ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 161, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंयदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥२३॥
पर स्वधर्म रत हूं कैसा । सकाम रत रहता वैसा ।
पार्थ उसका उद्देश्य ऐसा । एक ही है ॥ ६४ ॥
प्राणि मात्र यहां सकल । हमारे आधीन केवल ।
जिससे रहे वे सरल । स्वधर्ममें रत ॥ ६५ ॥
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ।
संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥२४॥
हम हैं पूर्ण काम होकर । आत्मस्थितिमें ही रह कर ।
करेगी कैसी प्रजा संसार । पार सकल ॥ ६६ ॥
हमारा ही आचरण देखना । उसीका अनुकरण करना ।
है यह प्रजा-जनका अपना । नियम जैसा ॥ ६७ ॥
इसीलिये जो हैं समर्थ । तथा सर्वज्ञतासे युक्त ।
कर्म त्याग नहीं उचित । उसको कभी ॥ ६८ ॥
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।
कुर्याद्विद्वांस्तथाऽसक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् ॥२५॥
अर्जुन फलकी आशासे । आचरता कामुक जैसे ।
कर्म रत रहता वैसे । निरिच्छ ही ॥ ६९ ॥
बड़ोंको सुन पार्थ । सकल लोक-संस्था ।
रक्षणीय है सर्वथा । इसीलिये ॥ १७० ॥
न रहूं मैं कर्म-लीन तजके यदि आलस ।
चलेंगे लोगभी ऐसे सर्वथा इस मार्गसे ॥ २३ ॥
छोडूंगा यदि मैं कर्म होगा विनाश लोकका ।
बनूंगा संकर द्वारा प्रजाका नाश-कारण ॥ २४ ॥
फंसके करता अज्ञ ज्ञानीको मुक्त भावसे ।
करना कर्म वैसे ही लोक-संग्रह हेतुसे ॥ २५ ॥
९३ कर्मयोग