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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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अंधोंको दिखलानेमें जैसे । स-दृष्टि राह चला वैसे ।
आचरणसे धर्म वैसे । सिखाना मूढको ॥ ५६ ॥
ज्ञानी यदि ऐसा न करेंगे । अज्ञानी यह कैसे जानेंगे ।
कैसे धर्माचरण करेंगे । उचित रूपसे ॥ ५७ ॥
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ २१ ॥
बड़े लोग जो जो करते । उसीको धर्म है कहते ।
उसको अन्य आचरते । सामान्य सभी ॥ ५८ ॥
ऐसा होना ही है स्वाभाविक । तभी कर्माचरण आवश्यक ।
विशेष रूपसे है अधिक । संत जनोंको ॥ ५९ ॥
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन ।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥ २२ ॥
मैं स्वयं कर्म रत हूं—
अब दूसरोंकी बात । कहूं क्यों तुझसे पार्थ ।
स्वयं कर्ममें सतत । रहता यहां ॥ १६० ॥
मुझमें है कोई अपूर्णता । अथवा किसी इच्छासे पार्थ ।
मैं स्वधर्माचरण करता । ऐसा कहो तो ॥ ६१ ॥
देखें तो पूर्णत्वकी दृष्टिसे । दूसरा नहीं विश्वमें ऐसे ।
मुझमें बसा बल है ऐसे । जानता तू ॥ ६२ ॥
मृत गुरु-पुत्रको दिया जीवन । तूने देखा है यह कार्य महान ।
औ' मैं कर रहा कर्म सं-लग्न । प्रसन्न चित्तसे ॥ ६३ ॥
जो जो आचरते श्रेष्ठ उसीको दूसरे जन ।
वह जो करता मान्य उसीको अन्य लोग भी ॥ २१ ॥
नहीं कर्तव्य कोयी भी मुझको तीन लोकमें ।
फिर भी मैं सदा पार्थ रहता कर्म-तत्पर ॥ २२ ॥
ज्ञानेश्वरी ९२