ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजी ! वह विश्वमें जब देखता । अपने बिन भिन्न नहीं दीखता ।
उसको अब कौन कहां क्या बंधता । कर्म कैसा ॥ १२ ॥
जहांसे उपजता यह मत्सर । वह द्वैत ही नहीं जहांपर ।
उसको कहना क्या निर्मत्सर । शब्दके लिये ॥ १३ ॥
इसलिये रहता सर्व मुक्त । कर्म करके भी कर्म रहित ।
सगुण होकर भी गुणातीत । निभ्रांत जो ॥ १४॥
गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ।
यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥ २३॥
देह संगमें यदि होता । चैतन्यसा वह दीखता ।
कसौटी पर खरा उतरता । परब्रह्मकी ॥ १५ ॥
ऐसा ही वह सकौतुक । करता कर्म यज्ञादिक ।
मिट जाते सब अशेष । उसीमें सब ॥ १६ ॥
अकालके बादल जैसे । उर्मी बिन मिटते वैसे ।
नभमें सहज भावसे । उदय होके ॥ १७ ॥
वैसे विधि विधान विहित । आचरण करता समस्त ।
तो भी ऐक्य भावसे अद्वैत । पाता वह ॥ १८ ॥
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥ २४॥
यह है हवन मैं होता । या यह यज्ञ यह भोक्ता ।
बुद्धिमें ऐसी नही भंगता । इसीलिये ॥ १९ ॥
इष्ट जो यज्ञ यजन । हवि मंत्रादि सम्पूर्ण ।
आत्म बुद्धिसे दर्शन । अविनाश भावसे ॥ १२० ॥
छूटा संग हुवा मुक्त ज्ञानमें स्थिर चित जो ।
यज्ञार्थ करता कर्म हो जाता सब ही लय ॥ २३ ॥
ब्रह्ममें होमके ब्रह्म ब्रह्मने ब्रह्म लक्ष्यके ।
ब्रह्ममें सानके कर्म पाया ब्रह्मत्व ही तब ॥ २४ ॥
११९ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग