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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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पृष्ठ 303

श्री दादूवाणी-अबिहड़ का अंग 37
दादू संगी सोई कीजिये, जे कबहूँ पलट न जाइ।
आदि अंत बिहड़ै नही, ता सन यहु मन लाइ ॥ 5 ॥
दादू अबिहड़ आप है, अमर उपावनहार।
अविनाशी आपै रहै, बिनसै सब संसार ॥ 6 ॥
दादू अबिहड़ आप है, साचा सिरजनहार।
आदि अंत बिहड़ै नहीं, बिनसै सब आकार ॥ 7 ॥
दादू अबिहड़ आप है, अविचल रह्या समाइ।
निहचल रमता राम है, जो दीसै सो जाइ ॥ 8 ॥
दादू अबिहड़ आप है, कबहूँ बिहड़े नांहि।
घटै बधै नहीं एक रस, सब उपज खपै उस मांहि ॥ 9 ॥
अबिहड़ अंग बिहड़ै नहीं, अपलट पलट न जाइ।
दादू अघट एक रस, सब में रह्या समाइ ॥ 10 ॥
अन्त समय की साखी
जेते गुण व्यापैं जीव को, तेते तैं तजे रे मन।
साहिब अपणे कारणैं,(भलो निबाह्यो प्रण) ॥ 11 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
सैंतीसवां अबिहड़ काअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 37 ॥ साखी 11 ॥
साखी स्कन्ध पूर्वार्द्ध भाग समाप्त
दादूराम सत्यराम

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