सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
5. विरह विलाप । षटताल
जियरा क्यों रहै रे, तुम्हारे दर्शन बिन बेहाल ॥ टेक ॥
परदा अंतर कर रहे, हम जीवैं किहिं आधार।
सदा संगाती प्रीतमा, अब के लेहु उबार ॥ 1 ॥
गोप्य गुसांइ ह्रै रहे, अब काहे न प्रकट होइ।
राम सनेही संगिया, दूजा नांही कोइ ॥ 2 ॥
अन्तरयामी छिप रहे, हम क्यों जीवैं दूर।
तुम बिन व्याकुल केशवा, नैन रहे जल पूर ॥ 3 ॥
आप अपरछन ह्रै रहे, हम क्यों रैनि बिहाइ।
दादू दर्शन कारणै, तलफ तलफ जीव जाइ ॥ 4 ॥
6. विरह हैरान । त्रिताल
अजहूँ न निकसैं प्राण कठोर।
दर्शन बिना बहुत दिन बीते, सुन्दर प्रीतम मोर ॥ टेक ॥
चार पहर चारों युग बीते, रैनि गँवाई भोर।
अवधि गई अजहूँ नहिं आये, कतहूँ रहे चित-चोर ॥ 1 ॥
कबहूँ नैन निरख नहिं देखे, मारग चितवत तोर।
दादू ऐसे आतुर विरहनी, जैसे चंद चकोर ॥ 2 ॥
7. सुन्दरी श्रृंगार
सो-धन पीवजी साज सँवारी,
अब वेगि मिलो तन जाइ बनवारी ॥ टेक ॥
साज श्रृंगार किया मन मांही, अजहूँ पीव पतीजै नांही ॥ 1 ॥
पीव मिलन को अहिनिशि जागी, अजहूँ मेरी पलक न लागी ॥ 2 ॥
जतन-जतन कर पंथ निहारूँ, पीव भावै त्यों आप सँवारूं ॥ 3 ॥
अब सुख दीजे जाऊँ बलिहारी, कहै दादू सुन विपति हमारी ॥ 4 ॥
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