सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
स्मरण नाम विरह
दादू जगत सुपना है गया, चिंतामणि जब जाइ ।
तब ही साचा होत है, आदि अंत उर लाइ ॥ 97 ॥
नांव न आवै तब दुखी, आवै सुख संतोष ।
दादू सेवक राम का, दूजा हर्ष न शोक ॥ 98 ॥
मिले तो सब सुख पाइये, बिछुरे बहु दुःख होइ ।
दादू सुख दुःख राम का, दूजा नाहीं कोइ ॥ 99 ॥
दादू हरि का नाम जल, मैं मीन ता माहिं ।
संगि सदा आनन्द करै, बिछुरत ही मर जाहिं ॥ 100 ॥
दादू राम बिसार कर, जीवैं किहिं आधार ।
ज्यूं चातक जल बूँद को, करै पुकार पुकार ॥ 101 ॥
हम जीवैं इहि आसरे, सुमिरण के आधार ।
दादू छिटके हाथ थैं, तो हमको वार न पार ॥ 102 ॥
पतिव्रत निष्काम स्मरण
दादू नाम निमित रामहि भजै, भक्ति निमित भजि सोइ ।
सेवा निमित सांई भजै, सदा सजीवन होइ ॥ 103 ॥
नाम सम्पूर्णता
दादू राम रसाइन नित चवै, हरि है हीरा साथ ।
सो धन मेरे साइयां, अलख खजाना हाथ ॥ 104 ॥
हिरदै राम रहै जा जन के, ताको ऊरा कौण कहै ।
अठ सिधि, नौ निधि ताके आगे, सनमुख सदा रहै ॥ 105 ॥
वंदित तीनों लोक बापुरा, कैसे दर्श लहै ।
नाम निसान सकल जग ऊपर, दादू देखत है ॥ 106 ॥
दादू सब जग नीधना, धनवंता नहीं कोइ ।
सो धनवंता जाणिये, जाके राम पदार्थ होइ ॥ 107 ॥
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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
संगहि लागा सब फिरै, राम नाम के साथ।
चिंतामणि हिरदै बसै, तो सकल पदार्थ हाथ ॥ 108 ॥
दादू आनन्द आत्मा, अविनाशी के साथ।
प्राणनाथ हिरदै बसै, तो सकल पदार्थ हाथ ॥ 109 ॥
पुरुष प्रकाशित
दादू भावै तहाँ छिपाइए, साच न छाना होइ।
शेष रसातल गगन धू, प्रगट कहिये सोइ ॥ 110 ॥
दादू कहाँ था नारद मुनिजना, कहाँ भक्त प्रहलाद।
परगट तीनों लोक में, सकल पुकारैं साध ॥ 111 ॥
दादू कहाँ शिव बैठा ध्यान धरै, कहाँ कबीरा नाम।
सो क्यों छाना होइगा, जेरु कहैगा राम ॥ 112 ॥
दादू कहाँ लीन शुकदेव था, कहाँ पीपा, रैदास।
दादू साचा क्यों छिपै, सकल लोक प्रकास ॥ 113 ॥
दादू कहाँ था, गोरख, भरथरी, अनंत सिधों का मंत।
परगट गोपीचन्द है, दत्त कहैं सब संत ॥ 114 ॥
अगम अगोचर राखिये, कर कर कोटि जतन।
दादू छाना क्यों रहै, जिस घट राम रतन ॥ 115 ॥
दादू स्वर्ग पयाल में, साचा लेवे नाम।
सकल लोक सिर देखिये, प्रकट सब ही ठाम ॥ 116 ॥
स्मरण लाम्बी रस
सुमिरण का शंसा रह्या, पछितावा मन मांहि।
दादू मीठा राम रस, सगला पिया नांहि ॥ 117 ॥
दादू जैसा नाम था, तैसा लीया नांहि।
हौंस रही यहु जीव में, पछितावा मन मांहि ॥ 118 ॥
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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
स्मरण नाम चितावणी
दादू सिर करवत बहै, बिसरे आत्म राम।
