सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 294, कुल 504 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 294

श्री दादूवाणी-विनती का अंग 34
ज्यों वह बरत गगन तैं टूटै, कहाँ धरणी कहाँ ठाम।
लागी सुरति अंग तैं छूटै, सो कत जीवे राम ॥ 61 ॥
अन्तरयामी एक तूं, आतम के आधार।
जे तुम छाड़हु हाथ तैं, तो कौन संभालणहार ॥ 62 ॥
तेरा सेवक तुम लगै, तुम्हीं माथै भार।
दादू डूबत रामजी, बेगि उतारो पार ॥ 63 ॥
सत छूटा शूरातन गया, बल पौरुष भागा जाइ।
कोई धीरज ना धरै, काल पहूँता आइ ॥ 64 ॥
संगी थाके संग के, मेरा कुछ न वशाइ।
भाव भक्ति धन लूटिये, दादू दुखी खुदाइ ॥ 65 ॥
परिचय करुणा विनती
दादू जियरे जक नहीं, विश्राम न पावै।
आत्म पाणी लौंण ज्यों, ऐसे होइ न आवै ॥ 66 ॥
दया विनती
दादू तेरी खूबी खूब है, सब नीका लागे।
सुन्दर शोभा काढ़ ले, सब कोई भागे ॥ 67 ॥
विनती
तुम हो तैसी कीजिये, तो छूटेंगे जीव।
हम हैं ऐसी जनि करो, मैं सदके जाऊँ पीव ॥ 68 ॥
अनाथों का आसरा, निरधारों आधार।
निर्धन का धन राम है, दादू सिरजनहार ॥ 69 ॥
साहिब दर दादू खड़ा, निशदिन करै पुकार।
मीरां मेरा मिहर कर, साहिब दे दीदार ॥ 70 ॥
दादू प्यासा प्रेम का, साहिब राम पिलाइ।
प्रकट प्याला देहु भर, मृतक लेहु जिलाइ ॥ 71 ॥

  • 294 -