ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति ।
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥ ३० ॥
या वज्रयोगक्रमसे । सर्वोहार संयमसे ।
प्राणमें प्राणार्पणसे । हवन करते ॥ ४७ ॥
ऐसे मोक्ष काम सकल । सारे हैं ये यजनशील ।
यज्ञसे जिन्होने मनोमल । किया क्षालन ॥ ४८ ॥
जिसका जला अविद्या जात । रहा जो निज स्वभावगत ।
जहां अग्नि औ' होताका द्वैत । रहा नहीं ॥ ४९ ॥
यहां यजित होता काम हृत । यज्ञका विधान होता समाप्त ।
जहांसे फिर सारे क्रिया-जात । होते नष्ट ॥ ५० ॥
विचार यहां नहीं घुसता । यहांसे न हेतु निकलता।
द्वैत जो संग-दोषसे होता । स्पर्शता नहीं ॥ ५१ ॥
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ।
नायंलोकोऽस्त्ययज्ञस्यकुतोऽन्यः कुरुसत्तम ॥ ३१ ॥
अनादि सिद्ध जो ऐसा ज्ञान । यज्ञमें जो बचता पावन ।
ब्रह्म-निष्ठ करते सेवन । स-ब्रह्ममंत्र ॥ ५२ ॥
शेषामृतसे जेवे तृप्त । अमर्त्य भावको प्राप्त ।
ऐसे ब्रह्मत्वमें पूर्त । अनायाससे ॥ ५३ ॥
जिन्हें माला न पडती विरक्तिकी । सेवा नहीं घडती संयमाग्निकी ।
पहचान न होती योग-यागकी । जन्म लेकर ॥ ५४ ॥
जिनका नहीं ऐहिक नेक । बात क्या कहें पार-लौकिक ।
बात कहना है व्यर्थ देख । धनंजय ॥ ५५ ॥
प्राणमें होमते प्राण आहार कर निश्चित ।
सभी ये हैं यज्ञ-वेत्ता जलाते पाप यज्ञसे ॥ ३० ॥
यज्ञ-शेष-सुधा भोजी पाते हैं ब्रह्म शाश्वत ।
यज्ञ विना न यहां तो कहांका परलोक है ॥ ३१ ॥
१२३ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग