सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
दादू तो पीव पाइये, भावै प्रीति लगाइ ।
हेजैं हरि बुलाइये, मोहन मंदिर आइ ॥ 115 ॥
विरह उपजन
दादू जाके जैसी पीड़ है, सो तैसी करै पुकार।
को सूक्ष्म, को सहज में, को मृतक तिहिं बार ॥ 116 ॥
विरह लक्षण
दर्द हि बूझै दर्दवंद, जाके दिल होवे ।
क्या जाणै दादू दर्द की, नींद भरि सोवे ॥ 117 ॥
करणी बिना कथनी
दादू अक्षर प्रेम का, कोइ पढ़ेगा एक।
दादू पुस्तक प्रेम बिन, केते पढें अनेक ॥ 118 ॥
दादू पाती प्रेम की, बिरला बांचै कोइ ।
वेद पुरान पुस्तक पढे, प्रेम बिना क्या होइ ॥ 119 ॥
विरह बाण
दादू कर बिन, शर बिन, कमान बिन, मारे खैंचि कसीस ।
लागी चोट शरीर में, नखशिख सालै सीस ॥ 120 ॥
दादू भलका मारे भेद सौं, सालै मंझि पराण ।
मारणहारा जाणि है, कै जिहिं लागे बाण ॥ 121 ॥
दादू सो शर हमको मार ले, जिहिं शर मिलिये जाइ ।
निशदिन मारग देखिये, कबहुँ लागे आइ ॥ 122 ॥
दादू मारे प्रेम सौं, बेधे साध सुजाण ।
मारणहारे को मिले, दादू बिरही बाण ॥ 123 ॥
जिहि लागी सो जागि है, बेध्या करै पुकार ।
दादू पिंजर पीड़ है, सालै बारम्बार ॥ 124 ॥
विरही सिसकै पीड़ सौं, ज्यूं घायल रण माहिं।
प्रीतम मारे बाण भर, दादू जीवै नाहिं ॥ 125 ॥
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