सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग माली गौड़ 2
४1. करुणा । झपताल
गोविन्द ! कैसे तरिये । नाव नांही खेव नाहीं, राम विमुख मरिये ॥ टेक ॥
ज्ञान नांही ध्यान नांही, लै समाधि नांही ।
विरहा वैराग नांही, पंचों गुण मांही ॥ 1 ॥
प्रेम नांही प्रीति नांही, नांव नांही तेरा ।
भाव नांही भक्ति नांही, कायर जीव मेरा ॥ 2 ॥
घाट नांही बाट नांही, कैसे पग धरिये ।
वार नांही पार नांही, दादू बहु डरिये ॥ 3 ॥
४2. विरह । शंखताल
पीव ! आव हमारे रे, मिलि प्राण पियारे रे, बलि जाऊँ तुम्हारे रे ॥ टेक ॥
सुन सखी सयानी रे, मैं सेव न जानी रे, हौं भई दिवानी रे ॥ 1 ॥
सुन सखी सहेली रे, क्यों रहूँ अकेली रे, हौं खरी दुहेली रे ॥ 2 ॥
हौं करूँ पुकारा रे, सुन सिरजनहारा रे, दादू दास तुम्हारा रे ॥ 3 ॥
४3. शंख ताल
वाल्हा सेज हमारी रे, तूँ आव हौं वारी रे, हौं दासी तुम्हारी रे ॥ टेक ॥
तेरा पंथ निहारूं रे, सुन्दर सेज सँवारूं रे, जियरा तुम्ह पर वारूं रे ॥ 1 ॥
तेरा अंगड़ा पेखूं रे, तेरा मुखड़ा देखूं रे, तब जीवन लेखूं रे ॥ 2 ॥
मिल सुखड़ा दीजे रे, यहु लाहड़ा लीजे रे, तुम देखें जीजे रे ॥ 3 ॥
तेरे प्रेम की माती रे, तेरे रंगड़े राती रे, दादू वारणै जाती रे ॥ 4 ॥
४4. फारसी । शूलताल
दरबार तुम्हारे दरदवंद, पीव पीव पुकारे ।
दीदार दरूने दीजिये, सुन खसम हमारे ॥ टेक ॥
तनहाँ के तन पीर है, सुन तूँ ही निवारे ।
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