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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

अपने घरमें उसका सुखसे । आप सहित भोजन करनेसे ।
वह सुख भोग ही सब दोषोंसे । करेगा मुक्त ॥ २२ ॥
वह यज्ञ-शिष्ट भोग । सभी हरते हैं अध ।
जैसे नष्ट होते रोग । अमृत सिञ्चिसे ॥ २३ ॥
अथवा तत्व-निष्ठ जैसा । भ्रम रहित होता वैसा ।
यज्ञ शिष्ट भोग ही वैसा । होता दोष रहित ॥ २४ ॥
स्वधर्मसे जो किया उपार्जन । स्वधर्ममें व्यय कर सुजन ।
शेषका भोग करके अर्जुन । रहता तुष्ट ॥ २५ ॥
बिन उसके सुन तू पार्थ । आचरना नहीं अन्यथा ।
ऐसी है यह आदिकी कथा । कहता कृष्ण ॥ २६ ॥
जो हैं देहको ही आप मानते । विषय ही को है भोग्य जानते ।
बिन इसके नहीं समझते । दूसरा कुछ ॥ २७ ॥
जीवन है यज्ञोपकरण । न जानकर मोह कारण ।
भ्रमग्रस्त उदर भरण । करते अहंभावसे ॥ २८ ॥
जिव्हा चापल्यसे जो लोक । कराते रुचिकर पाक ।
सेवन करते पातक । पापी जन ॥ २९ ॥
जो है संपत्ति-मात्र संपूर्ण । यज्ञ द्रव्य होनेके कारण ।
करता स्वधर्म-यज्ञार्पण । आदि पुरुषमें ॥ १३० ॥
यज्ञ-शेष अन्न है ब्रह्म—
यह छोड़ कर मूर्ख । अपने लिये ही देख ।
बनवाते हैं सुपाक । नानाविध ॥ ३१ ॥
जिससे यज्ञ सिद्ध होता है । परेशको संतोष होता है ।
यह सामान्य नहीं होता है । अन्न तू जान ॥ ३२ ॥
इसे न मानना तू साधारण । जीवन हेतु होनेके कारण ।
ब्रह्मरूप अन्न है यह जान । विश्वमें सर्वत्र ॥ ३३ ॥
ज्ञानेश्वरी ८८

अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसंभवः ।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥१४॥
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥१५॥
अन्नसे ही हैं भूत । बढ़ते हैं समस्त ।
फिर मेघ अन्नार्थ । बरसते हैं ॥ ३४ ॥
यज्ञसे पर्जन्यका जन्म । यज्ञको प्रसवता है कर्म ।
तथा कर्मका आदि है ब्रह्म । वेद रूप ॥ ३५ ॥
फिर वेदोंका परापर । प्रसवता है अक्षर ।
इसीलिये सचराचर । ब्रह्म-बद्ध ॥ ३६ ॥
किंतु कर्मकी है जो मूर्ति । यज्ञमें अधिष्ठित श्रुति ।
सुन तू हे सुभद्रापति । अखंडित ॥ ३७॥
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥१६॥
पूर्व कर्म-फल भोगके लिये मनुष्य जन्म--
ऐसी है आदि परंपरा । संक्षेपमें धनुर्धरा ।
कही है तुझसे अध्वरा- । केलिये ॥ ३८ ॥
तभी मूलमें यह उचित । स्वधर्म रूप यज्ञ सुकृत ।
आचरण न करते मत्त । इस लोकमें ॥ ३९ ॥
अन्नसे जन्मते जीव वर्षासे अन्न संभव ।
यज्ञसे बरसे वर्षा कर्मसे यज्ञ उद्भव ॥ १४ ॥
ब्रह्मसे कर्म उत्पन्न ब्रह्म अक्षरसे बना ।
सर्वव्यापक जो ब्रह्म यज्ञमें रहता नित ॥ १५ ॥
ऐसा प्रेरक जो चक्र निभाता जगमें नहीं ।
इंद्रियासक्त है पापी खोता है व्यर्थ जीवन ॥ १६ ॥
८९ कर्मयोग
(12)

