सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 164, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 164

उठो, स्वधर्माचरणार्थ कर्म करो-
उचित कर्म सभी कर । उन्हें मुझे अर्पण कर ।
चित्त वृत्तिको लीन कर । आत्मामें ही ॥ ८६ ॥
कर्म कर्तृत्वका भान । औ' उसका अभिमान ।
न कर कभी अर्जुन । मनमें भी ॥ ८७ ॥
शरीरासक्तिको छोड़ना । कामना सबको त्यजना ।
समयपे फिर भोगना । प्राप्त भोग ॥ ८८ ॥
कोदंड लेकर अब करमें । चढ़ कर बैठा अब रथमें ।
अलिङ्गन कर वीर वृत्तिमें । शांत भावसे ॥ ८९ ॥
विश्वमें कीर्तिको फैलाओ । स्वधर्मका मान बढ़ावो ।
पापके भारसे छुडावो । पृथ्वीको अब ॥ ९० ॥
अर्जुन ! संदेहको छोड़ दो । संग्राममें ही अब चित्त दो ।
अन्य कछु बोलना त्यज दो । अबसे फिर ॥ ९१ ॥
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥ ३१ ॥ :
आत्म रत कर्मसे विकास, प्रकृति तंत्र कर्मसे विनाश-
यह है मेरा मत यथार्थ । अत्यादरसे आचरणार्थ ।
निष्ठा पूर्वक अनुष्ठानार्थ । कहा अर्जुन ॥ ९२ ॥
सकल कर्ममें हो रत । ऐसा होना कर्म रहित ।
इसीलिये यह निश्चित । है करणीय ॥ ९३ ॥
ये त्वेतदभ्यसूयंतो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् ।
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥ ३२ ॥
मेरा शासन जो नित्य मानते हैं निर्मत्सर ।
श्रद्धासे अज्ञ निष्पाप तोडते कर्म-बंधन ॥ ३१ ॥
किंतु मत्सर-बुद्धिसे मेरा शासन तोड़ते ।
वे ज्ञान-शून्य जो मूढ पाते हैं नाश निश्चित ॥ ३२ ॥
ज्ञानेश्वरी ९६