सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
दादू सबै दिशा सो सारिखा, सबै दिशा मुख बैन।
सबै दिशा श्रवणहुँ सुनै, सबै दिशा कर नैन ॥ 1 ॥
सबै दिशा पग शीश हैं, सबै दिशा मन चैन।
सबै दिशा सन्मुख रहै, सबै दिशा अंग ऐन ॥ 2 ॥
ॐ सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात।
सभूमिं सर्वतः वत्वा अत्र तिष्ठ दशांगुलम् ॥
57. प्रश्न । पंजाबी त्रिताल
अलख देव गुरु ! देहु बताइ, कहाँ रहो त्रिभुवनपति राइ ॥ टेक ॥
धरती गगन बसहु कैलास, तिहूँ लोक में कहाँ निवास ॥ 1 ॥
जल थल पावक पवनां पूर, चंद सूर निकट कै दूर ॥ 2 ॥
मंदिर कौण, कौण घरबार, आसण कौण कहो करतार ॥ 3 ॥
अलख देव ! गति लखी न जाइ, दादू पूछै कहि समझाइ ॥ 4 ॥
उत्तर की साखी
दादू मुझ ही मांहीं मैं रहूँ, मैं मेरा घरबार।
मुझ ही मांहीं मैं बसूं, आप कहै करतार ॥ 1 ॥
दादू मैं ही मेरा अर्श में,मैं ही मेरा स्थान।
मैं ही मेरी ठौर में, आप कहै रहमान ॥ 2 ॥
दादू मैं ही मेरे आसरे, मैं मेरे आधार।
मेरे तकिये मैं रहूँ, कहै सिरजनहार ॥ 3 ॥
दादू मैं ही मेरी जाति में, मैं ही मेरा अंग।
मैं ही मेरा जीव में, आप कहै प्रसंग ॥ 4 ॥
58. रस त्रिताल
राम रस मीठा रे, कोई पीवै साधु सुजाण।
सदा रस पीवै प्रेम सौं, सो अविनाशी प्राण ॥ टेक ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
इहि रस मुनि लागे सबै, ब्रह्मा विष्णु महेश ।
सुर नर साधू संतजन, सो रस पीवै शेष ॥ 1 ॥
सिध साधक योगी जती, सती सबै शुकदेव ।
पीवत अंत न आवही, ऐसा अलख अभेव ॥ 2 ॥
इहि रस राते नामदेव, पीपा अरु रैदास ।
पीवत कबीरा ना थक्या, अजहूँ प्रेम पियास ॥ 3 ॥
यहु रस मीठा जिन पिया, सो रस ही मांहि समाइ ।
मीठे मीठा मिल रह्या, दादू अनत न जाइ ॥ 4 ॥
59. त्रिताल
मन मतवाला मधु पीवै, पीवै बारम्बारो रे ।
हरि रस रातो राम के, सदा रहै इकतारो रे ॥ टेक ॥
भाव भक्ति भाठी भई, काया कसणी सारो रे ।
पोता मेरे प्रेम का, सदा अखंडित धारो रे ॥ 1 ॥
ब्रह्म अग्नि जौबन जरै, चेतन चितहि उजासो रे ।
सुमति कलाली सारवै, कोई पीवै विरला दासो रे ॥ 2 ॥
प्रीति पियाले पीवही, छिन-छिन बारंबारो रे ।
आपा धन सब सौंपिया, तब रस पाया सारो रे ॥ 3 ॥
आपा पर नहिं जाणिये, भूलो माया जालो रे ।
दादू हरि रस जे पिवै, ताको कदे न लागै कालो रे ॥ 4 ॥
60. पंचम ताल
रस के रसिया लीन भये, सकल शिरोमणि तहाँ गये ॥ टेक ॥
राम रसायन अमृत माते, अविचल भये नरक नहीं जाते ॥ 1 ॥
राम रसायन भर भर पीवै, सदा सजीवन जुग जुग जीवै ॥ 2 ॥
राम रसायन त्रिभुवन सार, राम रसिक सब उतरे पार ॥ 3 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
दादू अमली बहुरि न आये, सुख सागर ता मांहि समाये ॥ 4 ॥
61. भेष । पंचम ताल
भेष न रीझे मेरा निज भर्तार, तातें कीजै प्रीति विचार ॥ टेक ॥
दुराचारिणी रच भेष बनावै, शील साच नहिं पिव को भावै ॥ 1 ॥
कंत न भावै करै श्रृंगार, डिंभपणैं रीझै संसार ॥ 2 ॥
जो पै पतिव्रता ह्वै है नारी, सो धन भावै पियहिं पियारी ॥ 3 ॥
पीव पहचानें आन नहिं कोई, दादू सोई सुहागिनी होई ॥ 4 ॥
62. विरह । घट ताल
सब हम नारी एक भर्तार, सब कोई तन करैं श्रृंगार ॥ टेक ॥
घर घर अपने सेज सँवारैं, कंत पियारे पंथ निहारैं ॥ 1 ॥
आरत अपने पीव को धावैं, मिलै नाह कब अंग लगावैं ॥ 2 ॥
अति आतुर ये खोजत डोलैं, बान परी वियोगिनि बोलैं ॥ 3 ॥
सब हम नारी दादू दीन, दे सुहाग काहू संग लीन ॥ 4 ॥
63. आत्मार्थी भेष । घट ताल
सोई सुहागिनी साच श्रृंगार, तन मन लाइ भजै भर्तार ॥ टेक ॥
भाव भक्ति प्रेम ल्यौ लावै, नारी सोई सार सुख पावै ॥ 1 ॥
सहज संतोंष शील सब आया, तब नारी नाह अमोलक पाया ॥ 2 ॥
तन मन जौबन सौंप सब दीन्हा, तब कंत रिझाइ आप वश कीन्हा ॥ 3 ॥
दादू बहुरि वियोग न होई, पीव सौं प्रीति सुहागिनी सोई ॥ 4 ॥
64. समता । वर्ण भिन्न ताल
तब हम एक भये रे भाई, मोहन मिलि सांची मति आई ॥ टेक ॥
पारस परस भये सुखदाई, तब दुतिया, दुर्मति दूर गँवाई ॥ 1 ॥
मलियागिरि मरम मिल पाया, तब वंश वरण कुल भ्रम गँवाया ॥ 2 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
हरि जल नीर निकट जब आया, तब बूँद बूँद मिल सहज समाया ॥ 3 ॥
नाना भेद भ्रम सब भागा, तब दादू एक रंगै रंग लागा ॥ 4 ॥
65. वर्ण भिन्न ताल
अलह राम छूटा भ्रम मोरा ।
हिंदू तुरक भेद कछु नांही, देखूं दर्शन तोरा ॥ टेक ॥
सोई प्राण पिंड पुनि सोई, सोई लोही मांसा ।
सोई नैन नासिका सोई, सहजैं कीन्ह तमासा ॥ 1 ॥
श्रवणों शब्द बाजता सुणिये, जिह्वा मीठा लागै ।
सोई भूख सबन को व्यापै, एक जुगति सोई जागै ॥ 2 ॥
सोई संधि बंध पुनि सोई, सोई सुख सोई पीरा ।
सोई हस्त पाँव पुनि सोई, सोई एक शरीरा ॥ 3 ॥
यहु सब खेल खालिक हरि तेरा, तैं ही एक कर लीना ।
दादू जुगति जान कर ऐसी, तब यहु प्राण पतीना ॥ 4 ॥
66. नटताल
भाई रे ऐसा पंथ हमारा,
द्वै पख रहित पंथ गह पूरा,अवरण एक अधारा ॥ टेक ॥
वाद-विवाद काहू सौं नांहीं, माहीं जगत तैं न्यारा ।
सम दृष्टि स्वभाव सहज में, आप ही आप विचारा ॥ 1 ॥
मैं तैं मेरी यहु मति नाहीं, निर्वैरी निरकारा ।
पूरण सबै देख आपा पर, निरालंब निरधारा ॥ 2 ॥
काहु के संग मोह न ममता, संगी सिरजनहारा ।
मनही मन सौं समझ सयाना, आनन्द एक अपारा ॥ 3 ॥
काम कल्पना कदे न कीजे, पूरण ब्रह्म पियारा ।
इहि पथ पहुँच पार गह दादू, सो तत सहज संभारा ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
67. परिचय हैरान । नटताल
ऐसो खेल बन्यो मेरी माई, कैसे कहूँ कछु जान्यो न जाई ॥ टेक ॥
सुर नर मुनिजन अचरज आई, राम-चरण को भेद न पाई ॥ 1 ॥
मंदिर माहिं सुरति समाई, कोऊ है सो देहु दिखाई ॥ 2 ॥
मनहिं विचार करहु ल्यौ लाई, दिवा समान कहाँ ज्योति छिपाई ॥ 3 ॥
देह निरंतर शून्य ल्यौ लाई, तहं कौण रमे कौण सूता रे भाई ॥ 4 ॥
दादू न जाणै ये चतुराई, सोइ गुरु मेरा जिन सुधि पाई ॥ 5 ॥
68. निज घर परिचय । पंचम ताल
भाई रे घर ही में घर पाया ।
सहज समाइ रह्यो ता मांही, सतगुरु खोज बताया ॥ टेक ॥
ता घर काज सबै फिर आया, आपै आप लखाया ।
खोल कपाट महल के दीन्हें, स्थिर सुस्थान दिखाया ॥ 1 ॥
भय औ भेद भरम सब भागा, साच सोई मन लाया ।
पिंड परे जहाँ जिव जावै, ता में सहज समाया ॥ 2 ॥
निश्चल सदा चलै नहिं कबहुँ, देख्या सब में सोई ।
ताही सौं मेरा मन लागा, और न दूजा कोई ॥ 3 ॥
आदि अनन्त सोई घर पाया, अब मन अनत न जाई ।
दादू एक रंगै रंग लागा, तामें रह्या समाई ॥ 4 ॥
69. मानस तीर्थ । पंचम ताल
इत है नीर नहावन जोग, अनत हि भ्रम भूला रे लोग ॥ टेक ॥
तिहिं तट न्हाये निर्मल होइ, वस्तु अगोचर लखै रे सोइ ॥ 1 ॥
सुघट घाट अरु तिरबो तीर, बैठे तहाँ जगत-गुरु पीर ॥ 2 ॥
दादू न जाणै तिन का भेव, आप लखावै अंतर देव ॥ 3 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
70. पंजाबी त्रिताल
ऐसा ज्ञान कथो मन ज्ञानी, इहि घर होइ सहज सुख जानी ॥ टेक ॥
गंग जमुन तहँ नीर नहाई, सुषमन नारी रंग लगाई ॥ 1 ॥
आप तेज तन रह्यो समाइ, मैं बलि ताकी देखूँ अघाइ ॥ 2 ॥
वास निरन्तर सो समझाइ, बिन नैनहुँ देखूँ तहाँ जाइ ॥ 3 ॥
दादू रे यहु अगम अपार, सो धन मेरे अधर अधार ॥ 4 ॥
71. परिचय सत्संग । पंजाबी त्रिताल
अब तो ऐसी बन आई, राम-चरण बिन रह्यो न जाई ॥ टेक ॥
साँई को मिलबे के कारण, त्रिकुटी संगम नीर नहाई ।
चरण-कमल की तहँ ल्यौ लागै, जतन जतन कर प्रीति बनाई ॥ 1 ॥
जे रस भीना छावर जावै, सुन्दरी सहजैं संग समाई ।
अनहद बाजे बाजन लागे, जिह्वाहीणैं कीरति गाई ॥ 2 ॥
कहा कहूँ कुछ वरणि न जाई, अविगति अंतर ज्योति जगाई ।
दादू उनको मरम न जानै, आप सुरंगे बैन बजाई ॥ 3 ॥
72. राज मृगांक ताल
नीके राम कहत है बपुरा ।
घर मांही घर निर्मल राखै, पंचों धोवै काया कपरा ॥ टेक ॥
सहज समर्पण सुमिरण सेवा, तिरवेणी तट संजम सपरा ।
सुन्दरी सन्मुख जागण लागी, तहँ मोहन मेरा मन पकरा ॥ 1 ॥
बिन रसना मोहन गुण गावै, नाना वाणी अनुभव अपरा ।
दादू अनहद ऐसे कहिये, भक्ति तत्त यहु मारग सकरा ॥ 2 ॥
73. मनसा गायत्री। राज मृगांक ताल
अवधू ! कामधेनु गहि राखी,
वश कीन्हीं तब अमृत स्रवै, आगै चार न नाखी ॥ टेक ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
पोषंतां पहली उठ गरजै, पीछें हाथ न आवै ।
भूखी भलै दूध नित दूणा, यों या धेनु दुहावै ॥ 1 ॥
ज्यों ज्यों खीण पड़े त्यों दूझै, मुक्ता मेल्यां मारै ।
घाटा रोक घेर घर आणैं, बांधी कारज सारै ॥ 2 ॥
सहजैं बांधी कदे न छूटै, कर्म बंधन छुट जाई ।
काटै कर्म सहज सौं बांधै, सहजैं रहै समाई ॥ 3 ॥
छिन छिन मांहि मनोरथ पूरै, दिन दिन होइ अनन्दा ।
दादू सोई देखतां पावै, कलि अजरावर कंदा ॥ 4 ॥
74. परिचय । कहरवा
जब घट परगट राम मिले ।
आत्म मंगलाचार चहुँ दिशि, जन्म सुफल कर जीत चले ॥ टेक ॥
भक्ति मुक्ति अभय कर राखे, सकल शिरोमणि आप किये ।
निर्गुण राम निरंजन आपै, अजरावर उर लाइ लिये ॥ 1 ॥
अपने अंग संग कर राखे, निर्भय नाम निशान बजावा ।
अविगत नाथ अमर अविनाशी, परम पुरुष निज सो पावा ॥ 2 ॥
सोई बड़भागी सदा सुहागी, परगट प्रीतम संग भये ।
दादू भाग बड़े वर वर कर, सो अजरावर जीत गये ॥ 3 ॥
75.पराभक्ति प्रार्थना । कहरवा
रमैया ! यहु दुख सालै मोहि ।
सेज सुहाग न प्रीति प्रेम रस, दर्शन नांहीं तोहि ॥ टेक ॥
अंग प्रसंग एक रस नांही, सदा समीप न पावै ।
ज्यों रस में रस बहुरि न निकसै, ऐसैं होइ न आवै ॥ 1 ॥
आत्मलीन नहीं निशिवासर, भक्ति अखंडित सेवा ।
सन्मुख सदा परस्पर नाहीं, तातें दुख मोहि देवा ॥ 2 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
मगन गलित महारस माता, तूँ है तब लग पीजै ।
दादू जब लग अंत न आवै, तब लग देखन दीजै ॥ ३ ॥
76. लांबी (अधीरता अस्थिरता) । दादरा
गुरुमुख पाइये रे, ऐसा ज्ञान विचार ।
समझ समझ समझ्या नहीं, लागा रंग अपार ॥ टेक ॥
जांण जांण जांण्यां नहीं, ऐसी उपजै आइ ।
बूझ बूझ बूझया नहीं, ढोरी लागा जाइ ॥ 1 ॥
ले ले ले लीया नहीं, हौंस रही मन मांहि ।
राख राख राख्या नहीं, मैं रस पीया नांहि ॥ 2 ॥
पाय पाय पाया नहीं, तेजैं तेज समाइ ।
कर कर कछु किया नहीं, आतम अंग लगाइ ॥ 3 ॥
खेल खेल खेल्या नहीं, सन्मुख सिरजनहार ।
देख देख देख्या नहीं, दादू सेवक सार ॥ 4 ॥
77. गुरु अधीन ज्ञान । दादरा
बाबा ! गुरुमुख ज्ञाना रे, गुरुमुख ध्याना रे ॥ टेक ॥
गुरुमुख दाता गुरुमुख राता, गुरुमुख गवना रे ।
गुरुमुख भवना, गुरुमुख छवना, गुरुमुख रवना रे ॥ 1 ॥
गुरुमुख पूरा, गुरुमुख शूरा, गुरुमुख वाणी रे ।
गुरुमुख देणा, गुरुमुख लेणा, गुरुमुख जाणी रे ॥ 2 ॥
गुरुमुख गहबा, गुरुमुख रहबा, गुरुमुख न्यारा रे ।
गुरुमुख सारा, गुरुमुख तारा, गुरुमुख पारा रे ॥ 3 ॥
गुरुमुख राया, गुरुमुख पाया, गुरुमुख मेला रे ।
गुरुमुख तेजं, गुरुमुख सेजं, दादू खेला रे ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
78. निज स्थान निर्णय । दीपचन्दी
मैं मेरे में हेरा, मध्य मांहिं पीव नेरा ॥ टेक ॥
जहाँ अगम अनूप अवासा, तहँ महापुरुष का वासा।
तहँ जानेगा जन कोई, हरि मांहि समाना सोई ॥ 1 ॥
अखंड ज्योति जहाँ जागै, तहँ राम नाम लयौ लागै।
तहँ राम रहै भरपूरा, हरि संग रहै नहिं दूरा ॥ 2 ॥
तिरवेणी तट तीरा, तहँ अमर अमोलक हीरा।
उस हीरे सौं मन लागा, तब भरम गया भय भागा ॥ 3 ॥
दादू देख हरि पावा, हरि सहजैं संग लखावा।
पूरण परम निधाना, निज निरखत हौं भगवाना ॥ 4 ॥
79. दीपचन्दी
मेरा मन लागा सकल करा, हम निशदिन हिरदै सो धरा ॥ टेक ॥
हम हिरदै मांही हेरा, पीव परगट पाया नेरा।
सो नेरे ही निज लीजै, तब सहजैं अमृत पीजै ॥ 1 ॥
जब मन ही सौं मन लागा, तब ज्योति स्वरूपी जागा।
जब ज्योति स्वरूपी पाया, तब अन्तर मांही समाया ॥ 2 ॥
जब चित्त हि चित्त समाना, हम हरि बिन और न जाना।
जाना जीवन सोई, अब हरि बिन और न कोई ॥ 3 ॥
जब आतम एकै बासा, पर आतम मांहि प्रकाशा।
परकाशा पीव पियारा, सो दादू मिंत हमारा ॥ 4 ॥
(इति राग गौड़ी सम्पूर्णः ॥ 1 ॥ पद 79 ॥ )
(गावै राग गौड़ी, रोटी आवै दौड़ी।)
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राग माली गौड़
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अथ राग माली गौड़ 2
(गायन समय संध्या 6 से रात्रि 9 बजे तक)
४०. नाम महिमा । झपताल
गोविन्द ! नाम तेरा, जीवन मेरा, तारण भवपारा ।
आगे इहि नाम लागे, संतन आधारा ।। टेक ।।
कर विचार तत्त्व सार, पूरण धन पाया ।
अखिल नाम अगम ठाम, भाग हमारे आया ।। 1 ।।
भक्ति मूल मुक्ति मूल, भव-जल निस्तरना ।
भरम कर्म भंजना भय, किल्विष सब हरना ।। 2 ।।
सकल सिद्धि नव निधि, पूरण सब कामा ।
राम रूप तत्त अनूप, दादू निज नामा ।। 3 ।।
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श्री दादूवाणी-राग माली गौड़ 2
४1. करुणा । झपताल
गोविन्द ! कैसे तरिये । नाव नांही खेव नाहीं, राम विमुख मरिये ॥ टेक ॥
ज्ञान नांही ध्यान नांही, लै समाधि नांही ।
विरहा वैराग नांही, पंचों गुण मांही ॥ 1 ॥
प्रेम नांही प्रीति नांही, नांव नांही तेरा ।
भाव नांही भक्ति नांही, कायर जीव मेरा ॥ 2 ॥
घाट नांही बाट नांही, कैसे पग धरिये ।
वार नांही पार नांही, दादू बहु डरिये ॥ 3 ॥
४2. विरह । शंखताल
पीव ! आव हमारे रे, मिलि प्राण पियारे रे, बलि जाऊँ तुम्हारे रे ॥ टेक ॥
सुन सखी सयानी रे, मैं सेव न जानी रे, हौं भई दिवानी रे ॥ 1 ॥
सुन सखी सहेली रे, क्यों रहूँ अकेली रे, हौं खरी दुहेली रे ॥ 2 ॥
हौं करूँ पुकारा रे, सुन सिरजनहारा रे, दादू दास तुम्हारा रे ॥ 3 ॥
४3. शंख ताल
वाल्हा सेज हमारी रे, तूँ आव हौं वारी रे, हौं दासी तुम्हारी रे ॥ टेक ॥
तेरा पंथ निहारूं रे, सुन्दर सेज सँवारूं रे, जियरा तुम्ह पर वारूं रे ॥ 1 ॥
तेरा अंगड़ा पेखूं रे, तेरा मुखड़ा देखूं रे, तब जीवन लेखूं रे ॥ 2 ॥
मिल सुखड़ा दीजे रे, यहु लाहड़ा लीजे रे, तुम देखें जीजे रे ॥ 3 ॥
तेरे प्रेम की माती रे, तेरे रंगड़े राती रे, दादू वारणै जाती रे ॥ 4 ॥
४4. फारसी । शूलताल
दरबार तुम्हारे दरदवंद, पीव पीव पुकारे ।
दीदार दरूने दीजिये, सुन खसम हमारे ॥ टेक ॥
तनहाँ के तन पीर है, सुन तूँ ही निवारे ।
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श्री दादूवाणी-राग माली गौड़ 2
करम करीमा कीजिये, मिल पीव पियारे ॥ 1 ॥
शूल सुलाको सो सहूँ, तेग तन मारे ।
मिल सांई सुख दीजिये, तूँ ही तूँ संभारे ॥ 2 ॥
मैं शुहदा तन सोखता, विरहा दुख जारे ।
जिय तरसै दीदार को, दादू न विसारे ॥ 3 ॥
४5. शंखताल (फारसी)
संइयां तूँ है साहिब मेरा, मैं हूँ बन्दा तेरा ॥ टेक ॥
बन्दा वरदा चेरा तेरा, हुकमी मैं बेचारा ।
मीरां मेहरबान गुसांई, तूँ सिरताज हमारा ॥ 1 ॥
गुलाम तुम्हारा मुल्ला जादा, लौंडा घर का जाया ।
राजिक रिजक जीव तैं दिया, हुकम तुम्हारे आया ॥ 2 ॥
शादील बै हाजिर बंदा, हुकम तुम्हारे मांही ।
जब ही बुलाया तब ही आया, मैं मेवासा नांही ॥ 3 ॥
खसम हमारा सिरजनहारा, साहिब समर्थ सांई ।
मीरां मेरा मेहर मया कर, दादू तुम ही तांई ॥ 4 ॥
४6. करुणा । शंखताल
मुझ थीं कुछ न भया रे, यहु योंही गया रे, पछतावा रह्या रे ॥ टेक ॥
मै शीश न दीया रे, भर प्रेम न पीया रे, मैं क्या कीया रे ॥ 1 ॥
हौं रंग न राता रे, रस प्रेम न माता रे, नहिं गलित गाता रे ॥ 2 ॥
मैं पीव न पाया रे, कीया मन का भाया रे, कुछ होइ न आया रे ॥ 3 ॥
हौं रहूँ उदासा रे, मुझे तेरी आशा रे, कहै दादू दासा रे ॥ 4 ॥
४7. वैराग्य उपदेश । निसारुक ताल
मेरा मेरा छाड़ गँवारा, सिर पर तेरे सिरजनहारा ।
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श्री दादूवाणी-राग माली गौड़ 2
अपने जीव विचारत नांहीं, क्या ले गइला वंश तुम्हारा ॥ टेक ॥
तब मेरा कृत करता नांही, आवत है हंकारा।
काल चक्र सौं खरी परी रे, विसर गया घरबारा ॥ 1 ॥
जाइ तहाँ का संजम कीजै, विकट पंथ गिरिधारा।
दादू रे तन अपना नांहीं, तो कैसे भया संसारा ॥ 2 ॥
४४. निसारुक ताल
दादू दास पुकारे रे, सिर काल तुम्हारे रे, सर सांधे मारे रे ॥ टेक ॥
जम काल निवारी रे, मन मनसा मारी रे, यहु जन्म न हारी रे ॥ 1 ॥
सुख नींद न सोई रे, अपना दुख रोई रे, मन मूल न खोई रे ॥ 2 ॥
सिर भार न लीजी रे, जिसका तिसको दीजी रे, अब ढील न कीजी रे ॥ 3 ॥
यहु औसर तेरा रे, पंथी जाग सवेरा रे, सब बाट बसेरा रे ॥ 4 ॥
सब तरुवर छाया रे, धन जौबन माया रे, यहु काची काया रे ॥ 5 ॥
इस भ्रम न भूली रे, बाजी देख न फूली रे, सुख सागर झूली रे ॥ 6 ॥
रस अमृत पीजी रे, विष का नाम न लीजी रे, कह्या सो कीजी रे ॥ 7 ॥
सब आतम जाणी रे, अपणा पीव पिछाणी रे, यहु दादू वाणी रे ॥ 8 ॥
४९. भक्ति उपदेश । त्रिताल
पूजूं पहली गणपति राइ, पड़िहौं पावों चरणों धाइ।
आगै ह्वै कर तीर लगावै, सहजैं अपने बैन सुनाइ ॥ टेक ॥
कहूँ कथा कुछ कही न जाई, इक तिल में ले सबै समाइ ॥ 1 ॥
गुण हु गहीर धीर तन देही, ऐसा समरथ सबै सुहाइ ॥ 2 ॥
जिस दिशि देखूं ओही है रे, आप रह्या गिरि तरुवर छाइ ॥ 3 ॥
दादू रे आगै क्या होवै, प्रीति पिया कर जोड़ लगाइ ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-राग माली गौड़ 2
९०. परिचय । पंचम ताल
नीको धन हरि कर मैं जान्यौं, मेरे अखई वोही।
आगे पीछे सोई है रे, और न दूजा कोई ॥ टेक॥
कबहूँ न छाडूँ संग पिया को, हरि के दर्शन मोही।
भाग हमारे जो हौं पाऊँ, शरणै आयो तोही ॥ 1 ॥
आनन्द भयो सखी जिय मेरे, चरण कमल को जोई।
दादू हरि को बावरो, बहुरि वियोग न होई ॥ 2 ॥
९१. (फारसी) हित उपदेश । पंचम ताल
बाबा मर्दे मर्दां गोइ, ये दिल पाक कर्दम धोइ ॥ टेक॥
तर्क दुनियाँ दूर कर दिल, फर्ज फारिग होइ।
पैवस्त परवरदिगार सौं, आकिलां सिर सोइ ॥ 1 ॥
मनी मुरदः हिर्स फानी, नफ्स रा पामाल।
बदी रा बरतरफ करदः, नाम नेकी ख्याल ॥ 2 ॥
जिंदगानी मुरदः बाशद, कुंजे कादिर कार।
तालिबां रा हक, हासिल, पासबाने यार ॥ 3 ॥
मर्दे मर्दां सालिकां सर, आशिकां सुलतान।
हजूरी होशियार दादू, इहै गो मैदान ॥ 4 ॥
९२. ईश्वर चरित । त्रिताल
ये सब चरित तुम्हारे मोहना, मोहे सब ब्रह्माण्ड खंडा।
मोहे पवन पानी परमेश्वर, सब मुनि मोहे रवि चंदा ॥ टेक॥
साइर सप्त मोहे धरणी धरा, अष्ट कुली पर्वत मेरु मोहे।
तीन लोक मोहे जगजीवन, सकल भुवन तेरी सेव सोहे ॥ 1 ॥
शिव बिरंचि नारद मुनि मोहे, मोहे सुर सब सकल देवा।
मोहे इन्द्र फणीन्द्र पुनि मोहे, मुनि मोहे तेरी करत सेवा ॥ 2 ॥
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श्री दादूवाणी-राग माली गौड़ 2
अगम अगोचर अपार अपरम्परा, को यहु तेरे चरित न जानैं ।
ये शोभा तुमको सोहे सुन्दर, बलि बलि जाऊँ दादू न जानैं ॥ ३ ॥
९३. गुरु ज्ञान। त्रिताल
ऐसा रे गुरु ज्ञान लखाया, आवै जाइ सो दृष्टि न आया ॥ टेक॥
मन थिर करूँगा, नाद भरूँगा, राम रमूँगा, रस माता ॥ १ ॥
अधर रहूँगा, करम दहूँगा, एक भजूंगा, भगवंता ॥ २ ॥
अलख लखूँगा, अकथ कथूँगा, एक मथूँगा, गोविन्दा ॥ ३ ॥
अगह गहूँगा, अकह कहूँगा, अलह लहूँगा, खोजन्ता ॥ ४ ॥
अचर चरूंगा, अजर जरूंगा, अतिर तिरूंगा, आनन्दा ॥ ५ ॥
यहु तन तारूं, विषय निवारूं, आप उबारूं, साधन्ता ॥ ६ ॥
आऊँ न जाऊँ, उनमनि लाऊँ, सहज समाऊँ, गुणवंता ॥ ७ ॥
नूर पिछाणूं, तेजहि जाणूं, दादू ज्योतिहि देखन्ता ॥ ८ ॥
९४. तत्व उपदेश। पंचम ताल
बंदे हाजिरां हजूर वे, अल्लह आली नूर वे ।
आशिकां रा सिदक साबित, तालिबां भरपूर वे ॥ टेक॥
वजूद में मौजूद है, पाक परवरदिगार वे ।
देख ले दीदार को, गैब गोता मार वे ॥ १ ॥
मौजूद मालिक तख्त खालिक, आशिकां रा ऐन वे ।
गुदर कर दिल मग्ज भीतर, अजब है यहु सैन वे ॥ २ ॥
अर्श ऊपर आप बैठा, दोस्त दाना यार वे ।
खोज कर दिल कब्ज कर ले, दरूने दीदार वे ॥ ३ ॥
हुशियार हाजिर चुस्त करदा, मीरां मेहरवान वे ।
देख ले दर हाल दादू, आप है दीवान वे ॥ ४ ॥
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श्री दादूवाणी-राग माली गौड़ 2
95. वस्तु निर्देश। चौताल
निर्मल तत्त निर्मल तत्त निर्मल तत्त ऐसा।
निर्गुण निज निधि निरंजन, जैसा है तैसा ॥ टेक॥
उतपत्ति आकार नांही, जीव नांही काया।
काल नांही कर्म नांही, रहिता राम राया ॥ 1 ॥
शीत नांही घाम नांही, धूप नांही छाया।
बाव नांही वर्ण नांही, मोह नांही माया ॥ 2 ॥
धरणी आकाश अगम, चंद सूर नांही।
रजनी निशि दिवस नांही, पवना नहीं जांही ॥ 3 ॥
कृत्रिम घट कला नांही, सकल रहित सोई।
दादू निज अगम निगम, दूजा नहीं कोई ॥ 4 ॥
इति राग माली गौड़ सम्पूर्ण ॥ 2 ॥ पद 26 ॥
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अथ राग कल्याण ३
(गायन समय संध्या 6 से 9 रात्रि)
96. उपदेश चेतावनी। त्रिताल
मन मेरे कछु भी चेत गँवार !
पीछे फिर पछतावेगा रे, आवे न दूजी बार ॥ टेक ॥
काहे रे मन भूल्यो फिरत है, काया सोच विचार।
जिन पंथों चलना है तुझ को, सोई पंथ सँवार ॥ 1 ॥
आगै बाट बिषम जो मन रे, जिमि खांडे की धार।
दादू दास सांई सौं सूत कर, कूड़े काम निवार ॥ 2 ॥
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श्री दादूवाणी-राग कल्याण 3
97. परिचय । त्रिताल
जग सौं कहा हमारा, जब देख्या नूर तुम्हारा ॥ टेक ॥
परम तेज घर मेरा, सुख सागर माहिं बसेरा ॥ 1 ॥
झिलमिल अति आनन्दा, तहँ पाया परमानन्दा ॥ 2 ॥
ज्योति अपार अनन्ता, खेलें फाग बसन्ता ॥ 3 ॥
आदि अंत अस्थाना, जन दादू सो पहचाना ॥ 4 ॥
इति राग कल्याण सम्पूर्णः ॥ 3 ॥ पद 2 ॥
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अथ राग कान्हड़ा 4
(गायन समय रात्रि 12 से 3 बजे तक)
94. विरह विनती । वर्ण भिन्नताल
दे दर्शन देखन तेरा, तो जिय जक पावै मेरा ॥ टेक ॥
पीव तूँ मेरी वेदन जानै, हौं कहाँ दुराऊं छानै,
मेरा तुम देखे मन मानै ॥ 1 ॥
पीव करक कलेजे मांही, सो क्योंही निकसै नांही,
पीव पकर हमारी बांही ॥ 2 ॥
पीव रोम रोम दुख सालै, इन पीरों पिंजर जालै,
जीव जाता क्यों ही बालै ॥ 3 ॥
पीव सेज अकेली मेरी, मुझ आरति मिलणै तेरी,
धन दादू वारी फेरी ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-राग कान्हड़ा 4
99. वर्ण भिन्न ताल
आव सलौने देखन दे रे, बलि बलि जाऊँ बलिहारी तेरे ॥ टेक ॥
आव पिया तूँ सेज हमारी, निसदिन देखूं बाट तुम्हारी ॥ 1 ॥
सब गुण तेरे अवगुण मेरे, पीव हमारी आह न ले रे ॥ 2 ॥
सब गुणवंता साहिब मेरा, लाड़ गहेला दादू केरा ॥ 3 ॥
100. पंचम ताल
आव पियारे मींत हमारे, निशदिन देखूं पाँव तुम्हारे ॥ टेक ॥
सेज हमारी पीव सँवारी, दासी तुम्हारी सो धन वारी ॥ 1 ॥
जे तुझ पाऊँ अंग लगाऊँ, क्यों समझाऊँ वारणें जाऊँ ॥ 2 ॥
पंथ निहारूं बाट सँवारूं, दादू तारूं तन मन वारूं ॥ 3 ॥
101. (सिंधी) । पंचम ताल
आ वे सजणां आव, शिर पर धर पाँव।
जानी मैंडा जिन्द असाडे, तूँ रावैंदा राव वे, सजणां आव ॥ टेक ॥
इत्थां उत्थां जित्थां कित्थां, हूँ जीवां तो नाल वे।
मीयां मैंडा आव असाडे, तूँ लालों सिर लाल वे, सजणां आव ॥ 1 ॥
तन भी देवाँ, मन भी देवाँ, देवाँ पिंड पराण वे।
सच्चा सांई मिल इत्थांईं, जिन्द करां कुरबाण वे, सजणां आव ॥ 2 ॥
तूँ पाकों शिर पाक वे, सजणां, तूँ खूबों शिर खूब।
दादू भावे सजणां आवे, तूँ मिट्ठा महबूब वे, सजणां आव ॥ 3 ॥
102. विनती । राज विद्याधर ताल
दयाल अपनै चरणनि मेरा चित्त लगावहु, नीकें ही करी ॥ टेक ॥
नखशिख सुरति सरीर, तूँ नांव रहौं भरी ॥ 1 ॥
मैं अजाण मतिहीण, जम की पाश तैं रहत हूँ डरी ॥ 2 ॥
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