रचते वे ढेर पातकोंके । भार रूप जानो वे भूमिके ।
कुकर्म करते इंद्रियोंके । तोषार्थ जो ॥ १४० ॥
उनका जन्म कर्म सकल । अर्जुन है अति निष्फल ।
जैसे होता है अभ्र पटल । अकालका ॥ ४१ ॥
अथवा कंठ स्तन हैं अजके । वैसे जीवन है मान उनके ।
जिससे अनुष्ठान स्वधर्मके । घडते नहीं ॥ ४२ ॥
इसीलिये सुन अर्जुन । स्वधर्मको नहीं त्यजना ।
सर्व भावसे है भजना । यही एक ॥ ४३ ॥
शरीर हुवा यदि प्राप्त । वह पूर्व -कर्मानुगत ।
फिर कर्तव्य जो उचित । छोड़ना क्यों ॥ ४४ ॥
सुन तू यह धनुर्धर । प्राप्त कर यह शरीर ।
आलस्य करते गंवार । कर्ममें जो ॥ ४५ ॥
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।
आत्मन्येव च संतुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥१७॥
आत्मलीन ही कर्म मुक्त-
वे रह कर देह धर्ममें । लिप्त नहीं होते हैं कर्ममें ।
रमते हैं जो आत्म रूपमें । अखंडित ॥ ४६ ॥
आत्मबोधमें जो मुदित । अपनेमें हुवा कृतार्थ ।
इसीलिये सहज मुक्त । कर्म संगसे ॥ ४७ ॥
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥१८॥
आत्मामें ही रमता जो तृप्त हो आत्म भोगमें ।
आत्मामें ही सदा तुष्ट वह कर्तव्य मुक्त है ॥ १७ ॥
करे या न करे कर्म उसको ना प्रयोजन ।
न रहा उसका लोभ किसी भी प्राणिमें कहीं ॥ १८ ॥
ज्ञानेश्वरी ९०

आत्महित और लोकहितार्थ कर्म—
तृप्ति हुई है जिसकी । साधना मिटी उसकी ।
बात आत्म-संतोषकी । कर्ममें नहीं ॥ ४८ ॥
जब तक है अर्जुन । आत्म-बोध न लेता मन ।
तब तक है साधना । रहती ही ॥ ४९ ॥
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥१९॥
इसीलिये तू नियत । सभी कामना रहित ।
होकर कर उचित । स्वधर्माचरण ॥ १५० ॥
स्वकर्ममें निष्कामता । अनुकरण किया पार्थ ।
उन्होंने पाया है तत्वता । कैवल्यधाम ॥ ५१ ॥
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।
लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि ॥२०॥
देख तू जानकादिक । कर्मजात है अशेष ।
न छोड़के मोक्ष सुख । पाये यहां ॥ ५२ ॥
इस कारणसे पार्थ । करना कर्ममें आस्था ।
और भी एक है अर्थ । उपकारक ॥ ५३ ॥
अपने आचरण करनेसे । होगा अनुकरण जिससे ।
कर्म लोपकी विपदासे । बचेगा विश्व ॥ ५४॥
जिसने पाया जो पानेका । बीज भी मिटा कामनाका ।
फिर भी कर्तव्य उनका । रहा औरोंकेलिये ॥ ५५ ॥
तथैव नित्य निःसंग कर कर्तव्य कर्म तू ।
निःसंग करके कर्म कैवल्य पद लाभता ॥ १९ ॥
प्राप्त की है कर्मसे ही संसिद्धि जनकादिने ।
कर तू कर्म जो योग्य लोक-संग्रहकेलिये ॥ २० ॥
९१ कर्मयोग

अंधोंको दिखलानेमें जैसे । स-दृष्टि राह चला वैसे ।
आचरणसे धर्म वैसे । सिखाना मूढको ॥ ५६ ॥
ज्ञानी यदि ऐसा न करेंगे । अज्ञानी यह कैसे जानेंगे ।
कैसे धर्माचरण करेंगे । उचित रूपसे ॥ ५७ ॥
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ २१ ॥
बड़े लोग जो जो करते । उसीको धर्म है कहते ।
उसको अन्य आचरते । सामान्य सभी ॥ ५८ ॥
ऐसा होना ही है स्वाभाविक । तभी कर्माचरण आवश्यक ।
विशेष रूपसे है अधिक । संत जनोंको ॥ ५९ ॥
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन ।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥ २२ ॥
मैं स्वयं कर्म रत हूं—
अब दूसरोंकी बात । कहूं क्यों तुझसे पार्थ ।
स्वयं कर्ममें सतत । रहता यहां ॥ १६० ॥
मुझमें है कोई अपूर्णता । अथवा किसी इच्छासे पार्थ ।
मैं स्वधर्माचरण करता । ऐसा कहो तो ॥ ६१ ॥
देखें तो पूर्णत्वकी दृष्टिसे । दूसरा नहीं विश्वमें ऐसे ।
मुझमें बसा बल है ऐसे । जानता तू ॥ ६२ ॥
मृत गुरु-पुत्रको दिया जीवन । तूने देखा है यह कार्य महान ।
औ' मैं कर रहा कर्म सं-लग्न । प्रसन्न चित्तसे ॥ ६३ ॥
जो जो आचरते श्रेष्ठ उसीको दूसरे जन ।
वह जो करता मान्य उसीको अन्य लोग भी ॥ २१ ॥
नहीं कर्तव्य कोयी भी मुझको तीन लोकमें ।
फिर भी मैं सदा पार्थ रहता कर्म-तत्पर ॥ २२ ॥
ज्ञानेश्वरी ९२

यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥२३॥
पर स्वधर्म रत हूं कैसा । सकाम रत रहता वैसा ।
पार्थ उसका उद्देश्य ऐसा । एक ही है ॥ ६४ ॥
प्राणि मात्र यहां सकल । हमारे आधीन केवल ।
जिससे रहे वे सरल । स्वधर्ममें रत ॥ ६५ ॥
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ।
संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥२४॥
हम हैं पूर्ण काम होकर । आत्मस्थितिमें ही रह कर ।
करेगी कैसी प्रजा संसार । पार सकल ॥ ६६ ॥
हमारा ही आचरण देखना । उसीका अनुकरण करना ।
है यह प्रजा-जनका अपना । नियम जैसा ॥ ६७ ॥
इसीलिये जो हैं समर्थ । तथा सर्वज्ञतासे युक्त ।
कर्म त्याग नहीं उचित । उसको कभी ॥ ६८ ॥
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।
कुर्याद्विद्वांस्तथाऽसक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् ॥२५॥
अर्जुन फलकी आशासे । आचरता कामुक जैसे ।
कर्म रत रहता वैसे । निरिच्छ ही ॥ ६९ ॥
बड़ोंको सुन पार्थ । सकल लोक-संस्था ।
रक्षणीय है सर्वथा । इसीलिये ॥ १७० ॥
न रहूं मैं कर्म-लीन तजके यदि आलस ।
चलेंगे लोगभी ऐसे सर्वथा इस मार्गसे ॥ २३ ॥
छोडूंगा यदि मैं कर्म होगा विनाश लोकका ।
बनूंगा संकर द्वारा प्रजाका नाश-कारण ॥ २४ ॥
फंसके करता अज्ञ ज्ञानीको मुक्त भावसे ।
करना कर्म वैसे ही लोक-संग्रह हेतुसे ॥ २५ ॥
९३ कर्मयोग

शास्त्रोचित ही बरतना । विश्वको सुपथ बताना ।
अलौकिक नहीं बनना । लोगोंमें कभी ॥ ७१ ॥
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् ।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् ॥ २६॥
आयाससे जो स्तन्य पीता । वह पक्वान्न कैसे खाता ।
शिशुको नहीं दिया जाता । कभी मिष्टान्न ॥ ७२ ॥
वैसे कर्ममें अयोग्यता । उससे कभी नैष्कर्म्यता ।
विनोदमें भी न कहता । अर्जुन कभी मैं ॥ ७३ ॥
लोक संग्रहार्थ कुशलता पूर्वक कर्म—
उन्हे सत्कर्ममें लगाता । उनकी प्रशंसा करता ।
आचरण कर दिखाता । नैष्कर्म्यका ॥ ७४ ॥
सदा जो लोक संग्रहार्थ । रहता है कर्ममें रत ।
वह कर्म बंध रहित । रहता है ॥ ७५ ॥
बहुरूपियोंके राजारानीको जैसे । न चिपकता स्त्री पुरुष-भाव वैसे ।
लोक-संग्रहार्थ कर्म-रत होनेसे । नहीं है कर्म बंधन ॥ ७६ ॥
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
अहंकारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते ॥ २७॥
अजी दूसरेका है भार । यदि अपने सिर पर ।
लिया तो उसका असर । न होगा क्या ॥ ७७ ॥
वैसे हैं शुभाशुभ कर्म । उपजाता प्रकृति-धर्म ।
उसको मूर्ख-मति-भ्रम । कहता "मैंने किया" ॥ ७८ ॥
अहंकार पर आरूढ । ऐसा जो संकुचित मूढ ।
उसको परमार्थ गूढ़ । कहना नहीं ॥ ७९ ॥
अबोध कर्म-निष्ठोंका बुद्धि भेद करो नहीं ।
जगावो कर्ममें चाव करके साम्य भावसे ॥ २६ ॥
होते हैं कर्म जो सारे प्रकृतिके स्वभावसे ।
अहंकारी बना मूढ मानता करता स्वयं ॥ २७ ॥
ज्ञानेश्वरी ९४

यह है जो प्रस्तुत । कहा तुझसे हित ।
पार्थ दे कर चित्त । सुन सब ॥ १८० ॥
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥२८॥
अजी है तत्त्वज्ञानियोंका चित्त । होता प्रकृतिसे अप्रभावित ।
इस प्रकृतिमैसे कर्म जात । होते उत्पन्न ॥ ८१ ॥
देहाभिमान वे तजकर । गुण कर्मको ही पारकर ।
रहते साक्षी रूप होकर । शरीरमें ही ॥ ८२ ॥
अजी शरीरधारी होकर भी । कर्म-बंधसे मुक्त होते तभी ।
जैसे लिप्त न होता सूर्य कभी । विश्वके कर्मसे ॥ ८३ ॥
प्रकृतेर्गुणसंमूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु ।
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्नविचालयेत् ॥२९॥
गुण संग्राममें जो घिरकर । तथा प्रकृतिके वश होकर ।
रत होता कार्यमें निरंतर । वही कर्म बद्ध ॥ ८४ ॥
इंद्रियां सदा गुणाधार । करती अपना व्यापार ।
पर कर्म अपने पर । लेते वे बद्ध ॥ ८५ ॥
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा ।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ॥३०॥
गुण ये और ये कर्म इससे भिन्न मान मैं ।
रहे असंग तत्वज्ञ गुणमें गुण आचर ॥ २८ ॥
डूबे जो गुण कर्मोंमें प्रकृति गुणसे ठगे ।
ऐसे अल्पज्ञ मूढ़ोंको ज्ञानी भ्रांत करे नहीं ॥ २९ ॥
मुझे अध्यात्म बुद्धिसे कर सर्व समर्पण ।
फलाशा ममता सारी छोडके जूझ तू यहां ॥ ३० ॥
९५ कर्मयोग

उठो, स्वधर्माचरणार्थ कर्म करो-
उचित कर्म सभी कर । उन्हें मुझे अर्पण कर ।
चित्त वृत्तिको लीन कर । आत्मामें ही ॥ ८६ ॥
कर्म कर्तृत्वका भान । औ' उसका अभिमान ।
न कर कभी अर्जुन । मनमें भी ॥ ८७ ॥
शरीरासक्तिको छोड़ना । कामना सबको त्यजना ।
समयपे फिर भोगना । प्राप्त भोग ॥ ८८ ॥
कोदंड लेकर अब करमें । चढ़ कर बैठा अब रथमें ।
अलिङ्गन कर वीर वृत्तिमें । शांत भावसे ॥ ८९ ॥
विश्वमें कीर्तिको फैलाओ । स्वधर्मका मान बढ़ावो ।
पापके भारसे छुडावो । पृथ्वीको अब ॥ ९० ॥
अर्जुन ! संदेहको छोड़ दो । संग्राममें ही अब चित्त दो ।
अन्य कछु बोलना त्यज दो । अबसे फिर ॥ ९१ ॥
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥ ३१ ॥ :
आत्म रत कर्मसे विकास, प्रकृति तंत्र कर्मसे विनाश-
यह है मेरा मत यथार्थ । अत्यादरसे आचरणार्थ ।
निष्ठा पूर्वक अनुष्ठानार्थ । कहा अर्जुन ॥ ९२ ॥
सकल कर्ममें हो रत । ऐसा होना कर्म रहित ।
इसीलिये यह निश्चित । है करणीय ॥ ९३ ॥
ये त्वेतदभ्यसूयंतो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् ।
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥ ३२ ॥
मेरा शासन जो नित्य मानते हैं निर्मत्सर ।
श्रद्धासे अज्ञ निष्पाप तोडते कर्म-बंधन ॥ ३१ ॥
किंतु मत्सर-बुद्धिसे मेरा शासन तोड़ते ।
वे ज्ञान-शून्य जो मूढ पाते हैं नाश निश्चित ॥ ३२ ॥
ज्ञानेश्वरी ९६

या प्रकृतिमें रत हो कर । इंद्रियोंको दुलारकर ।
मेरे मतको ठुकरा कर । बरतते हैं ॥ ९४ ॥
तथा इसको तुच्छ मानते । इसकी जो अवज्ञा करते ।
इसे बेकार बात मानते । वाचालतासे ॥ ९५ ॥
हैं ये मोह मदिरासे अमित । विषय बिषमें रत सतत ।
अज्ञान कीचमें पतित नित । निःसंशय ॥ ९६ ॥
शवके हाथमें दिया रत्न । जैसे व्यर्थ जाता है अर्जुन ।
जन्मांधको उदयास्त दिन । अनुपयुक्त ॥ ९७ ॥
या हे चंद्रका उदय जैसा । कागको अनुपयुक्त वैसा ।
मूर्खको है विवेक भी वैसा । अरुचिकर ॥ ९८ ॥
वैसे ही जान तू पार्थ । विमुख जो परमार्थ ।
उनसे बात सर्वथा । न की जाती ॥ ९९ ॥
तभी वे कछु न मानते । निंदा भी करने लगते ।
पतंग कैसे क्या सहते । कभी प्रकाश ? ॥ २०० ॥
दीपसे पतंगका आलिंगन । उनका वहां निश्चित मरण ।
ऐसा होता है विषयाचरण । आत्मघातसा ॥ १ ॥
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि ।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥ ३३ ॥
शरीर नाशवान है—
तभी इंद्रियोंका दुलार । न करें कभी जानकर ।
मन रंजनके खातिर । त्याज्य मान ॥ २ ॥
अजी सापसे क्या खेल होगा । या बाघका साथ क्या निभेगा।
या हलाहल कभी पचेगा । खाया तो ॥ ३ ॥
जैसी खेलमें आग लगती । न संभलते बढ़ती जाती ।
वैसी स्थिति इंद्रियोंकी होती । दुलारनेसे ॥ ४ ॥
ज्ञानीकी कर्म-चेष्टा भी चलती निज भावसे ।
स्वभाव वश हैं प्राणी बलात्कार निरर्थक ॥ ३३ ॥
९७ कर्मयोग
(13)

