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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

श्री दादूवाणी-निगुणा का अंग 33
अज्ञ स्वभाव अपलट
सतगुरु चन्दन बावना, लागे रहें भुवंग।
दादू विष छाडैं नहीं, कहा करै सत्संग ॥ 4 ॥
दादू कीड़ा नरक का, राख्या चंदन मांहि।
उलट अपूठा नरक में, चन्दन भावै नांहि ॥ 5 ॥
सतगुरु साधु सुजान है, शिष का गुण नहिं जाइ।
दादू अमृत छाड़ कर, विषय हलाहल खाइ ॥ 6 ॥
कोटि बर्ष लौं राखिये, बंसा चन्दन पास।
दादू गुण लिये रहै, कदे न लागै बास ॥ 7 ॥
कोटि वर्ष लौं राखिये, पत्थर पानी मांहि।
दादू आडा अंग है, भीतर भेदै नांहि ॥ 8 ॥
कोटि वर्ष लौं राखिये, लोहा पारस संग।
दादू रोम का अन्तरा, पलटै नांही अंग ॥ 9 ॥
कोटि वर्ष लौं राखिये, जीव ब्रह्म संग दोइ।
दादू मांहीं वासना, कदे न मेला होइ ॥ 10 ॥
सगुणा निगुणा कृतघ्नी
मूसा जलता देख कर, दादू हंस दयाल।
मान सरोवर ले चल्या, पंखा काटे काल ॥ 11 ॥
सब जीव भुवंगम कूप में, साधु काढैं आइ।
दादू विषहर विष भरे, फिर ताही को खाइ ॥ 12 ॥
दादू दूध पिलाइये, विषहर विष कर लेइ।
गुण का औगुण कर लिया, ताही को दुख देइ ॥ 13 ॥
अज्ञ स्वभाव अपलट
बिन ही पावक जल मुवा, जवासा जल मांहि।
दादू सूखै सींचतां, तो जल को दूषण नांहि ॥ 14 ॥

  • 285 -

श्री दादूवाणी-निगुणा का अंग 33
सगुणा निगुणा कृतघ्नी
सुफल वृक्ष परमार्थी, सुख देवै फल फूल।
दादू ऊपर बैस कर, निगुणा काटै मूल ॥ 15 ॥
दादू सगुणा गुण करै, निगुणा मानै नांहि।
निगुणा मर निष्फल गया, सगुणा साहिब मांहि ॥ 16 ॥
निगुणा गुण मानै नहीं, कोटि करै जे कोइ।
दादू सब कुछ सौंपिये, सो फिर बैरी होइ ॥ 17 ॥
दादू सगुणा लीजिये, निगुणा दीजे डार।
सगुणा सन्मुख राखिये, निगुणा नेह निवार ॥ 18 ॥
सगुणा गुण केते करै, निगुणा न मानै एक।
दादू साधू सब कहैं, निगुणा नरक अनेक ॥ 19 ॥
सगुणा गुण केते करै, निगुणा नाखै ढाहि।
दादू साधू सब कहैं, निगुणा निष्फल जाइ ॥ 20 ॥
सगुणा गुण केते करै, निगुणा न मानै कोइ।
दादू साधु सब कहैं, भला कहाँ तैं होइ ॥ 21 ॥
सगुणा गुण केते करै, निगुणा न मानै नीच।
दादू साधू सब कहैं, निगुणा के सिर मीच ॥ 22 ॥
साहिबजी सब गुण करै, सतगुरु के घट होइ।
दादू काढै काल मुख, निगुणा न मानै कोइ ॥ 23 ॥
साहिबजी सब गुण करै, सतगुरु मांही आइ।
दादू राखै जीव दे, निगुणा मेटै जाइ ॥ 24 ॥
साहिबजी सब गुण करै, सतगुरु का दे संग।
दादू परलै राखिले, निगुणा न पलटै अंग ॥ 25 ॥
साहिब जी सब गुण करै, सतगुरु आडा देइ।
दादू तारै देखतां, निगुणा गुण नहिं लेइ ॥ 26 ॥

  • 286 -

श्री दादूवाणी-निगुणा का अंग 33
सतगुरु दिया राम धन, रहै सुबुद्धि बताइ।
मनसा वाचा कर्मणा, बिलसै वितड़ै खाइ ॥ 27 ॥
किया कृत मेटै नहीं, गुण ही मांहि समाइ।
दादू बधै अनन्त धन, कबहुँ कदे न जाइ ॥ 28 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
तैंतीसवां निगुणा का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 33 ॥ साखी 28 ॥

  • 287 -

विनती का
अंग
अथ विनती का अंग ३४
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥
करूणा
दादू बहुत बुरा किया, तुम्हें न करना रोष।
साहिब समाई का धनी, बन्दे को सब दोष ॥ 2 ॥
दादू बुरा बुरा सब हम किया, सो मुख कह्या न जाइ ।
निर्मल मेरा सांइयाँ, ताको दोष न लाइ ॥ 3 ॥
साँई सेवा चोर मैं, अपराधी बन्दा ।
दादू दूजा को नहीं, मुझ सरीखा गन्दा ॥ 4 ॥

  • 288 -

श्री दादूवाणी-विनती का अंग 34
तिल तिल का अपराधी तेरा,रती रती का चोर ।
पल पल का मैं गुनही तेरा, बख्शो अवगुण मोर ॥ 5 ॥
महा अपराधी एक मैं, सारे इहि संसार ।
अवगुण मेरे अति घणे, अन्त न आवैं पार ॥ 6 ॥
बे मर्यादा मित नहीं, ऐसे किये अपार ।
मैं अपराधी बापजी, मेरे तुम्हीं एक अधार ॥ 7 ॥
दोष अनेक कलंक सब, बहुत बुरे मुझ मांहि ।
मैं किये अपराध सब, तुम तैं छाना नांहि ॥ 8 ॥
गुनहगार अपराधी तेरा, भाजि कहाँ हम जाहिं ।
दादू देख्या शोध सब, तुम बिन कहीं न समाहिं ॥ 9 ॥
आदि अंत लौं आय कर, सुकृत कछू न कीन्ह ।
माया मोह मद मत्सरा, स्वाद सबै चित दीन्ह ॥ 10 ॥
विनती
काम क्रोध संशय सदा, कबहूँ नाम न लीन ।
पाखंड प्रपंच पाप में, दादू ऐसे खीन ॥ 11 ॥
दादू बहु बंधन सौं बंधिया, एक बिचारा जीव ।
अपने बल छूटै नहीं, छोड़नहारा पीव ॥ 12 ॥
दादू बंदीवान है, तूँ बन्दी छोड़ दीवान ।
अब जनि राखो बंदि में, मीरां मेहरबान ॥ 13 ॥
दादू अंतर कालिमा, हिरदै बहुत विकार ।
प्रकट पूरा दूर कर, दादू करै पुकार ॥ 14 ॥
सब कुछ व्यापै राम जी, कुछ छूटा नांही ।
तुम तैं कहाँ छिपाइये, सब देखो मांही ॥ 15 ॥
सबल साल मन में रहै, राम बिसर क्यों जाइ ।
यहु दुख दादू क्यों सहै, साँई करो सहाइ ॥ 16 ॥

  • 289 -

श्री दादूवाणी-विनती का अंग 34
राखणहारा राख तूँ, यहु मन मेरा राखि ।
तुम बिन दूजा को नहीं, साधू बोलैं साखि ॥ 17 ॥
माया विषय विकार तैं, मेरा मन भागे ।
सोई कीजे साँईयाँ, तूँ मीठा लागे ॥ 18 ॥
साँई दीजे सो रति, तूँ मीठा लागे ।
दूजा खारा होइ सब, सूता जीव जागे ॥ 19 ॥
ज्यों आपै देखे आपको, सो नैना दे मुझ ।
मीरां मेरा मेहर कर, दादू देखे तुझ ॥ 20 ॥
विनती
दादू पछतावा रह्या, सके न ठाहर लाइ ।
अर्थ न आया राम के, यहु तन योंही जाइ ॥ 21 ॥
दादू कहै- दिन दिन नवतम भक्ति दे, दिन दिन नवतम नांव ।
दिन दिन नवतम नेह दे, मैं बलिहारी जांव ॥ 22 ॥
साँई संशय दूर कर, कर शंका का नाश ।
भान भ्रम दुविध्या दुख दारुण, समता सहज प्रकाश ॥ 23 ॥
दया विनती
नांही प्रकट ह्वै रह्या, है सो रह्या लुकाइ ।
संइयाँ पड़दा दूर कर, तूँ ह्वै प्रकट आइ ॥ 24 ॥
दादू माया प्रकट ह्वै रही, यों जे होता राम ।
अरस परस मिल खेलते, सब जीव सब ही ठाम ॥ 25 ॥
दया करै तब अंग लगावै, भक्ति अखंडित देवै ।
दादू दर्शन आप अकेला, दूजा हरि सब लेवै ॥ 26 ॥
दादू साध सिखावैं आत्मा, सेवा दिढ कर लेहु ।
पारब्रह्म सौं विनती, दया कर दर्शन देहु ॥ 27 ॥

  • 290 -

श्री दादूवाणी-विनती का अंग 34
साहिब साधु दयालु हैं, हम ही अपराधी ।
दादू जीव अभागिया, अविद्या साधी ॥ 28 ॥
सब जीव तोरैं राम सौं, पै राम न तोरे ।
दादू काचे ताग ज्यों, टूटै त्यों जोरे ॥ 29 ॥
सजीवन
फूटा फेरि संवार कर, ले पहुँचावे ओर ।
ऐसा कोई ना मिलै, दादू गई बहोर ॥ 30 ॥
ऐसा कोई ना मिलै, तन फेरि संवारै ।
बूढे तैं बाला करै, खै काल निवारै ॥ 31 ॥
परच करूणा विनती
गलै विलै कर बीनती, एकमेक अरदास ।
अरस परस करुणा करै, तब द्रवै दादू दास ॥ 32 ॥
साँईं तेरे डर डरूँ, सदा रहूँ भैभीत ।
अजा सिंह ज्यों भय घणा, दादू लिया जीत ॥ 33 ॥
पोख प्रतिपाल रक्षक
दादू पलक मांहि प्रकटै सही, जे जन करैं पुकार ।
दीन दुखी तब देखकर, अति आतुर तिहिं बार ॥ 34 ॥
आगे पीछे संग रहै, आप उठाये भार ।
साधु दुखी तब हरि दुखी, ऐसा सिरजनहार ॥ 35 ॥
सेवक की रक्षा करै, सेवक की प्रतिपाल ।
सेवग की वाहर चढै, दादू दीन दयाल ॥ 36 ॥
विनती सागर तरण
दादू काया नाव समंद में, औघट बूड़े आइ ।
इहि अवसर एक अगाध बिन, दादू कौन सहाइ ॥ 37 ॥
यहु तन भेरा भौजला, क्यों कर लंघे तीर ।
खेवट बिन कैसे तिरै, दादू गहर गंभीर ॥ 38 ॥

