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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-विनती का अंग 34
अल्लह आली नूर का, भर-भर प्याला देहु ।
हम को प्रेम पिलाइ करि, मतवाला कर लेहु ॥ 72 ॥
तुम को हमसे बहुत हैं, हमको तुमसे नांहि ।
दादू को जनि परिहरै, तूँ रहु नैनहुँ मांहि ॥ 73 ॥
तुम तैं तब ही होइ सब, दरश परश दर हाल ।
हम तैं कबहुं न होइगा, जे बीतहिं जुग काल ॥ 74 ॥
तुम्हीं तैं तुम को मिलैं, एक पलक में आइ ।
हम तैं कबहुँ न होइगा, कोटि कल्प जे जाइ ॥ 75 ॥
छिन बिछोह
साहिब सौं मिल खेलते, होता प्रेम सनेह ।
दादू प्रेम सनेह बिन, खरी दुहेली देह ॥ 76 ॥
साहिब सौं मिल खेलते, होता प्रेम सनेह ।
प्रकट दर्शन देखते, दादू सुखिया देह ॥ 77 ॥
करुणा
तुम को भावै और कुछ, हम कुछ किया और ।
मिहर करो तो छूटिये, नहीं तो नांहीं ठौर ॥ 78 ॥
मुझ भावै सो मैं किया, तुझ भावै सो नांहि ।
दादू गुनहगार है, मैं देख्या मन मांहि ॥ 79 ॥
खुशी तुम्हारी त्यों करो, हम तो मानी हार ।
भावै बन्दा बख्शिये, भावै गह कर मार ॥ 80 ॥
दादू जे साहिब लेखा लिया, तो शीश काट शूली दिया ।
मिहर मया कर फिल किया, तो जीये जीये कर जिया ॥ 81 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम तत्वसारमत-
सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-
ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम्
माहात्म्य चौंतीसवां विनती का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 34 ॥ साखी 81 ॥

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