वैसे तो सुन अर्जुन । शरीर है पराधीन ।
नाना भोग क्यों निर्माण । करें सब ॥ ५ ॥
आयास करके बहुत । सकल ही समृद्ध जात ।
इस देहको अनवरत । पाले क्यों ? ॥ ६ ॥
सर्वस्व तज कर । संपत्तिको पाकर ।
स्वधर्म छोड़कर । पालना देह ॥ ७ ॥
फिर है यह पंच मेलका । अनुसरेगा पंच तत्वका ।
तब अपने किये श्रमका । मूल्य क्या है ? ॥ ८ ॥
केवल शरीर पोषण । धोखा मान असाधारण ।
इस पर अतःकरण । न देना कभी ॥ ९ ॥
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ।
तयोर्न वशमागच्छेत् तो ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥ ३४ ॥
इसलिये स्वधर्माचरण ही करना—
वैसे इंद्रियोंके हितार्थ । विषय दिये नियमित ।
होगा संतोषित चित्त । यह है सच ॥ २१० ॥
किंतु जैसे सभ्य चोरका साथ । केवल समाजमें है विश्वस्थ ।
निश्चित ही है करता जो घात । एकांत आते ही ॥ ११ ॥
अजी विषकी है मधुरता । उपजाती चितमें ममता ।
परिणाममें भयंकरता । प्राणहारी ॥ १२ ॥
जैसे कंटियामें लगाया आमिष । भुलाता है मीनको दिखाके आस ।
वैसे भुलाते हैं विषय सुखाश । इंद्रियोंको ॥ १३ ॥
आमिषमें कांटिया होती । प्राणको वह हर लेती ।
आमिषमें वह छिपी होती । न जानता मीन ॥ १४ ॥
वैसे यहां अभिलाषामें होगा । यदि विषयकी आशा करेगा ।
अभिलाषासे है बलि जायेगा । क्रोधानलका ॥ १५ ॥
इंद्रियोंके स्व-अर्थोंमें रहते राग द्वेष हैं ।
उन्हें वश नहीं होना देहीके पथ-शत्रु वे ॥ ३४ ॥
ज्ञानेश्वरी ९८

शिकारी जैसे घेरकर। देखता है सु-अवसर ।
मारनेमें रहे तत्पर । मृगको सदा ॥ १६ ॥
यहां ऐसा ही होता है । संग उचित नहीं है ।
पार्थ काम औ' क्रोध है । अति घातुक ॥ १७॥
उसका आश्रय नहीं करना । मनमें स्मरण भी न धरना ।
ल्लान नष्ट नहीं होने देना । स्वधर्मकी ॥ १८ ॥
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥ ३५ ॥
स्वधर्ममें मृत्यु भी श्रेष्ठ है—
अजी ! स्वधर्म जो है अर्जुन । यदि आचरणमें कठिन ।
किंतु उसीका है अनुष्ठान । शुभदायक ॥ १९॥
यदि पराया आचार । देखनेमें है सुंदर ।
किंतु करना स्वीकार । अपना ही ॥ २२० ॥
शूद्रके घरके मिष्टान्न । खाये कैसे वह ब्राह्मण ।
हुआ भी है अति उद्विग्न । भूखसे ॥ २१ ॥
करना कैसे अनुचित । अनुचित इच्छाको प्राप्त ।
इच्छा हुई तो अनुचित । वह साधना क्या ? ॥ २२ ॥
दूसरोंका घर सुंदर । देखके अपना कुटीर ।
करें गिरानेका व्यापार । उचित क्या ? ॥ २३ ॥
अजी ! है अपनी सती । यदि कुरूप भी होती ।
संसारमें वही गति । वैसे ही यह ॥ २४ ॥
चाहे जैसे असुविधा-जनक । आचरणमें कष्ट-दायक ।
फिर भी स्वधर्म ही है तारक । इह परमें ॥ २५ ॥
अल्प भी अपना धर्म सु-सेव्य पर-धर्मसे ।
स्वधर्ममें भला मृत्यु पर-धर्म भयंकर ॥ ३५ ॥
९९ कर्मयोग

