सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 190, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 190

तब है आत्म-बोधका सुख । जो संयमाग्निका हुत-शेष ।
वही पुरोडासु किया देख । सहज सेवन ॥ ३९ ॥
ऐसे यज्ञ-कार्यसे अनेक । मुक्त हुए त्रिभुवनमें देख ।
यहां यज्ञ क्रियायें हैं अनेक । प्रापव्य एक ॥ १४० ॥
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे ।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ॥ २८ ॥
कर्मयोगीके विविध यज्ञ—
एक द्रव्य यज्ञ कहलाता । दूजा तप उत्पन्न करता ।
तथा योगयाग ही बनता । ऐसा है कहा ॥ ४१ ॥
जिसमें शब्दमें शब्द यजना । उसको वाग्यज्ञ है कहना ।
जिसमें ज्ञानसे ज्ञेयकी जानना । वह है ज्ञानयज्ञ ॥ ४२ ॥
अर्जुन यह सब कठिन । अनुष्ठानका महा-बंधन ।
किंतु जितेंद्रियको आसान । योग्यता रूप ॥ ४३ ॥
यहां है जो प्रवीण । योग समृद्धि संपन्न ।
किया आत्म-हवन । अपनेसे ॥ ४४ ॥
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे ।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ॥ २९ ॥
अपानाग्निके मुखमें फिर । प्राण द्रव्यको अर्पण कर ।
हवन करते हैं धनुर्धर । अभ्यास-योगसे ॥ ४५ ॥
कोई अपानको प्राणमें होमते । या प्राणापानका निरोध करते ।
ये प्राणायामी है कहलाते । पांडुकुमार ॥ ४६ ॥
द्रव्य जप तप योग स्वाध्याय और चिंतन ।
संयमी करते यज्ञ रखके व्रत उग्र जो ॥ २८ ॥
होमते परस्परमें कोयी प्राण अपानको ।
रोकते गति दोनोंकी प्राणायाम परायण ॥ २९ ॥
ज्ञानेश्वरी १२२