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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 292, कुल 504 में से

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पृष्ठ 292

श्री दादूवाणी-विनती का अंग 34
पिंड परोहन सिन्धु जल, भव सागर संसार ।
राम बिना सूझै नहीं, दादू खेवनहार ॥ 39 ॥
यहु घट बोहित धार में, दरिया वार न पार ।
भैभीत भयानक देखकर, दादू करी पुकार ॥ 40 ॥
कलियुग घोर अंधार है, तिसका वार न पार ।
दादू तुम बिन क्यों तिरै, समर्थ सिरजनहार ॥ 41 ॥
काया के वश जीव है, कस कस बँध्या मांहि ।
दादू आत्माराम बिन, क्यों ही छूटै नांहि ॥ 42 ॥
दादू प्राणी बँध्या पंच सौं, क्योंही छूटै नांहि ।
निधणी आया मारिये, यहु जीव काया मांहि ॥ 43 ॥
तुम बिन धणी न धोरी जीव का, यों ही आवै जाइ ।
जे तूँ साँई सत्य है, तो बेगा प्रकटहु आइ ॥ 44 ॥
निधणी आया मारिये, धणी न धोरी कोइ ।
दादू सो क्यूं मारिये, साहिब सिर पर होइ ॥ 45 ॥
दया विनती
राम विमुख जुग जुग दुखी, लख चौरासी जीव ।
जामै मरै जग आवटै, राखणहारा पीव ॥ 46 ॥
पोष प्रति पाल रक्षक
समर्थ सिरजनहार है, जे कुछ करै सो होइ ।
दादू सेवक राख ले, काल न लागै कोइ ॥ 47 ॥
विनती
साँई साचा नाम दे, काल झाल मिट जाइ ।
दादू निर्भय ह्वै रहे, कबहूँ काल न खाइ ॥ 48 ॥
कोई नहिं करतार बिन, प्राण उधारणहार ।
जियरा दुखिया राम बिन, दादू इहि संसार ॥ 49 ॥

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