सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
विरह विलाप
रात दिवस का रोवणां, पहर पलक का नाहिं ।
रोवत रोवत मिल गया, दादू साहिब माँहि ॥ 136 ॥
दादू नैन हमारे बावरे, रोवें नहीं दिन रात ।
सांई संग न जागही, पीव क्यों पूछे बात ॥ 137 ॥
नैनहुँ नीर न आइया, क्या जाणैं ये रोइ ।
तैसें ही करि रोइये, साहिब नैनहूँ जोइ ॥ 138 ॥
दादू नैन हमारे ढीठ हैं, नाले नीर न जांहि ।
सूके सरां सहेत वै, करंक भये गलि मांहि ॥ 139 ॥
विरही विरह लक्षण
दादू विरह प्रेम की लहर में यह मन पंगुल होइ ।
राम नाम में गलि गया, बूझे बिरला कोइ ॥ 140 ॥
विरह ज्ञान अग्नि
दादू विरह अग्नि में जल गये, मन के मैल विकार ।
दादू विरही पीव का, देखेगा दीदार ॥ 141 ॥
विरह अग्नि में जल गये, मन के विषय विकार ।
ताथैं पंगुल ह्वै रह्या, दादू दर दीदार ॥ 142 ॥
जब विरहा आया दर्द सौं, तब मीठा लगा राम ।
काया लागी काल ह्वै, कड़वे लागे काम ॥ 143 ॥
जब राम अकेला रह गया, तन मन गया बिलाइ ।
दादू विरही तब सुखी, जब दर्श पर्श मिल जाइ ॥ 144 ॥
जे हम छाड़ै राम को, तो राम न छाड़ै ।
दादू अमली अमल तैं, मन क्यों करि काढै ॥ 145 ॥
विरह प्रतिबिम्ब
विरहा पारस जब मिला, तब विरहनी विरहा होइ ।
दादू परसै विरहनी, पीव पीव टेरे सोइ ॥ 146 ॥
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