सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
४. विरह चिन्ता । गजताल
सो दिन कबहूँ आवेगा, दादूड़ा पीव पावेगा ॥ टेक ॥
क्यूं ही अपने अंग लगावेगा, तब सब दुख मेरा जावेगा ॥ 1 ॥
पीव अपने बैन सुनावेगा, तब आनंद अंग न मावेगा ॥ 2 ॥
पीव मेरी प्यास मिटावेगा, तब आपहि प्रेम पिलावेगा ॥ 3 ॥
दे अपना दर्श दिखावेगा, तब दादू मंगल गावेगा ॥ 4 ॥
९. विरह प्रीति । पंचम ताल
तैं मन मोह्यो मोर रे, रह न सकूँ हौं राम जी ॥ टेक ॥
तोरे नांव चित लाइया रे, औरन भया उदास।
साँईं ये समझाइया, हौं संग न छाडूं पास रे ॥ 1 ॥
जाणूं तिलहि न बिछुटूं रे, जनि पछतावा होइ।
गुण तेरे रसना जपूं, सुणसी साँई सोइ रे ॥ 2 ॥
भोरे जन्म गँमाइया रे, चीन्हा नहीं सो सार।
अजहूँ यह अचेत है, और नहीं आधार रे ॥ 3 ॥
पीव की प्रीत तो पाइये रे, जो सिर होवे भाग।
यो तो अनत न जाइसी, रहसी चरणहुँ लाग रे ॥ 4 ॥
अनतैं मन निवारिया रे, मोहि एकै सेती काज।
अनत गये दुख ऊपजै, मोहि एकै सेती राज रे ॥ 5 ॥
साँईं सौं सहजैं रमूँ रे, और नहीं आन देव।
तहाँ मन विलंबिया, जहाँ अलख अभेव रे ॥ 6 ॥
चरण कमल चित लाइया रे, भोरैं ही ले भाव।
दादू जन अचेत है, सहजैं ही तूँ आव रे ॥ 7 ॥
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