मांहि कलेजा काटिये, जीव नहीं विश्राम ॥ 119 ॥
दादू सिर करवत बहै, राम हिरदै थैं जाइ।
माँहि कलेजा काटिये, काल दसों दिसी खाइ ॥ 120 ॥
दादू सिर करवत बहै, अंग परस नहीं होइ।
मांहि कलेजा काटिये, यहु बिथा न जाणै कोइ ॥ 121 ॥
दादू सिर करवत बहै, नैनहूँ निरखै नांहि।
मांहि कलेजा काटिये, साल रह्या मन मांहि ॥ 122 ॥
नाम चिंतन के फलाफल का विवेचन
जेता पाप सब जग करै, तैता नाम बिसारे होइ।
दादू राम संभालिये, तो येता डारे धोइ ॥ 123 ॥
दादू जब ही राम बिसारिये, तब ही मोटी मार।
खंड खंड कर नाखिये, बीज पड़ै तिहिं बार ॥ 124 ॥
दादू जबही राम बिसारिये, तब ही झंपै काल।
सिर ऊपर करवत बहै, आइ पड़ै जम जाल ॥ 125 ॥
दादू जब ही राम बिसारिये, तब ही कंध बिनाश।
पग पग परलै पिंड पडै, प्राणीजाइ निराश ॥ 126 ॥
दादू जब ही राम बिसारिये, तब ही हाना होइ।
प्राण पिंड सर्वस गया, सुखी न देख्या कोइ ॥ 127 ॥
नाम सम्पूर्णता
साहिब जी के नांव में, बिरहा पीड़ पुकार।
ताला बेली रोवणा, दादू है दीदार ॥ 128 ॥
विरह जागृति स्मरण विधि
साहिब जी के नांव में, भाव भगति विश्वास।
लै समाधि लागा रहै, दादू सांई पास ॥ 129 ॥
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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
साहिब जी के नांव में, मति बुधि ज्ञान विचार।
प्रेम प्रीति स्नेह सुख, दादू ज्योति अपार ॥ 130 ॥
साहिब जी के नांव में, सब कुछ भरे भंडार।
नूर तेज अनन्त है, दादू सिरजनहार ॥ 131 ॥
जिसमें सब कुछ सो लिया, निरंजन का नांउँ।
दादू हिरदै राखिए, मैं बलिहारी जाउँ ॥ 132 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
द्वितीयो स्मरण का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 2 ॥ साखी 132 ॥
दादूराम
राम
सत्यराम
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विरह का अंग
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अथ विरह का अंग-३
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ।। 1 ।।
रतिवंती आरति करै, राम सनेही आव।
दादू औसर अब मिलै, यहु विरहनी का भाव ।। 2 ।।
विरहिनी की विरह दशा और उसका विलाप
पीव पुकारै विरहनी, निशदिन रहे उदास।
राम राम दादू कहै, ताला-बेली प्यास ।। 3 ।।
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श्री दादूवाणी-विरह का अंग 3
विरहीजनों की अनन्यता
मन चित चातक ज्यों रटै, पीव पीव लागी प्यास ।
दादू दर्शन कारणै, पुरवहु मेरी आस ॥ 4 ॥
दादू विरहनी दुख कासनि कहै, कासनि देइ संदेश ।
पंथ निहारत पीव का, विरहनी पलटे केश ॥ 5 ॥
दादू विरहनी दुख कासनि कहै, जानत है जगदीश ।
दादू निशदिन बिरही है, विरहा करवत शीश ॥ 6 ॥
शब्द तुम्हारा ऊजला, चिरिया क्यों कारी ?
