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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 309, कुल 504 में से

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पृष्ठ 309

श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
13. केवल विनती । गजताल
राम सँभालिये रे, विषम दुहेली बार ॥ टेक ॥
मंझ समंदां नावरी रे, बूडे खेवट-बाज।
काढनहारा को नहीं, एक राम बिन आज ॥ 1 ॥
पार न पहुँचै राम बिन, भेरा भवजल मांहि।
तारणहारा एक तूँ, दूजा कोई नांहि ॥ 2 ॥
पार परोहन तो चले, तुम खेवहु सिरजनहार।
भव सागर में डूब है, तुम्ह बिन प्राण अधार ॥ 3 ॥
औघट दरिया क्यों तिरे, बोहिथ बैसणहार।
दादू खेवट राम बिन, कौण उतारे पार ॥ 4 ॥
14. रंग ताल
पार नहीं पाइये रे, राम बिना को निर्वाणहार ॥ टेक ॥
तुम बिन तारण को नहीं, दूभर यहु संसार।
पैरत थाके केशवा, सूझै वार न पार ॥ 1 ॥
विषम भयानक भव-जला, तुम्ह बिन भारी होइ।
तूँ हरि तारण केशवा, दूजा नांही कोइ ॥ 2 ॥
तुम्ह बिन खेवट को नहीं, अतिर तिरा नहिं जाइ।
औघट भेरा डूब है, नांही आन उपाइ ॥ 3 ॥
यहु घट औघट विषम है, डूबत मांहि शरीर ।
दादू कायर, राम बिन, मन नहिं बाँधै धीर ॥ 4 ॥
15. रंग ताल
क्यों हम जीवैं दास गुसाँई, जे तुम छाड़हु समर्थ साँई ॥ टेक ॥
जे तुम जन को मनहिं बिसारा, तो दूसर कौण संभालणहारा ॥ 1 ॥
जे तुम परिहर रहो नियारे, तो सेवक जाइ कवन के द्वारे ॥ 2 ॥

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