सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-निगुणा का अंग 33
अज्ञ स्वभाव अपलट
सतगुरु चन्दन बावना, लागे रहें भुवंग।
दादू विष छाडैं नहीं, कहा करै सत्संग ॥ 4 ॥
दादू कीड़ा नरक का, राख्या चंदन मांहि।
उलट अपूठा नरक में, चन्दन भावै नांहि ॥ 5 ॥
सतगुरु साधु सुजान है, शिष का गुण नहिं जाइ।
दादू अमृत छाड़ कर, विषय हलाहल खाइ ॥ 6 ॥
कोटि बर्ष लौं राखिये, बंसा चन्दन पास।
दादू गुण लिये रहै, कदे न लागै बास ॥ 7 ॥
कोटि वर्ष लौं राखिये, पत्थर पानी मांहि।
दादू आडा अंग है, भीतर भेदै नांहि ॥ 8 ॥
कोटि वर्ष लौं राखिये, लोहा पारस संग।
दादू रोम का अन्तरा, पलटै नांही अंग ॥ 9 ॥
कोटि वर्ष लौं राखिये, जीव ब्रह्म संग दोइ।
दादू मांहीं वासना, कदे न मेला होइ ॥ 10 ॥
सगुणा निगुणा कृतघ्नी
मूसा जलता देख कर, दादू हंस दयाल।
मान सरोवर ले चल्या, पंखा काटे काल ॥ 11 ॥
सब जीव भुवंगम कूप में, साधु काढैं आइ।
दादू विषहर विष भरे, फिर ताही को खाइ ॥ 12 ॥
दादू दूध पिलाइये, विषहर विष कर लेइ।
गुण का औगुण कर लिया, ताही को दुख देइ ॥ 13 ॥
अज्ञ स्वभाव अपलट
बिन ही पावक जल मुवा, जवासा जल मांहि।
दादू सूखै सींचतां, तो जल को दूषण नांहि ॥ 14 ॥
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