तूँही, तूँही निशदिन करूँ, विरहा की जारी ॥ 7 ॥
विरह विलाप
विरहनी रोवै रात दिन, झूरै मन ही मांहिं ।
दादू औसर चल गया, प्रीतम पाये नाहिं ॥ 8 ॥
दादू विरहनी कुरलै कुंज ज्यूं, निशदिन तलफत जाइ ।
राम सनेही कारणै, रोवत रैन विहाइ ॥ 9 ॥
पासैं बैठा सब सुणै, हमकों जवाब न देइ ।
दादू तेरे सिर चढै, जीव हमारा लेइ ॥ 10 ॥
सबको सुखिया देखिये, दुखिया नाहीं कोइ ।
दुखिया दादू दास है, ऐन परस नहीं होइ ॥ 11 ॥
विरहीजनों के दुःख का कारण
साहिब मुख बोलै नहीं, सेवक फिरै उदास ।
यहु बेदन जिय में रहै, दुखिया दादू दास ॥ 12 ॥
पीव बिन पल पल जुग भया, कठिन दिवस क्यों जाइ ।
दादू दुखिया राम बिन, काल रूप सब खाइ ॥ 13 ॥
दादू इस संसार में, मुझसा दुखी न कोइ ।
पीव मिलन के कारणै, मैं जल भरिया रोइ ॥ 14 ॥
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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
ना वह मिलै, न हम सुखी, कहो क्यों जीवन होइ।
जिन मुझको घायल किया, मेरी दारु सोइ ॥ 15 ॥
दर्शन कारण विरहनी, वैरागिन होवै।
दादू विरह बियोगिनी, हरि मारग जोवै ॥ 16 ॥
विरह उपदेश
अति गति आतुर मिलन को, जैसे जल बिन मीन।
सो देखे दीदार को, दादू आतम लीन ॥ 17 ॥
राम बिछोही विरहनी, फिरि मिलन न पावै।
दादू तलपै मीन ज्यूं, तुझ दया न आवै ॥ 18 ॥
दादू जब लग सुरति सिमिटै नहीं, मन निश्चल नहीं होहि।
तब लग पीव परसै नहीं, बड़ी विपति यहु मोहि ॥ 19 ॥
ज्यूं अमली के चित अमल है, सूरे के संग्राम।
निर्धन के चित धन बसै, यों दादू के राम ॥ 20 ॥
ज्यूं चातक के चित जल बसैं, ज्यूं पानी बिन मीन।
जैसे चंद चकोर है, ऐसे दादू हरि सौं कीन ॥ 21 ॥
ज्यूं कुंजर के मन वन बसै, अनल पंखी आकास।
यूं दादू का मन राम सौं, ज्यूं वैरागी वनखंड वास ॥ 22 ॥
भँवरा लुब्धी बास का, मोह्या नाद कुरंग।
यों दादू का मन राम सौं, ज्यों दीपक ज्योति पंतग ॥ 23 ॥
श्रवणा राते नाद सौं, नैनां राते रूप।
जिभ्या राती स्वाद सौं, त्यों दादू एक अनूप ॥ 24 ॥
विरह उपदेश
देह पियारी जीव को, निशदिन सेवा मांहि।
दादू जीवन मरण लौं, कबहूं छाड़ी नांहि ॥ 25 ॥
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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
देह पियारी जीव को, जीव पियारा देह।
दादू हरि रस पाइये, जे ऐसा होइ स्नेह ॥ 26 ॥
प्रेमा भक्ति के बिना सब फीका है
दादू हरदम मांहि दिवान, सेज हमारी पीव है।
देखूँ सो सुबहान, ये इश्क हमारा जीव है ॥ 27 ॥
दादू हरदम मांहि दिवान, कहूँ दरूने दर्द सौं।
दर्द दरूने जाइ, जब देखूँ दीदार कों ॥ 28 ॥
विरह विनती
दादू दरूने दर्दबंद, यहु दिल दर्द न जाइ।
हम दुखिया दीदार के, महरबान दिखलाइ ॥ 29 ॥
मूये पीड़ पुकारतां, बैद न मिलिया आइ।
दादू थोड़ी बात थी, जे टुक दर्श दिखाइ ॥ 30 ॥
दादू मैं भिखारी मंगता, दर्शन देहु दयाल।
तुम दाता दुख भंजता, मेरी करहु संभाल ॥ 31 ॥
छिन बिछोह
क्या जीये में जीवना, बिन दर्शन बेहाल।
दादू सोई जीवना, प्रकट परसन लाल ॥ 32 ॥
इहि जग जीवन सो भला, जब लग हिरदै राम।
राम बिना जे जीवना, सो दादू बेकाम ॥ 33 ॥