  • 291 -

श्री दादूवाणी-विनती का अंग 34
पिंड परोहन सिन्धु जल, भव सागर संसार ।
राम बिना सूझै नहीं, दादू खेवनहार ॥ 39 ॥
यहु घट बोहित धार में, दरिया वार न पार ।
भैभीत भयानक देखकर, दादू करी पुकार ॥ 40 ॥
कलियुग घोर अंधार है, तिसका वार न पार ।
दादू तुम बिन क्यों तिरै, समर्थ सिरजनहार ॥ 41 ॥
काया के वश जीव है, कस कस बँध्या मांहि ।
दादू आत्माराम बिन, क्यों ही छूटै नांहि ॥ 42 ॥
दादू प्राणी बँध्या पंच सौं, क्योंही छूटै नांहि ।
निधणी आया मारिये, यहु जीव काया मांहि ॥ 43 ॥
तुम बिन धणी न धोरी जीव का, यों ही आवै जाइ ।
जे तूँ साँई सत्य है, तो बेगा प्रकटहु आइ ॥ 44 ॥
निधणी आया मारिये, धणी न धोरी कोइ ।
दादू सो क्यूं मारिये, साहिब सिर पर होइ ॥ 45 ॥
दया विनती
राम विमुख जुग जुग दुखी, लख चौरासी जीव ।
जामै मरै जग आवटै, राखणहारा पीव ॥ 46 ॥
पोष प्रति पाल रक्षक
समर्थ सिरजनहार है, जे कुछ करै सो होइ ।
दादू सेवक राख ले, काल न लागै कोइ ॥ 47 ॥
विनती
साँई साचा नाम दे, काल झाल मिट जाइ ।
दादू निर्भय ह्वै रहे, कबहूँ काल न खाइ ॥ 48 ॥
कोई नहिं करतार बिन, प्राण उधारणहार ।
जियरा दुखिया राम बिन, दादू इहि संसार ॥ 49 ॥

  • 292 -

श्री दादूवाणी-विनती का अंग 34
जिनकी रक्षा तूँ करै, ते उबरे करतार।
जे तैं छाड़ै हाथ तैं, ते डूबे संसार ॥ 50 ॥
राखणहारा एक तूँ, मारणहार अनेक।
दादू के दूजा नहीं, तूँ आपै ही देख ॥ 51 ॥
दादू जग ज्वाला जम रूप है, साहिब राखणहार।
तुम बिच अन्तर जनि पड़ै, तातैं करूँ पुकार ॥ 52 ॥
जहँ तहँ विषय विकार तैं, तुम ही राखणहार।
तन मन तुम को सौंपिया, साचा सिरजनहार ॥ 53 ॥
दया विनती
दादू कहै- गरक रसातल जात है, तुम बिन सब संसार।
कर गहि कर्त्ता काढि ले, दे अवलम्बन आधार ॥ 54 ॥
दादू दौं लागी जग प्रज्वलै, घट घट सब संसार।
हम तैं कछू न होत है, तुम बरसि बुझावणहार ॥ 55 ॥
दादू आत्म जीव अनाथ सब, करतार उबारै।
राम निहोरा कीजिये, जनि काहू मारै ॥ 56 ॥
अर्श जमीं औजूद में, तहाँ तपै अफताब।
सब जग जलता देख कर, दादू पुकारैं साध ॥ 57 ॥
सकल भुवन सब आत्मा, निर्विष कर हरि लेइ।
पड़दा है सो दूर कर, कश्मल रहण न देइ ॥ 58 ॥
तन मन निर्मल आत्मा, सब काहू की होइ।
दादू विषय विकार की, बात न बूझै कोइ ॥ 59 ॥
विनती
समर्थ धोरी कंध धर, रथ ले ओर निवाहि।
मार्ग मांहि न मेलिये, पीछे बिड़द लजाहि ॥ 60 ॥
दादू गगन गिरै तब को धरै, धरती-धर छंडै।
जे तुम छाड़हु राम रथ, कंधा को मंडै ॥ 61 ॥

  • 293 -

श्री दादूवाणी-विनती का अंग 34
ज्यों वह बरत गगन तैं टूटै, कहाँ धरणी कहाँ ठाम।
लागी सुरति अंग तैं छूटै, सो कत जीवे राम ॥ 61 ॥
अन्तरयामी एक तूं, आतम के आधार।
जे तुम छाड़हु हाथ तैं, तो कौन संभालणहार ॥ 62 ॥
तेरा सेवक तुम लगै, तुम्हीं माथै भार।
दादू डूबत रामजी, बेगि उतारो पार ॥ 63 ॥
सत छूटा शूरातन गया, बल पौरुष भागा जाइ।
कोई धीरज ना धरै, काल पहूँता आइ ॥ 64 ॥
संगी थाके संग के, मेरा कुछ न वशाइ।
भाव भक्ति धन लूटिये, दादू दुखी खुदाइ ॥ 65 ॥
परिचय करुणा विनती
दादू जियरे जक नहीं, विश्राम न पावै।
आत्म पाणी लौंण ज्यों, ऐसे होइ न आवै ॥ 66 ॥
दया विनती
दादू तेरी खूबी खूब है, सब नीका लागे।
सुन्दर शोभा काढ़ ले, सब कोई भागे ॥ 67 ॥
विनती
तुम हो तैसी कीजिये, तो छूटेंगे जीव।
हम हैं ऐसी जनि करो, मैं सदके जाऊँ पीव ॥ 68 ॥
अनाथों का आसरा, निरधारों आधार।
निर्धन का धन राम है, दादू सिरजनहार ॥ 69 ॥
साहिब दर दादू खड़ा, निशदिन करै पुकार।
मीरां मेरा मिहर कर, साहिब दे दीदार ॥ 70 ॥
दादू प्यासा प्रेम का, साहिब राम पिलाइ।
प्रकट प्याला देहु भर, मृतक लेहु जिलाइ ॥ 71 ॥

  • 294 -

श्री दादूवाणी-विनती का अंग 34
अल्लह आली नूर का, भर-भर प्याला देहु ।
हम को प्रेम पिलाइ करि, मतवाला कर लेहु ॥ 72 ॥
तुम को हमसे बहुत हैं, हमको तुमसे नांहि ।
दादू को जनि परिहरै, तूँ रहु नैनहुँ मांहि ॥ 73 ॥
तुम तैं तब ही होइ सब, दरश परश दर हाल ।
हम तैं कबहुं न होइगा, जे बीतहिं जुग काल ॥ 74 ॥
तुम्हीं तैं तुम को मिलैं, एक पलक में आइ ।
हम तैं कबहुँ न होइगा, कोटि कल्प जे जाइ ॥ 75 ॥
छिन बिछोह
साहिब सौं मिल खेलते, होता प्रेम सनेह ।
दादू प्रेम सनेह बिन, खरी दुहेली देह ॥ 76 ॥
साहिब सौं मिल खेलते, होता प्रेम सनेह ।
प्रकट दर्शन देखते, दादू सुखिया देह ॥ 77 ॥
करुणा
तुम को भावै और कुछ, हम कुछ किया और ।
मिहर करो तो छूटिये, नहीं तो नांहीं ठौर ॥ 78 ॥
मुझ भावै सो मैं किया, तुझ भावै सो नांहि ।
दादू गुनहगार है, मैं देख्या मन मांहि ॥ 79 ॥
खुशी तुम्हारी त्यों करो, हम तो मानी हार ।
भावै बन्दा बख्शिये, भावै गह कर मार ॥ 80 ॥
दादू जे साहिब लेखा लिया, तो शीश काट शूली दिया ।
मिहर मया कर फिल किया, तो जीये जीये कर जिया ॥ 81 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम तत्वसारमत-
सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-
ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम्
माहात्म्य चौंतीसवां विनती का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 34 ॥ साखी 81 ॥

  • 295 -

साक्षीभूत का अंग
अथ साक्षीभूत का अंग ३५
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥
भ्रम विध्वंसन
सब देखणहारा जगत का, अंतर पूरै साखि ।
दादू साबित सो सही, दूजा और न राखि ॥ 2 ॥
मांही तैं मुझ को कहै, अन्तरजामी आप ।
दादू दूजा धंध है, साचा मेरा जाप ॥ 3 ॥

  • 296 -

श्री दादूवाणी-साक्षीभूत का अंग 35
कर्त्ता साक्षीभूत
करता है सो करेगा, दादू साक्षीभूत।
कौतिकहारा ह्वै रह्या, अणकर्ता अवधूत ॥ 4 ॥
दादू राजस कर उत्पत्ति करै, सात्विक कर प्रतिपाल।
तामस कर परलै करै, निर्गुण कौतिकहार ॥ 5 ॥
दादू ब्रह्म जीव हरि आत्मा, खेलैं गोपी कान्ह।
सकल निरन्तर भर रह्या, साक्षीभूत सुजान ॥ 6 ॥
स्वकीय मित्र-शत्रुता
दादू जामण मरणा सान कर, यहु पिंड उपाया।
साँईं दिया जीव को, ले जग में आया ॥ 7 ॥
दादू विष अमृत सब पावक पाणी, सतगुरु समझाया।
मनसा वाचा कर्मणा, सोई फल पाया ॥ 8 ॥
दादू जानै बूझै जीव सब, गुण औगुण कीजे।
जान बूझ पावक पड़ै, दई दोष न दीजे ॥ 9 ॥
मन ही मांहीं ह्वै मरै, जीवै मन ही मांहि।
साहिब साक्षीभूत है, दादू दूषण नांहि ॥ 10 ॥
बुरा बला सिर जीव के, होवै इस ही मांहि।
दादू कर्त्ता कर रह्या, सो सिर दीजै नांहि ॥ 11 ॥
साधु साक्षीभूत
कर्त्ता ह्वै कर कुछ करै, उस मांहि बँधावै।
दादू उसको पूछिये, उत्तर नहीं आवै ॥ 12 ॥
दादू केई उतारैं आरती, केई सेवा कर जांहि।
केई आइ पूजा करैं, केई खिलावैं खांहि ॥ 13 ॥
केई सेवक ह्वै रहे, केई साधु संगति मांहि।
केई आइ दर्शन करैं, हम तैं होता नांहि ॥ 14 ॥

  • 297 -

श्री दादूवाणी-साक्षीभूत का अंग 35
ना हम करैं करावैं आरती, ना हम पिवैं पिलावैं नीर ।
करै करावै सांइयाँ, दादू सकल शरीर ॥ 15 ॥
करै करावै सांइयाँ, जिन दिया औजूद ।
दादू बन्दा बीच में, शोभा को मौजूद ॥ 16 ॥
देवै लेवै सब करै, जिन सिरजे सब कोइ ।
दादू बन्दा महल में, शोभा करैं सब कोइ ॥ 17 ॥
कर्त्ता साक्षीभूत
दादू जुवा खेले जाणराइ, ताको लखै न कोइ ।
सब जग बैठा जीत कर, काहू लिप्त न होइ ॥ 18 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
पैंतीसवां साक्षीभूत काअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 35 ॥ साखी 18 ॥

  • 298 -

बेली का अंग
अथ बेली का अंग ३६
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥
दादू अमृत रूपी नाम ले, आत्म तत्त्वहि पोषै ।
सहजैं सहज समाधि में, धरणी जल शोषै ॥ 2 ॥
पसरै तीनों लोक में, लिप्त नहीं धोखे ।
सो फल लागै सहज में, सुन्दर सब लोके ॥ 3 ॥
दादू बेली आत्मा, सहज फूल फल होइ ।
सहज सहज सतगुरु कहै, बूझै बिरला कोइ ॥ 4 ॥

  • 299 -

श्री दादूवाणी-बेली का अंग 36
जे साहिब सींचै नहीं, तो बेली कुम्हलाइ ।
दादू सींचै सांइयाँ, तो बेली बधती जाइ ॥ 5 ॥
हरि तरुवर तत आत्मा, बेली कर विस्तार ।
दादू लागै अमर फल, कोइ साधू सींचनहार ॥ 6 ॥
दादू सूखा रूंखड़ा, काहे न हरिया होइ ।
आपै सींचै अमीरस, सुफल फलिया सोइ ॥ 7 ॥
कदे न सूखै रूंखड़ा, जे अमृत सींच्या आप ।
दादू हरिया सो फलै, कछू न व्यापै ताप ॥ 8 ॥
जे घट रोपै राम जी, सींचै अमी अघाइ ।
दादू लागै अमर फल, कबहूँ सूख न जाइ ॥ 9 ॥
दादू अमर बेलि है आत्मा, खार समंदां मांहिं ।
सूखै खारे नीर सौं, अमर फल लागे नांहिं ॥ 10 ॥
दादू बहुगुणवंती बेलि है, ऊगी कालर मांहिं ।
सींचै खारे नीर सौं, तातैं निपजै नांहिं ॥ 11 ॥
बहुगुणवंती बेली है, मीठी धरती बाहि ।
मीठा पानी सींचिये, दादू अमर फल खाहि ॥ 12 ॥
अमृत बेली बाहिये, अमृत का फल होइ ।
अमृत का फल खाइ कर, मुवा न सुणिया कोइ ॥ 13 ॥
दादू विष की बेली बाहिये, विष ही का फल होइ ।
विष ही का फल खाय कर, अमर नहिं कलि कोइ ॥ 14 ॥
सतगुरु संगति नीपजै, साहिब सींचनहार ।
प्राण वृक्ष पीवै सदा, दादू फलै अपार ॥ 15 ॥
दया धर्म का रूंखड़ा, सत सौं बधता जाइ ।
संतोंष सौं फूलै फलै, दादू अमर फल खाइ ॥ 16 ॥

