सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
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विरह विलाप । पंचमताल
विरहनी को श्रृंगार न भावे, है कोई ऐसा राम मिलावे ॥ टेक ॥
विसरे अंजन मंजन चीरा, विरह व्यथा यहु व्यापै पीरा ॥ 1 ॥
नव-सत थाके सकल श्रृंगारा, है कोई पीड़ मिटावनहारा ॥ 2 ॥
देह गेह नहीं सुधि शरीरा, निशदिन चितवत चातक नीरा ॥ 3 ॥
दादू ताहि न भावे आन, राम बिना भई मृतक समान ॥ 4 ॥ -
करुणा विनती । पंजाबी त्रिताल
अब तो मोहि लागी बाइ, उन निश्चल चित्त लियो चुराइ ॥ टेक ॥
आन न रुचै और नहीं भावै, अगम अगोचर तहँ मन जाइ।
रूप न रेख वर्ण कहूँ कैसा, तिन चरणों चित्त रह्या समाइ ॥ 1 ॥
तिन चरणों चित्त सहज समाना, सो रस भीना तहँ मन धाइ।
अब तो ऐसी बन आई, विष तजैं अरु अमृत खाइ ॥ 2 ॥
कहा करूँ, मेरा वश नांही, और न मेरे अंग सुहाइ।
पल इक दादू देखन पावै, तो जन्म जन्म की तृषा बुझाइ ॥ 3 ॥ -
करुणा विनती । पंजाबी त्रिताल
तूँ जनि छाड़ै केशवा, मेरे और निवाहनहार हो ॥ टेक ॥
अवगुण मेरे देखकर, तूँ ना करि मैला मन।
दीनानाथ दयाल है, अपराधी सेवक जन हो ॥ 1 ॥
हम अपराधी जन्म के, नखशिख भरे विकार।
मेट हमारे अवगुणा, तूँ गरवा सिरजनहार हो ॥ 2 ॥
मैं जन बहुत बिगारिया, अब तुम ही लेहु सँवार ।
समर्थ मेरा सांइयाँ, तूँ आपै आप उधार हो ॥ 3 ॥
तूँ न विसारी केशवा, मैं जन भूला तोहि।
दादू को और निवाह ले, अब जनि छाड़े मोहि हो ॥ 4 ॥
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