विरह विनती
दादू कहु दीदार की, सांई सेती बात।
कब हरि दरशन देहुगे, यहु औसर चलि जात ॥ 34 ॥
बिथा तुम्हारे दर्श की, मोहि व्यापै दिन रात।
दुखी न कीजे दीन को, दर्शन दीजे तात ॥ 35 ॥
दादू इस हियड़े ये साल, पीव बिन क्योंहि न जाइसी।
जब देखूँ मेरा लाल, तब रोम रोम सुख आइसी ॥ 36 ॥
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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
तूं है तैसा प्रकाश कर, अपना आप दिखाइ ।
दादू को दीदार दे, बलि जाऊँ विलंब न लाइ ॥ 37 ॥
दादू पिव जी देखै मुझ को, हौं भी देखूँ पीव ।
हौं देखूँ देखत मिलै, तो सुख पावै जीव ॥ 38 ॥
विरह कसौटी
दादू कहै, तन मन तुम पर वारणैं, कर दीजे कै बार ।
जे ऐसी विधि पाइये, तो लीजे सिरजनहार ॥ 39 ॥
विरह पतिव्रत
दीन दुनी सदके करूँ, टुक देखण दे दीदार ।
तन मन भी छिन छिन करूँ, भिस्त दोजग भी वार ॥ 40 ॥
दादू हम दुखिया दीदार के, तूं दिल थैं दूरि न होइ ।
भावै हमको जाल दे, होना है सो होइ ॥ 41 ॥
विरह पतिव्रत
दादू कहै, जे कुछ दिया हमको, सो सब तुम ही लेहु ।
तुम बिन मन मानै नहीं, दरस आपणां देहु ॥ 42 ॥
दूजा कुछ मांगै नहीं, हमको दे दीदार ।
तूं है तब लग एक टग, दादू के दिलदार ॥ 43 ॥
दादू कहै, तूं है तैसी भक्ति दे, तूं है तैसा प्रेम ।
तूं है तैसी सुरति दे, तूं है तैसा खेम ॥ 44 ॥
दादू कहै, सदिके करूँ शरीर को, बेर बेर बहु भंत ।
भाव भक्ति हित प्रेम ल्यौ, खरा पियारा कंत ॥ 45 ॥
दादू दर्शन की रली, हम को बहुत अपार ।
क्या जाणूं कबही मिले, मेरा प्राण आधार ॥ 46 ॥
दादू कारण कंत के, खरा दुखी बेहाल ।
मीरां मेरा महर कर, दे दर्शन दरहाल ॥ 47 ॥
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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
ताला बेली प्यास बिन, क्यों रस पीया जाइ ।
विरहा दर्शन दर्द सौं, हमको देहु खुदाइ ॥ 48 ॥
ताला बेली पीड़ सौं, विरहा प्रेम पियास ।
दर्शन सेती दीजिये, बिलसै दादू दास ॥ 49 ॥
दादू कहै, हमको अपणां आप दे, इश्क मुहब्बत दर्द ।
सेज सुहाग सुख प्रेम रस, मिल खेलैं लापर्द ॥ 50 ॥
प्रेम भगति माता रहै, ताला बेली अंग ।
सदा सपीड़ा मन रहै, राम रमै उन संग ॥ 51 ॥
प्रेम मगन रस पाइये, भक्ति हेत रुचि भाव ।
विरह बेसास निज नाम सौं, देव दया कर आव ॥ 52 ॥
गई दशा सब बाहुड़ै, जे तुम प्रकटहु आइ ।
दादू ऊजड़ सब बसै, दर्शन देहु दिखाइ ॥ 53 ॥
हम कसिये क्या होइगा, बिड़द तुम्हारा जाइ ।
पीछै ही पछिताहुगे, ताथैं प्रकटहु आइ ॥ 54 ॥
छिन बिछोह
मीयां मैंडा आव घर, वांढी वंता लोइ ।
डुखंडे मुहिंडे गये, मरां विच्छौहे रोइ ॥ 55 ॥
विरह पतिव्रत
है, सो निधि नहिं पाइये, नहीं, सो है भरपूर ।
दादू मन मानै नहीं, ताथैं मरिये झूर ॥ 56 ॥
विरही विरह लक्षण
जिस घट इश्क अलाह का, तिस घट लोही न मांस ।
दादू जियरे जक नहीं, ससकै सांसैं सांस ॥ 57 ॥
रत्ती रब्ब ना बीसरै, मरै संभाल संभाल ।
दादू सुहदा थीर है,आसिक अल्लह नाल ॥ 58 ॥
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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
