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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 189

उससे विरक्ति ज्वालायें निकलतीं । उसमें विकारोंकी समिधा जलती ।
तब है आशाकी घुमकडी छूटती । पांचही कुंडोंमें ॥ २९ ॥
फिर वे विधि वाक्यके ही अनुकूल । विषय आहुतियां देकर बहुल ।
हवन करते कुंडमें स-कुशल । इंद्रियाग्निके ॥ १३० ॥
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे ।
आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ॥ २७ ॥
इस भांति कोई पार्थ । दोष धोते हैं सर्वथा ।
हृदयारणिमें मंथा । विवेक किया ॥ ३१ ॥
उसे पकड कर निग्रहसे । दबाकर अति धीरजसे ।
गुरु उपदेशके जोरसे । रवींचा पार्थ ॥ ३२ ॥
समरसतासे मंथन किया । तत्काल इसका फल आया ।
फिर वहां उद्दीपन भया । ज्ञानाग्निका ॥ ३३ ॥
पहला ऋध्दि सिध्दिका संभ्रम । वह निवारण हुआ तो धूम ।
फिर वहां प्रकट हुआ सूक्ष्म । विस्फुलिंग ॥ ३४ ॥
उसमें डाला मन मुक्त । यम दमसे जो था रिक्त ।
इंधन बना जो सयुक्त । अपने आप ॥ ३५ ॥
उठीं उसमें ज्वालायें समृद्ध । पडी तब वासनाकी समिध ।
समता स्नेह-युत नाना विध । जलनेमें ॥ ३६ ॥
वहां सोऽहं मंत्रसे दीक्षित । इंद्रिय कर्मकी आहुति नित ।
देना ज्ञानानलमें प्रदीप्त । यज्ञ-कुंडमें ॥ ३७ ॥
फिर प्राण क्रियाकी सुवासे । यज्ञमें पड़ी पूर्णाहुतिसे ।
होता अवभृत सहजतासे । समरसका ॥ ३८ ॥
प्राणेंद्रिय क्रिया कोयी सभी आहुति देकर ।
अंतरमें समाधिको जगाते चिंतनाग्निसे ॥ २७ ॥
१२१ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग
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