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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 157

अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसंभवः ।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥१४॥
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥१५॥
अन्नसे ही हैं भूत । बढ़ते हैं समस्त ।
फिर मेघ अन्नार्थ । बरसते हैं ॥ ३४ ॥
यज्ञसे पर्जन्यका जन्म । यज्ञको प्रसवता है कर्म ।
तथा कर्मका आदि है ब्रह्म । वेद रूप ॥ ३५ ॥
फिर वेदोंका परापर । प्रसवता है अक्षर ।
इसीलिये सचराचर । ब्रह्म-बद्ध ॥ ३६ ॥
किंतु कर्मकी है जो मूर्ति । यज्ञमें अधिष्ठित श्रुति ।
सुन तू हे सुभद्रापति । अखंडित ॥ ३७॥
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥१६॥
पूर्व कर्म-फल भोगके लिये मनुष्य जन्म--
ऐसी है आदि परंपरा । संक्षेपमें धनुर्धरा ।
कही है तुझसे अध्वरा- । केलिये ॥ ३८ ॥
तभी मूलमें यह उचित । स्वधर्म रूप यज्ञ सुकृत ।
आचरण न करते मत्त । इस लोकमें ॥ ३९ ॥
अन्नसे जन्मते जीव वर्षासे अन्न संभव ।
यज्ञसे बरसे वर्षा कर्मसे यज्ञ उद्भव ॥ १४ ॥
ब्रह्मसे कर्म उत्पन्न ब्रह्म अक्षरसे बना ।
सर्वव्यापक जो ब्रह्म यज्ञमें रहता नित ॥ १५ ॥
ऐसा प्रेरक जो चक्र निभाता जगमें नहीं ।
इंद्रियासक्त है पापी खोता है व्यर्थ जीवन ॥ १६ ॥
८९ कर्मयोग
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