दादू आसिक रब्ब दा, सिर भी डेवै लाहि ।
अल्लह कारण आपको, साड़े अंदर भाहि ॥ 59 ॥
भोरे भोरे तन करै, वंडे करि कुरवाण ।
मिट्ठा कौड़ा ना लगै, दादू तो हूं साण ॥ 60 ॥
विरही विरह लक्षण
जब लग सीस न सौंपिये, जब लग इश्क न होइ ।
आशिक मरणैं ना डरै, पिया पियाला सोइ ॥ 61 ॥
विरह पतिव्रत
तैं डीनोंई सभु, जे डीये दीदार के।
उंजे लहदी अभु, पसाई दो पाण के॥ 62 ॥
बिचौं सभो दूरि कर, अंदर बिया न पाइ ।
दादू रत्ता हिकदा, मन मोहब्बत लाइ ॥ 63 ॥
विरह उपदेश
दादू इश्क मोहब्बत मस्त मन, तालिब दर दीदार ।
दोस्त दिल हरदम हजूर, यादगार हुसियार ॥ 64 ॥
विरह लक्षण
आशिक एक अल्लाह के, फारिक दुनियां दीन ।
तारिक इस औजूद थें, दादू पाक यकीन ॥ 65 ॥
विरह जिज्ञासु उपदेश
आसिकां रह कब्ज कर्दा, दिल वजां रफतांद ।
अल्लह आले नूर दीदम, दिल ही दादू बंद ॥ 66 ॥
दादू इश्क आवाज सौं, ऐसे कहै न कोइ ।
दर्द मोहब्बत पाइये, साहिब हासिल होइ ॥ 67 ॥
विरह विलाप
कहँ आशिक अल्लाह के, मारे अपने हाथ ।
कहँ आलम औजूद सौं, कहै जबां की बात ॥ 68 ॥
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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
दादू इश्क अल्लाह का, जे कबहुँ प्रकटै आइ ।
तो तन मन दिल अरवाह का, सब पड़दा जल जाइ ॥ 69 ॥
विरह जिज्ञासु उपदेश
अरवाहे सिजदा कुनंद, औजूद रा चे कार ।
दादू नूर दादनी, आशिकां दीदार ॥ 70 ॥
विरह ज्ञान अग्नि
विरह अग्नि तन जालिये, ज्ञान अग्नि दौं लाइ ।
दादू नखशिख परजलै, तब राम बुझावै आइ ॥ 71 ॥
विरह अग्नि में जालिबा, दरशन के तांईं ।
दादू आतुर रोइबा, दूजा कुछ नांहिं ॥ 72 ॥
विरह पतिव्रत
साहिब सौं कुछ बल नहीं, जनि हठ साधै कोइ ।
दादू पीड़ पुकारिये, रोतां होइ सो होइ ॥ 73 ॥
ज्ञान ध्यान सब छाड़ दे, जप तप साधन जोग ।
दादू विरहा ले रहै, छाड़ सकल रस भोग ॥ 74 ॥
जहाँ विरहा तहँ और क्या, सुधि, बुधि नाठे ज्ञान ।
लोक वेद मारग तजे, दादू एकै ध्यान ॥ 75 ॥
विरही विरह लक्षण
विरही जन जीवै नहीं, जे कोटि कहैं समझाइ ।
दादू गहिला ह्वै रहै, तलफि तलफि मर जाइ ॥ 76 ॥
दादू तलफै पीड़ सौं, बिरही जन तेरा ।
ससकै सांई कारणै, मिलि साहिब मेरा ॥ 77 ॥
पड़या पुकारै पीड़ सौं, दादू बिरही जन ।
राम सनेही चित बसै, और न भावै मन ॥ 78 ॥
जिस घट विरहा राम का, उस नींद न आवै ।
दादू तलफै विरहनी, उसे पीड़ जगावै ॥ 79 ॥
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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
सारा सूरा नींद भर, सब कोई सोवै ।
दादू घायल दर्दवंद, जागै अरु रोवै ॥ 80 ॥
पीड़ पुराणी ना पड़े, जे अन्तर बेध्या होइ ।
दादू जीवण मरण लौं, पड़या पुकारै सोइ ॥ 81 ॥
दादू बिरही पीड़ सौं, पड़या पुकारै मिंत ।
राम बिना जीवै नहीं, पीव मिलन की चिंत ॥ 82 ॥
जे कबहूँ विरहनी मरै, तो सुरति विरहनी होइ ।
दादू पिव पिव जीवतां, मुवा भी टेरे सोइ ॥ 83 ॥
कथनी बिना करणी
दादू अपनी पीड़ पुकारिये, पीड़ पराई नांहि ।
पीड़ पुकारै सो भला, जाके करक कलेजे मांहि ॥ 84 ॥
विरह विलाप