अजी ! शर्करा तथा दूध । रुचिकर अति प्रसिद्ध ।
है क्रिमिरोगमें निषिद्ध । कैसे सेव्य ॥ २६ ॥
जानकर भी किया सेवन । होगा ही वह दुःख कारण ।
कुपथ्यसे होता है जीवन । अति कष्टकर ॥ २७ ॥
तभी औरोंको जो उचित । अपनेको है अनुचित ।
जो अंतिम हितके हित । अनाचरणीय ॥ २८ ॥
करनेमें स्वधर्मानुष्ठान । नष्ट होता है यदि जीवन ।
तो भी भला है वह अर्जुन । दोनों अर्थसे ॥ २९ ॥
ज्ञान पूर्वक स्वधर्माचरण नहीं करते उनका क्या—
ऐसा समस्त सुरशिरोमणि । बोले जहां श्रीशार्गपाणी ।
अर्जुन कहे वहां विनवणी । सुनो देव ॥ २३० ॥
यह है तेरा कहना । मैंने वह सारा सुना ।
किंतु अब कछु पूछना । मेरे मनकी ॥ ३१ ॥
अर्जुन उवाच
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः ।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥ ३६ ॥
तभी देव यह है कैसा । ज्ञानियोंका स्मृति-भ्रंश-सा ।
पथ-भ्रष्ट होके सहसा । चलते हैं ॥ ३२ ॥
सर्वज्ञ ही हैं वे होते । औ' उपाय भी जानते ।
अधर्ममें व्यभिचरते । वह किस गुणसे ॥ ३३ ॥
अजी ! बीज तथा है भूसा । अंध न जाने चुनना कैसा ।
क्षण भर चतुर भी वैसा । बहकता क्यों ? ॥ ३४ ॥
जो संसारका संग भी हैं छोड़ते । वे संग संसर्गसे गुप्त न होते ।
वनवास छोड़कर भी हैं आते । जन-पदमें ॥ ३५ ॥
अर्जुनने कहा
मनुष्य करता पाप किसकी प्रेरणा लिये ।
जुता हुवा व्यर्थका-सा स्वेच्छाके प्रतिकूल भी ॥ ३६ ॥
ज्ञानेश्वरी १००

स्वयं पापसे हैं हटते । सर्वस्वसे अलिप्त होते ।
फिर उसीमें आ पचते । बलात्कारसे ॥ ३६ ॥
जिससे अरुचि है मनसे । वे ही आ चिपकते चितसे ।
टालना चाहें सतत जिसे । वही लिपटते हैं ॥ ३७ ॥
दीखता यहां बलात्कार । यहां चलता किसका जोर ।
जानना चाहूं चक्रधर । कहता पार्थ ॥ ३८ ॥
हृदय कमलका आराम । योगियोंका जो निष्काम ।
कहता है श्री पुरुषोत्तम । कहता हूं सुन ॥ ३९ ॥
भगवान उवाच
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥ ३७ ॥
इसका मूल रजोगुण—
अजी ! सुन ये कामक्रोध जो हैं । इनमें दयाका नाम नहीं है।
ये कृतांत यमके ही सम हैं । मान ले तू ॥ ३४० ॥
ये हैं ज्ञान निधिके भुजंग । विषय काननके हैं बाघ ।
भजन मार्गके हैं ये मांग । अति घातुक ॥ ४१ ॥
ये हैं देह दुर्गके आधार । इंद्रिय ग्रामके सरदार ।
अविवेक करते गदर । विश्वमें सब ॥ ४२ ॥
रजो गुण है मनका । मूल है असुरताका ।
पोषण किया इनका । अविद्याने ॥ ४३ ॥
यदि हैं ये रजसे संपन्न । किंतु हैं तमसे भी अभिन्न ।
तभी उसने दिया आसन । प्रमाद मोहका ॥ ४४ ॥
मृत्यु नगरके भीतर । मान है इनका अपार ।
करते जीवनका वैर । इसीलिये ॥ ४५ ॥
श्री भगवानने कहा
यह तो काम औ' क्रोध जो रजो-गुणसे बने ।
बडे खाऊ तथा पापी वैरी हैं जान तू इन्हे ॥ ३७ ॥
१०१ कर्मयोग

इनकी भूखकी अभिलाष । जो कहती विश्वं है एक ग्रास ।
इसकी प्रबंधक है आस । जो असीम ॥ ४६ ॥
लीलामें जब यह मुट्ठी कसती । चौदहों भुवनोंको ओछा मानती ।
इसकी भगिनी भ्रांति कहलाती । अति लाड़ली ॥ ४७ ॥
कौर बनाकर इक लोकत्रयका । खेल खेलती सहज निगलनेका ।
दासी-पनमें इठलाती है भ्रांतिका । तृष्णा वहां ॥ ४८ ॥
होता है वहां मोहका सम्मान । जिससे अहंका है लेन-देन ।
सर्वत्र करता तांडव महान । चातुर्यसे जो ॥ ४९ ॥
सत्यका जिसने सार निकाल कर । उसमें अकृत्यका भूसा भरकर ।
दंभ रूढ किया वह विश्वभर । इसने ही ॥२५० ॥
साध्वी शांतिको सुन नग्न किया । हत्यारी मायाका श्रृंगार किया ।
साधु समाजको भ्रष्ट कराया । उनसे यहां ॥ ५१ ॥
नींव मिटा दी विवेककी । खाल उतारी वैराग्यकी ।
गर्दन तोड़ दी निग्रहकी । जीते जी ॥ ५२ ॥
उजाड़ा संतोष वनको । गिराया धैर्यके दुर्गको ।
उखाड़ा आनंद गाछको । जग भरमें ॥ ५३ ॥
उखाड़ा बोध पौधको । पोंछा सुखकी लिपिको ।
हियमें जलायी आगको । तापत्रयकी ॥ ५४ ॥
देहके साथ ये पैदा हुए । जीवके साथ ये जुड़ गए ।
न मिलते बैठे छिपे हुए । ब्रह्मको भी ॥ ५५ ॥
रहते हैं चैतन्यके पडोसमें । बैठते हैं ज्ञानके ही पंगतमें ।
उठते हैं कुहराम मचानेमें । तब रुकते नहीं ॥ ५६ ॥
शस्त्रके बिन ये मारते । डोरके बिन हैं बांधते ।
ज्ञानियोंको तो मिटा देते । प्रतिज्ञापूर्वक ॥ ५७ ॥
जल बिन ये डुबोते हैं । आगके बिन जलाते हैं ।
मौन रह लपेटते हैं । प्राणिमात्रको ॥ ५८ ॥
ज्ञानेश्वरी १०२