  • 300 -

श्री दादूवाणी-बेली का अंग 36
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
छत्तीसवां बेली काअंग सम्पूर्ण ।। अंग 36 ।। साखी 16 ।।

  • 301 -

अबिहड़ का अंग
www.dadooram.org
अथ अबिहड़ का अंग ३७
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥
दादू संगी सोई कीजिये, जे कलि अजरावर होइ ।
ना वह मरै, न बीछूटै, ना दुख व्यापै कोइ ॥ 2 ॥
दादू संगी सोई कीजिये, जे थिर इहि संसार ।
ना वह खिरै, न हम खपैं, ऐसा लेहु विचार ॥ 3 ॥
दादू संगी सोई कीजिये, सुख दुख का साथी ।
दादू जीवन-मरण का, सो सदा संगाती ॥ 4 ॥

  • 302 -

श्री दादूवाणी-अबिहड़ का अंग 37
दादू संगी सोई कीजिये, जे कबहूँ पलट न जाइ।
आदि अंत बिहड़ै नही, ता सन यहु मन लाइ ॥ 5 ॥
दादू अबिहड़ आप है, अमर उपावनहार।
अविनाशी आपै रहै, बिनसै सब संसार ॥ 6 ॥
दादू अबिहड़ आप है, साचा सिरजनहार।
आदि अंत बिहड़ै नहीं, बिनसै सब आकार ॥ 7 ॥
दादू अबिहड़ आप है, अविचल रह्या समाइ।
निहचल रमता राम है, जो दीसै सो जाइ ॥ 8 ॥
दादू अबिहड़ आप है, कबहूँ बिहड़े नांहि।
घटै बधै नहीं एक रस, सब उपज खपै उस मांहि ॥ 9 ॥
अबिहड़ अंग बिहड़ै नहीं, अपलट पलट न जाइ।
दादू अघट एक रस, सब में रह्या समाइ ॥ 10 ॥
अन्त समय की साखी
जेते गुण व्यापैं जीव को, तेते तैं तजे रे मन।
साहिब अपणे कारणैं,(भलो निबाह्यो प्रण) ॥ 11 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
सैंतीसवां अबिहड़ काअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 37 ॥ साखी 11 ॥
साखी स्कन्ध पूर्वार्द्ध भाग समाप्त
दादूराम सत्यराम

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दादूराम ॥ श्री परमात्मने नमः ॥ सत्यराम
॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
शब्द भाग (उत्तरार्ध)
अथ राग गौड़ी १ (गायन समय दिन 3 से 6)

  1. स्मरण शूरातन नाम निश्चय । त्रिताल
    राम नाम नहीं छाडूं भाई, प्राण तजूं निक ट जीव जाई ॥ टेक ॥
    रती रती कर डारै मोहि, साँई संग न छाडूं तोहि ॥ 1 ॥
    भावै ले सिर करवत दे, जीवन मूरी न छाडूं तोहि ॥ 2 ॥
    पावक में ले डारै मोहि, जरै शरीर न छाडूं तोहि ॥ 3 ॥
    अब दादू ऐसी बन आई, मिलूं गोपाल निसान बजाई ॥ 4 ॥
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