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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 67, कुल 504 में से

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पृष्ठ 67

श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2

दादू विरह जगावे दर्द को, दर्द जगावे जीव।
जीव जगावे सुरति को, पंच पुकारैं पीव ॥ 126 ॥
सहजैं मनसा मन सधै, सहजैं पवना सोइ।
सहजैं पंचों थिर भये, जे चोट विरह की होइ ॥ 127 ॥
मारणहारा रहि गया, जिहिं लागी सो नांहि।
कबहूँ सो दिन होइगा, यहु मेरे मन मांहि ॥ 128 ॥
प्रीतम मारे प्रेम सौं, तिन को क्या मारे।
दादू जारे विरह के, तिन को क्या जारे ॥ 129 ॥
छिन बिछोह
दादू पड़दा पलक का, येता अन्तर होइ।
दादू विरही राम बिन, क्यों कर जीवै सोइ ॥ 130 ॥
विरह लक्षण
काया मांहैं क्यों रह्या, बिन देखे दीदार।
दादू बिरही बावरा, मरै नहीं तिहिं बार ॥ 131 ॥
विरह कसौटी
बिन देखे जीवै नहीं, विरह का सहिनाण।
दादू जीवै जब लगै, तब लग विरह न जाण ॥ 132 ॥
विरह बिनती
रोम-रोम रस प्यास है, दादू करहि पुकार।
राम घटा दल उमंग कर, बरसहु सिरजनहार ॥ 133 ॥
विरह लक्षण
प्रीति जु मेरे पीव की, पैठी पिंजर मांहि।
रोम-रोम पीव-पीव करै, दादू दूसर नांहि ॥ 134 ॥
सब घट श्रवणा सुरति सौं सब घट रसना बैन।
सब घट नैनां है रहै, दादू विरहा ऐन ॥ 135 ॥

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