बिन कीचडके ये गाड़ते । बिन पाशके भी हैं कसते ।
किसीके हाथमें न आते । काबू कभी ॥ ५९ ॥
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथाऽऽदर्शो मलेन च ।
यथोल्बेनाऽवृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥ ३८ ॥
चंदन वृक्षमें जैसे । लिपट रहता साप वैसे ।
या खोल रहता जैसे । गर्भ पर ॥ २६० ॥
या प्रभाके बिन भानु । हुताशन धूमके बिनु ।
या दर्पण मल हीन । कहीं न रहता ॥ ६१ ॥
ज्ञानके पास ये दुष्ट आ बसते हैं—
इनके बिन ज्ञान नहीं । न देखा है हमने कहीं ।
भूसेके बिन बीज नहीं । उपजता जैसे ॥ ६२ ॥
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा ।
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ॥ ३९ ॥
वैसे ज्ञान है विशुद्ध । किंतु इनसे प्ररुद्ध ।
तभी है हुआ अगाध । पानेमें वह ॥ ६३ ॥
पहले इनको है जीतना । फिर ज्ञानको प्राप्त करना ।
इनका पराभव करना । कष्ट साध्य ॥ ६४ ॥
जब इनको जीतनेमें । घल लावे तब तनमें ।
ईंधन डालनेसे आगमें । जैसे बढती ॥ ६५ ॥
इन्द्रियाणि मनोबुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते ।
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ॥ ४० ॥
ढका है धूमसे अग्नि जैसे दर्पण धूलसे ।
जेरीसे घिरता गर्भ वैसे है ज्ञान कामसे ॥ ३८ ॥
काम-रूप महा अग्नि न होता तृप्त जो कभी ।
ज्ञानीका तो नित्य-शत्रु उसने ज्ञानको ढका ॥ ३९ ॥
इंद्रियां मन औ'बुद्धि इनका आसरा लिये ।
छिपाके ज्ञान जीवोंका करता मोह-ग्रस्त जो ॥४०॥
१०३ कर्मयोग

जो जो साधन है करते । वे सब इन्हीको बढ़ाते ।
इसीलिये येही जीतते । हठयोगियोंको ॥ ६६ ॥
इंद्रिय दमन, इनको जीतनेका उपाय है—
किंतु इन्हे जीतनेमें एक । उपाय है बडा ही नेक ।
करना हो तो करके देख । कहता हूं तुझे ॥ ६७ ॥
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥ ४१ ॥
इंद्रिय इनका पहला आसन । वहांसे ही होते हैं कर्म उत्पन्न ।
करना है इंद्रियोका निर्दलन । सर्वथैव ॥ ६८ ॥
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥ ४२ ॥
दौड रुकेगी मनकी । औ' मुक्ति होगी बुध्दिकी ।
नींव हिलेगी इनकी । ये जो पापी ॥ ६९ ॥
मिटे जब ये अंतरंगसे । तभी गये ये जड मूलसे ।
न रहता मग जल जैसे । सूर्य किरण बिन ॥ २७० ॥
एवं बुद्धे परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥ ४३ ॥
तभी जीवको ब्रह्म-स्वराज्य मिलेगा—
ऐसे रागद्वेष जब मिटता । ब्रह्मात्मका तब स्वराज्य आता ।
फिर वह् आनंद है भोगता । अपने आप ॥ ७१ ॥
इनका पहला स्थान जीतके इंद्रियां सब ।
टाल तू इस पापीको ज्ञान विज्ञान नाशक ॥ ४१ ॥
इंद्रियोंको कहा श्रेष्ठ उससे श्रेष्ठ है मन ।
मनसे बुद्धि है श्रेष्ठ श्रेष्ठ है उससे प्रभु ॥ ४२ ॥
जान ऐसा प्रभु श्रेष्ठ निजको जीत आप ही ।
काम रूपी महा-शत्रु इसका नाश तू कर ॥ ४३ ॥
ज्ञानेश्वरी १०४