ज्यूँ जीवत मृतक कारणै, गत कर नाखै आप ।
यूँ दादू कारण राम के, विरही करै विलाप ॥ 85 ॥
दादू तलफि तलफि विरहनी मरै, करि करि बहुत बिलाप ।
विरह अग्नि में जल गई, पीव न पूछै बात ॥ 86 ॥
दादू कहाँ जाऊँ ? कौण पै पुकारूँ ? पीव न पूछै बात ।
पीव बिन चैन न आवई, क्यों भरूँ दिन रात? ॥ 87 ॥
दादू विरह बियोग न सहि सकूँ, मोपै सह्या न जाइ ।
कोई कहो मेरे पीव को, दरस दिखावै आइ ॥ 88 ॥
दादू विरह बियोग न सहि सकूँ, निसदिन सालै मोहि ।
कोई कहो मेरे पीव को, कब मुख देखूँ तोहि ॥ 89 ॥
दादू विरह वियोग न सहि सकूँ, तन मन धरै न धीर ।
कोई कहो मेरे पीव को, मेटे मेरी पीर ॥ 90 ॥
दादू कहै, साध दुखी संसार में, तुम बिन रह्या न जाइ ।
औरों के आनन्द है, सुख सौं रैन बिहाइ ॥ 91 ॥
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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
दादू लाइक हम नहीं, हरि के दर्शन जोग ।
बिन देखे मर जाहिंगे, पीव के विरह वियोग ॥ 92 ॥
दादू सुख सांई सौं, और सबै ही दुख ।
देखूँ दर्शन पीव का, तिस ही लागे सुख ॥ 93 ॥
चन्दन सीतल चन्द्रमा, जल सीतल सब कोइ ।
दादू विरही राम का, इन सौं कदे न होइ ॥ 94 ॥
विरही विरह लक्षण
दादू घायल दरदवंद, अंतरि करै पुकार ।
सांई सुणै सब लोक में, दादू यह अधिकार ॥ 95 ॥
दादू जागे जगतगुरु, जग सगला सोवे ।
विरह जागे पीड़ सौं, जे घाइल होवे ॥ 96 ॥
विरही ज्ञान अग्नि
विरह अग्नि का दाग दे, जीवत मृतक गोर ।
दादू पहली घर किया, आदि हमारी ठौर ॥ 97 ॥
विरह पतिव्रत
दादू देखे का अचरज नहीं, अणदेखे का होइ ।
देखे ऊपर दिल नहीं, अणदेखे को रोइ ॥ 98 ॥
विरह उपजन
पहली आगम विरह का, पीछे प्रीति प्रकाश ।
प्रेम मगन लै लीन मन, तहाँ मिलन की आस ॥ 99 ॥
विरह वियोगी मन भला, सांई का वैराग ।
सहज संतोषी पाइये, दादू मोटे भाग ॥ 100 ॥
दादू तृषा बिना तन प्रीति न ऊपजै, सीतल निकट जल धरिया ।
जन्म लगै जीव पुणग न पीवै, निरमल दह दिस भरिया ॥ 101 ॥
दादू क्षुधा बिना तन प्रीति न ऊपजै, बहु विधि भोजन नेरा ।
जनम लगैं जीव रती न चाखै, पाक पूरि बहु तेरा ॥ 102 ॥
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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
दादू तप्त बिना तन प्रीति न ऊपजै, संग ही शीतल छाया।
जनम लगै जीव जाणै नाही, तरवर त्रिभुवन राया ।। 103 ।।
दादू चोट बिना तन प्रीति न ऊपजै, औषध अंग रहंत।
जनम लगै जीव पलक न परसै, बूटी अमर अनंत ।। 104 ।।
दादू चोट न लागी विरह की, पीड़ न उपजी आइ।
जागै न रोवै धाह दे, सोवत गई बिहाइ ।। 105 ।।
दादू पीड़ न ऊपजी, ना हम करी पुकार।
ताथैं साहिब ना मिल्या, दादू बीती बार ।। 106 ।।
अंदर पीड़ न ऊभरै, बाहर करै पुकार।
दादू सो क्यों करि लहै, साहिब का दीदार ।। 107 ।।
मन ही मांही झूरणां, रोवै मन ही मांहिं।
मन ही मांहीं धाह दे, दादू बाहर नांहिं ।। 108 ।।
बिन ही नैनहुँ रोवाणां, बिन मुख पीड़ पुकार।
बिन ही हाथों पीटणां, दादू बारम्बार ।। 109 ।।
प्रीति न उपजै विरह बिन, प्रेम भक्ति क्यों होइ।
सब झूठै दादू भाव बिन, कोटि करे जे कोइ ।। 110 ।।
दादू बातों विरह न ऊपजै, बातों प्रीति न होइ।
बातों प्रेम न पाइये, जनि रू पतीजै कोइ ।। 111 ।।
विरह उपदेश
दादू तो पीव पाइये, कश्मल है सो जाइ।
निर्मल मन कर आरसी, मूरति मांहि लखाइ ।। 112 ।।
दादू तो पीव पाइये, कर मंझे विलाप।
सुनि है कबहुँ चित्त धरि, परगट होवै आप ।। 113 ।।
दादू तो पीव पाइये, कर सांई की सेव।
काया मांहि लखाइसी, घट ही भीतर देव ।। 114 ।।
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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
दादू तो पीव पाइये, भावै प्रीति लगाइ ।
हेजैं हरि बुलाइये, मोहन मंदिर आइ ॥ 115 ॥
विरह उपजन
दादू जाके जैसी पीड़ है, सो तैसी करै पुकार।
को सूक्ष्म, को सहज में, को मृतक तिहिं बार ॥ 116 ॥
विरह लक्षण
दर्द हि बूझै दर्दवंद, जाके दिल होवे ।
क्या जाणै दादू दर्द की, नींद भरि सोवे ॥ 117 ॥
करणी बिना कथनी
दादू अक्षर प्रेम का, कोइ पढ़ेगा एक।
दादू पुस्तक प्रेम बिन, केते पढें अनेक ॥ 118 ॥
दादू पाती प्रेम की, बिरला बांचै कोइ ।
वेद पुरान पुस्तक पढे, प्रेम बिना क्या होइ ॥ 119 ॥
विरह बाण
दादू कर बिन, शर बिन, कमान बिन, मारे खैंचि कसीस ।
लागी चोट शरीर में, नखशिख सालै सीस ॥ 120 ॥
दादू भलका मारे भेद सौं, सालै मंझि पराण ।
मारणहारा जाणि है, कै जिहिं लागे बाण ॥ 121 ॥
दादू सो शर हमको मार ले, जिहिं शर मिलिये जाइ ।
निशदिन मारग देखिये, कबहुँ लागे आइ ॥ 122 ॥
दादू मारे प्रेम सौं, बेधे साध सुजाण ।
मारणहारे को मिले, दादू बिरही बाण ॥ 123 ॥
जिहि लागी सो जागि है, बेध्या करै पुकार ।
दादू पिंजर पीड़ है, सालै बारम्बार ॥ 124 ॥
विरही सिसकै पीड़ सौं, ज्यूं घायल रण माहिं।
प्रीतम मारे बाण भर, दादू जीवै नाहिं ॥ 125 ॥
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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
दादू विरह जगावे दर्द को, दर्द जगावे जीव।
जीव जगावे सुरति को, पंच पुकारैं पीव ॥ 126 ॥
सहजैं मनसा मन सधै, सहजैं पवना सोइ।
सहजैं पंचों थिर भये, जे चोट विरह की होइ ॥ 127 ॥
मारणहारा रहि गया, जिहिं लागी सो नांहि।
कबहूँ सो दिन होइगा, यहु मेरे मन मांहि ॥ 128 ॥
प्रीतम मारे प्रेम सौं, तिन को क्या मारे।
दादू जारे विरह के, तिन को क्या जारे ॥ 129 ॥
छिन बिछोह
दादू पड़दा पलक का, येता अन्तर होइ।
दादू विरही राम बिन, क्यों कर जीवै सोइ ॥ 130 ॥
विरह लक्षण
काया मांहैं क्यों रह्या, बिन देखे दीदार।
दादू बिरही बावरा, मरै नहीं तिहिं बार ॥ 131 ॥
विरह कसौटी
बिन देखे जीवै नहीं, विरह का सहिनाण।
दादू जीवै जब लगै, तब लग विरह न जाण ॥ 132 ॥
विरह बिनती
रोम-रोम रस प्यास है, दादू करहि पुकार।
राम घटा दल उमंग कर, बरसहु सिरजनहार ॥ 133 ॥
विरह लक्षण
प्रीति जु मेरे पीव की, पैठी पिंजर मांहि।
रोम-रोम पीव-पीव करै, दादू दूसर नांहि ॥ 134 ॥
सब घट श्रवणा सुरति सौं सब घट रसना बैन।
सब घट नैनां है रहै, दादू विरहा ऐन ॥ 135 ॥
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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
