सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
78. निज स्थान निर्णय । दीपचन्दी
मैं मेरे में हेरा, मध्य मांहिं पीव नेरा ॥ टेक ॥
जहाँ अगम अनूप अवासा, तहँ महापुरुष का वासा।
तहँ जानेगा जन कोई, हरि मांहि समाना सोई ॥ 1 ॥
अखंड ज्योति जहाँ जागै, तहँ राम नाम लयौ लागै।
तहँ राम रहै भरपूरा, हरि संग रहै नहिं दूरा ॥ 2 ॥
तिरवेणी तट तीरा, तहँ अमर अमोलक हीरा।
उस हीरे सौं मन लागा, तब भरम गया भय भागा ॥ 3 ॥
दादू देख हरि पावा, हरि सहजैं संग लखावा।
पूरण परम निधाना, निज निरखत हौं भगवाना ॥ 4 ॥
79. दीपचन्दी
मेरा मन लागा सकल करा, हम निशदिन हिरदै सो धरा ॥ टेक ॥
हम हिरदै मांही हेरा, पीव परगट पाया नेरा।
सो नेरे ही निज लीजै, तब सहजैं अमृत पीजै ॥ 1 ॥
जब मन ही सौं मन लागा, तब ज्योति स्वरूपी जागा।
जब ज्योति स्वरूपी पाया, तब अन्तर मांही समाया ॥ 2 ॥
जब चित्त हि चित्त समाना, हम हरि बिन और न जाना।
जाना जीवन सोई, अब हरि बिन और न कोई ॥ 3 ॥
जब आतम एकै बासा, पर आतम मांहि प्रकाशा।
परकाशा पीव पियारा, सो दादू मिंत हमारा ॥ 4 ॥
(इति राग गौड़ी सम्पूर्णः ॥ 1 ॥ पद 79 ॥ )
(गावै राग गौड़ी, रोटी आवै दौड़ी।)
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