गुरु शिष्योंके संवादमें । पद-पिंडके एकत्वमें ।
स्थिर रह नित्य-रूपमें । न उठो कभी ॥ ७२ ॥
अगले अध्यायकी भूमिका—
सिद्ध है जो सकल सिद्धोंका । रमण है श्रीरमादेवीका ।
स्वामी सकल देवादिकोंका । कहने लगा ॥ ७३ ॥
अब पुन वह अनंत । कहेगा आदीकी जो बात ।
जब उनसे पांडुसुत । प्रश्न करेगा ॥ ७४॥
उसके बोल होंगे सरस । उसमें अनुभवेंगे रस ।
श्रोताओंमें उमडेगा उन्मेष । श्रवण सुखका ॥ ७५ ॥
ज्ञानदेव कहे निवृत्तिका । जागृत करके विवेकका ।
आप सुनिये हरि-पार्थका । संवाद सब ॥ ७६ ॥
गीता श्लोक ४३
ज्ञानेश्वरी ओवी २७६
ॐ
(14)

४
ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग
श्रोताओंको ज्ञानेश्वर महाराजका उद्बोधन-
सुकाल हुआ श्रवणेंद्रियोंका । दर्शन हुआ गीता-निधानका ।
अजी ! साकार ही हुआ स्वप्नका । उनको यहां ॥ १ ॥
मूलमें है विवेककी गोष्ठि । कहनेवाला श्रीकृष्ण श्रेष्ठी ।
भक्तराज जो स्वयं किरीटी । सुनते हैं ॥ २ ॥
पंचमालाप है सुगंध । तथा परिमल सुस्वाद ।
वहां है भलासा विनोद । कथानकका ॥ ३ ॥
श्री हरिकी कृपा हुई । अमृतकी गंगा बही ।
तपस्या सफल हुई । श्रोताओंकी ॥ ४ ॥
इंद्रियोंको अब संपूर्ण । बनकर स्वयं श्रवण ।
अनुभवना गीताख्यान । संवाद सुखका ॥ ५ ॥
अब यह अप्रासंगिक । विस्तार छोडके अधिक ।
कहो कृष्णार्जुन हो एक । बोले क्या हैं ॥ ६ ॥
तब संजय बोले राजासे । सुदैव जुड़ा है अर्जुनसे ।
तभी अति प्रीति है उनसे । नारायणकी ॥ ७ ॥
जो न कहा पिता वसुदेवसे । औ' न जो कहा माता देवकीसे ।
या न कहा गुह्य बलभद्रसे । कहा वह पार्थसे ॥ ८ ॥

देवी लक्ष्मी इतनी नजदीक । वह भी न जानती यह सुख ।
कृष्ण प्रेमका फल जो अधिक । मिला अर्जुनको ॥ ९ ॥
थी सनकादिकोंकी जो आस । सुननेकी यह उपदेश ।
किंतु उनको भी ऐसा यश । मिला नहीं ॥ १० ॥
जगदीश्वरका है प्रेम । दीखता यहां निरुपम ।
पार्थने ऐसा सर्वोत्तम । किया पुण्य ॥ ११ ॥
अजी ! जिसकी अति प्रीति । अमूर्तको बनाती व्यक्ति ।
: उसकी है एकात्म स्थिति । जंचती बहु ॥ १२ ॥
योगियोंको जो नहीं मिलता । वेदार्थमें भी जो नहीं आता ।
ध्यानस्थका नहीं पहुंचता । ध्यान चक्षुभी ॥ १३ ॥
ऐसा यह निज स्वरूप । अनादि तथा औ' निष्कंप ।
किंतु कैसा हुआ सरूप । इस भांतिसे ॥ १४ ॥
यह त्रिलोक पटका थान । जो है आकारके परे जान ।
प्रेमसे करमें है अर्जुन । कर लिया है ॥ १५ ॥
भगवान उवाच
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥१॥
इस योगकी प्राचीनता—
कहता है देव पांडुसुत । हमसे यह है विवस्वत ।
सुनी है योगकी गुह्य बात । बहुत पहले ॥ १६ ॥
बोले फिर वह भास्कर । योग स्थिति यह सुंदर ।
पूर्ण रूपसे सुअवसर । मनुसे तब ॥ १७ ॥
मनुने इसका अनुष्ठान । कर दिया ज्ञानोपदेश दान ।
इक्ष्वाकुको, ऐसी है महान । आदि परंपरा ॥ १८ ॥
पहले सूर्यसे मैंने कहा था योग अव्यय ।
मनुसे वह बोला था वह इक्ष्वाकुसे फिर ॥ १ ॥
१०७ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग