सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
दादू लाइक हम नहीं, हरि के दर्शन जोग ।
बिन देखे मर जाहिंगे, पीव के विरह वियोग ॥ 92 ॥
दादू सुख सांई सौं, और सबै ही दुख ।
देखूँ दर्शन पीव का, तिस ही लागे सुख ॥ 93 ॥
चन्दन सीतल चन्द्रमा, जल सीतल सब कोइ ।
दादू विरही राम का, इन सौं कदे न होइ ॥ 94 ॥
विरही विरह लक्षण
दादू घायल दरदवंद, अंतरि करै पुकार ।
सांई सुणै सब लोक में, दादू यह अधिकार ॥ 95 ॥
दादू जागे जगतगुरु, जग सगला सोवे ।
विरह जागे पीड़ सौं, जे घाइल होवे ॥ 96 ॥
विरही ज्ञान अग्नि
विरह अग्नि का दाग दे, जीवत मृतक गोर ।
दादू पहली घर किया, आदि हमारी ठौर ॥ 97 ॥
विरह पतिव्रत
दादू देखे का अचरज नहीं, अणदेखे का होइ ।
देखे ऊपर दिल नहीं, अणदेखे को रोइ ॥ 98 ॥
विरह उपजन
पहली आगम विरह का, पीछे प्रीति प्रकाश ।
प्रेम मगन लै लीन मन, तहाँ मिलन की आस ॥ 99 ॥
विरह वियोगी मन भला, सांई का वैराग ।
सहज संतोषी पाइये, दादू मोटे भाग ॥ 100 ॥
दादू तृषा बिना तन प्रीति न ऊपजै, सीतल निकट जल धरिया ।
जन्म लगै जीव पुणग न पीवै, निरमल दह दिस भरिया ॥ 101 ॥
दादू क्षुधा बिना तन प्रीति न ऊपजै, बहु विधि भोजन नेरा ।
जनम लगैं जीव रती न चाखै, पाक पूरि बहु तेरा ॥ 102 ॥
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