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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 158

रचते वे ढेर पातकोंके । भार रूप जानो वे भूमिके ।
कुकर्म करते इंद्रियोंके । तोषार्थ जो ॥ १४० ॥
उनका जन्म कर्म सकल । अर्जुन है अति निष्फल ।
जैसे होता है अभ्र पटल । अकालका ॥ ४१ ॥
अथवा कंठ स्तन हैं अजके । वैसे जीवन है मान उनके ।
जिससे अनुष्ठान स्वधर्मके । घडते नहीं ॥ ४२ ॥
इसीलिये सुन अर्जुन । स्वधर्मको नहीं त्यजना ।
सर्व भावसे है भजना । यही एक ॥ ४३ ॥
शरीर हुवा यदि प्राप्त । वह पूर्व -कर्मानुगत ।
फिर कर्तव्य जो उचित । छोड़ना क्यों ॥ ४४ ॥
सुन तू यह धनुर्धर । प्राप्त कर यह शरीर ।
आलस्य करते गंवार । कर्ममें जो ॥ ४५ ॥
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।
आत्मन्येव च संतुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥१७॥
आत्मलीन ही कर्म मुक्त-
वे रह कर देह धर्ममें । लिप्त नहीं होते हैं कर्ममें ।
रमते हैं जो आत्म रूपमें । अखंडित ॥ ४६ ॥
आत्मबोधमें जो मुदित । अपनेमें हुवा कृतार्थ ।
इसीलिये सहज मुक्त । कर्म संगसे ॥ ४७ ॥
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥१८॥
आत्मामें ही रमता जो तृप्त हो आत्म भोगमें ।
आत्मामें ही सदा तुष्ट वह कर्तव्य मुक्त है ॥ १७ ॥
करे या न करे कर्म उसको ना प्रयोजन ।
न रहा उसका लोभ किसी भी प्राणिमें कहीं ॥ १८ ॥
ज्ञानेश्वरी ९०