याय और चिंतन ।
संयमी करते यज्ञ रखके व्रत उग्र जो ॥ २८ ॥
होमते परस्परमें कोयी प्राण अपानको ।
रोकते गति दोनोंकी प्राणायाम परायण ॥ २९ ॥
ज्ञानेश्वरी १२२
अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति ।
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥ ३० ॥
या वज्रयोगक्रमसे । सर्वोहार संयमसे ।
प्राणमें प्राणार्पणसे । हवन करते ॥ ४७ ॥
ऐसे मोक्ष काम सकल । सारे हैं ये यजनशील ।
यज्ञसे जिन्होने मनोमल । किया क्षालन ॥ ४८ ॥
जिसका जला अविद्या जात । रहा जो निज स्वभावगत ।
जहां अग्नि औ' होताका द्वैत । रहा नहीं ॥ ४९ ॥
यहां यजित होता काम हृत । यज्ञका विधान होता समाप्त ।
जहांसे फिर सारे क्रिया-जात । होते नष्ट ॥ ५० ॥
विचार यहां नहीं घुसता । यहांसे न हेतु निकलता।
द्वैत जो संग-दोषसे होता । स्पर्शता नहीं ॥ ५१ ॥
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ।
नायंलोकोऽस्त्ययज्ञस्यकुतोऽन्यः कुरुसत्तम ॥ ३१ ॥
अनादि सिद्ध जो ऐसा ज्ञान । यज्ञमें जो बचता पावन ।
ब्रह्म-निष्ठ करते सेवन । स-ब्रह्ममंत्र ॥ ५२ ॥
शेषामृतसे जेवे तृप्त । अमर्त्य भावको प्राप्त ।
ऐसे ब्रह्मत्वमें पूर्त । अनायाससे ॥ ५३ ॥
जिन्हें माला न पडती विरक्तिकी । सेवा नहीं घडती संयमाग्निकी ।
पहचान न होती योग-यागकी । जन्म लेकर ॥ ५४ ॥
जिनका नहीं ऐहिक नेक । बात क्या कहें पार-लौकिक ।
बात कहना है व्यर्थ देख । धनंजय ॥ ५५ ॥
प्राणमें होमते प्राण आहार कर निश्चित ।
सभी ये हैं यज्ञ-वेत्ता जलाते पाप यज्ञसे ॥ ३० ॥
यज्ञ-शेष-सुधा भोजी पाते हैं ब्रह्म शाश्वत ।
यज्ञ विना न यहां तो कहांका परलोक है ॥ ३१ ॥
१२३ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे।
कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ॥ ३२ ॥
अनेक प्रकारके ऐसे । याग कहे हैं तुझसे ।
वेदमें अति-विस्तारसे । कहे हैं सब ॥ ५६ ॥
विस्तारसे क्या है जानना । इसे कर्म सिद्ध अनुभवना ।
कर्म-बंधसे मुक्त होना । स्वभावसे ॥ ५७ ॥
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परंतप ।
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥ ३३ ॥
कर्मयोगीके विविध यज्ञोंकी तुलना-
जिसका है वेद मूल । क्रिया विशेष है स्थूल ।
उसका अपूर्व फल । स्वर्ग-सुख है ॥ ५८ ॥
द्रव्ययाग होते हैं तो श्रेष्ठ । किंतु ज्ञान यज्ञसे कनिष्ठ ।
जैसे तारा-तेज होता नष्ट । सूर्यके सम्मुख ॥ ५९ ॥
परमात्म-सुख निधान । साधनेमें है योगीजन ।
डालते नित ज्ञानांजन । उन्मेष-नेत्रमें ॥ १६० ॥
कर्मयोग समाप्तिका जो स्थान । नैष्कर्म्य बोधकी है खान ।
क्षुधार्तिको है अमृतान्न । साधनाका ॥ ६१ ॥
जहां प्रवृत्ति पंगु होती । तर्क-दृष्टि अंधी होती ।
इंद्रियां सब भूल जाती । विषय संग ॥ ६२ ॥
मिटता ममत्व मनका । औ' शब्दत्व शब्द-मात्रका ।
जिसमें मिलता ज्ञानका । ज्ञेय मात्र ॥ ६३ ॥
नाना प्रकारके ऐसे वेदोंमें यज्ञ जो कहे ।
कर्मसे निकले जान पायेगा मुक्ति जानके ॥ ३२ ॥
ज्ञान-यज्ञ सदा श्रेष्ठ जानना द्रव्य-यज्ञसे ।
समाते हैं सभी कर्म ज्ञानमें पूर्ण रूपसे ॥ ३३ ॥
ज्ञानेश्वरी १२४
मिटता दारिद्र्य वैराग्यका । दृढ़ता हव्यास विवेकका ।
मिलन होता जहां आत्माका । सहज भावसे ॥ ६४ ॥
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥ ३४ ॥
ज्ञान प्राप्तिका साधन—
अजी ! वह जो उत्तम ज्ञान । प्राप्त करना हो तो महान ।
करना है संतोंका भजन । सर्व भावसे ॥ ६५ ॥
वे हैं इस ज्ञानका घर । सेवा उसका महाद्वार ।
सेवासे ही पांडुकुमार । पाना है उसे ॥ ६६ ॥
अजी ! तन मन प्राणसे । लगना उन चरणसे ।
करना निराभिमानसे । सकल दास्य ॥ ६७ ॥
पूछके तब इच्छित प्रश्न । पाना है उनसे वह ज्ञान ।
उस बोधसे अंतःकरण । होगा कामना रहित ॥ ६८ ॥
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव ।
येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥ ३५ ॥
वाक्य प्रकाशसे उनके । मिटेंगे संशय चित्तके ।
तब होगा ब्रह्म रूपके । ज्ञान निश्चित ॥ ६९ ॥
फिर अपने सहित । अन्य सभी भूत जात ।
मेरे रूपमें अखंडित । देखेगा तू ॥ १७० ॥
ऐसा ज्ञान प्रकाश पायेगा । मोह-अंधकार दूर होगा।
जब गुरु-कारुण्य होगा । धनुर्धर ॥ ७१ ॥
सेवा द्वारा नम्रतासे जान ले ज्ञान प्रश्नसे ।
देंगे अनुभवी संत सत्वज्ञ ज्ञान-तत्व जो ॥ ३४ ॥
जान कर वह ऐसा न होगा भ्रांत तू कभी ।
मुझमें और आत्मामें देखेके जीव-मात्रको ॥ ३५ ॥
१२५ ज्ञान कर्म-संन्यासयोग