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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 193

मिटता दारिद्र्य वैराग्यका । दृढ़ता हव्यास विवेकका ।
मिलन होता जहां आत्माका । सहज भावसे ॥ ६४ ॥
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥ ३४ ॥
ज्ञान प्राप्तिका साधन—
अजी ! वह जो उत्तम ज्ञान । प्राप्त करना हो तो महान ।
करना है संतोंका भजन । सर्व भावसे ॥ ६५ ॥
वे हैं इस ज्ञानका घर । सेवा उसका महाद्वार ।
सेवासे ही पांडुकुमार । पाना है उसे ॥ ६६ ॥
अजी ! तन मन प्राणसे । लगना उन चरणसे ।
करना निराभिमानसे । सकल दास्य ॥ ६७ ॥
पूछके तब इच्छित प्रश्न । पाना है उनसे वह ज्ञान ।
उस बोधसे अंतःकरण । होगा कामना रहित ॥ ६८ ॥
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव ।
येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥ ३५ ॥
वाक्य प्रकाशसे उनके । मिटेंगे संशय चित्तके ।
तब होगा ब्रह्म रूपके । ज्ञान निश्चित ॥ ६९ ॥
फिर अपने सहित । अन्य सभी भूत जात ।
मेरे रूपमें अखंडित । देखेगा तू ॥ १७० ॥
ऐसा ज्ञान प्रकाश पायेगा । मोह-अंधकार दूर होगा।
जब गुरु-कारुण्य होगा । धनुर्धर ॥ ७१ ॥

सेवा द्वारा नम्रतासे जान ले ज्ञान प्रश्नसे ।
देंगे अनुभवी संत सत्वज्ञ ज्ञान-तत्व जो ॥ ३४ ॥
जान कर वह ऐसा न होगा भ्रांत तू कभी ।
मुझमें और आत्मामें देखेके जीव-मात्रको ॥ ३५ ॥
१२५ ज्ञान कर्म-संन्यासयोग