विरह विलाप
रात दिवस का रोवणां, पहर पलक का नाहिं ।
रोवत रोवत मिल गया, दादू साहिब माँहि ॥ 136 ॥
दादू नैन हमारे बावरे, रोवें नहीं दिन रात ।
सांई संग न जागही, पीव क्यों पूछे बात ॥ 137 ॥
नैनहुँ नीर न आइया, क्या जाणैं ये रोइ ।
तैसें ही करि रोइये, साहिब नैनहूँ जोइ ॥ 138 ॥
दादू नैन हमारे ढीठ हैं, नाले नीर न जांहि ।
सूके सरां सहेत वै, करंक भये गलि मांहि ॥ 139 ॥
विरही विरह लक्षण
दादू विरह प्रेम की लहर में यह मन पंगुल होइ ।
राम नाम में गलि गया, बूझे बिरला कोइ ॥ 140 ॥
विरह ज्ञान अग्नि
दादू विरह अग्नि में जल गये, मन के मैल विकार ।
दादू विरही पीव का, देखेगा दीदार ॥ 141 ॥
विरह अग्नि में जल गये, मन के विषय विकार ।
ताथैं पंगुल ह्वै रह्या, दादू दर दीदार ॥ 142 ॥
जब विरहा आया दर्द सौं, तब मीठा लगा राम ।
काया लागी काल ह्वै, कड़वे लागे काम ॥ 143 ॥
जब राम अकेला रह गया, तन मन गया बिलाइ ।
दादू विरही तब सुखी, जब दर्श पर्श मिल जाइ ॥ 144 ॥
जे हम छाड़ै राम को, तो राम न छाड़ै ।
दादू अमली अमल तैं, मन क्यों करि काढै ॥ 145 ॥
विरह प्रतिबिम्ब
विरहा पारस जब मिला, तब विरहनी विरहा होइ ।
दादू परसै विरहनी, पीव पीव टेरे सोइ ॥ 146 ॥
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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
आशिक माशूक ह्वै गया, इश्क कहावै सोइ ।
दादू उस माशूक का, अल्लाह आशिक होइ ॥ 147 ॥
राम विरहनी ह्वै रह्या, विरहनी ह्वै गई राम।
दादू विरहा बापुरा, ऐसे कर गया काम ॥ 148 ॥
विरह बिचारा ले गया, दादू हमको आइ ।
जहां अगम अगोचर राम था, तहँ विरह बिना को जाइ ॥ 149 ॥
विरह बापुरा आइ कर, सोवत जगावे जीव।
दादू अंग लगाइ कर, ले पहुँचावे पीव ॥ 150 ॥
विरहा मेरा मीत है, विरहा बैरी नांहि।
विरहा को बैरी कहै, सो दादू किस मांहि ॥ 151 ॥
दादू इश्क अलह की जाति है, इश्क अलह का अंग ।
इश्क अलह वजूदहै, इश्क अलह का रंग ॥ 152 ॥
साध महिमा महात्म
दादू प्रीतम के पग परसिये, मुझ देखण का चाव ।
तहाँ ले सीस नवाइये, जहाँ धरे थे पाँव ॥ 153 ॥
विरह पतिव्रत
बाट विरही की सोधि करि, पंथ प्रेम का लेहु ।
लै के मारग जाइये, दूसर पांव न देहु ॥ 154 ॥
बिरही बेगा भक्ति सहज में, आगे पीछे जाइ ।
थोड़े माहीं बहुत है, दादू रहू लयौ लाइ ॥ 155 ॥
बिरहा बेगा ले मिलै, तालाबैली पीर ।
दादू मन घाइल भया, सालै सकल सरीर ॥ 156 ॥
विरह विनती
आज्ञा अपरंपार की, बसि अंबर भरतार ।
हरे पटंबर पहरि करि, धरती करै सिंगार ॥ 157 ॥
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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
वसुधा सब फूलै फलै, पृथ्वी अनंत अपार ।
गगन गर्ज जल थल भरै, दादू जै जै कार ।। 158 ।।
काला मुँह कर काल का, सांई सदा सुकाल ।
मेघ तुम्हारे घर घणां, बरसहु दीनदयाल ।। 159 ।।
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य तृतीयो विरह का अंग सम्पूर्ण ।। अंग
3 ।। साखी 159 ।।
दादूराम
राम
सत्यराम
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