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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 69, कुल 504 में से

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पृष्ठ 69

श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
आशिक माशूक ह्वै गया, इश्क कहावै सोइ ।
दादू उस माशूक का, अल्लाह आशिक होइ ॥ 147 ॥
राम विरहनी ह्वै रह्या, विरहनी ह्वै गई राम।
दादू विरहा बापुरा, ऐसे कर गया काम ॥ 148 ॥
विरह बिचारा ले गया, दादू हमको आइ ।
जहां अगम अगोचर राम था, तहँ विरह बिना को जाइ ॥ 149 ॥
विरह बापुरा आइ कर, सोवत जगावे जीव।
दादू अंग लगाइ कर, ले पहुँचावे पीव ॥ 150 ॥
विरहा मेरा मीत है, विरहा बैरी नांहि।
विरहा को बैरी कहै, सो दादू किस मांहि ॥ 151 ॥
दादू इश्क अलह की जाति है, इश्क अलह का अंग ।
इश्क अलह वजूदहै, इश्क अलह का रंग ॥ 152 ॥
साध महिमा महात्म
दादू प्रीतम के पग परसिये, मुझ देखण का चाव ।
तहाँ ले सीस नवाइये, जहाँ धरे थे पाँव ॥ 153 ॥
विरह पतिव्रत
बाट विरही की सोधि करि, पंथ प्रेम का लेहु ।
लै के मारग जाइये, दूसर पांव न देहु ॥ 154 ॥
बिरही बेगा भक्ति सहज में, आगे पीछे जाइ ।
थोड़े माहीं बहुत है, दादू रहू लयौ लाइ ॥ 155 ॥
बिरहा बेगा ले मिलै, तालाबैली पीर ।
दादू मन घाइल भया, सालै सकल सरीर ॥ 156 ॥
विरह विनती
आज्ञा अपरंपार की, बसि अंबर भरतार ।
हरे पटंबर पहरि करि, धरती करै सिंगार ॥ 157 ॥

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