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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 289, कुल 504 में से

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पृष्ठ 289

श्री दादूवाणी-विनती का अंग 34
तिल तिल का अपराधी तेरा,रती रती का चोर ।
पल पल का मैं गुनही तेरा, बख्शो अवगुण मोर ॥ 5 ॥
महा अपराधी एक मैं, सारे इहि संसार ।
अवगुण मेरे अति घणे, अन्त न आवैं पार ॥ 6 ॥
बे मर्यादा मित नहीं, ऐसे किये अपार ।
मैं अपराधी बापजी, मेरे तुम्हीं एक अधार ॥ 7 ॥
दोष अनेक कलंक सब, बहुत बुरे मुझ मांहि ।
मैं किये अपराध सब, तुम तैं छाना नांहि ॥ 8 ॥
गुनहगार अपराधी तेरा, भाजि कहाँ हम जाहिं ।
दादू देख्या शोध सब, तुम बिन कहीं न समाहिं ॥ 9 ॥
आदि अंत लौं आय कर, सुकृत कछू न कीन्ह ।
माया मोह मद मत्सरा, स्वाद सबै चित दीन्ह ॥ 10 ॥
विनती
काम क्रोध संशय सदा, कबहूँ नाम न लीन ।
पाखंड प्रपंच पाप में, दादू ऐसे खीन ॥ 11 ॥
दादू बहु बंधन सौं बंधिया, एक बिचारा जीव ।
अपने बल छूटै नहीं, छोड़नहारा पीव ॥ 12 ॥
दादू बंदीवान है, तूँ बन्दी छोड़ दीवान ।
अब जनि राखो बंदि में, मीरां मेहरबान ॥ 13 ॥
दादू अंतर कालिमा, हिरदै बहुत विकार ।
प्रकट पूरा दूर कर, दादू करै पुकार ॥ 14 ॥
सब कुछ व्यापै राम जी, कुछ छूटा नांही ।
तुम तैं कहाँ छिपाइये, सब देखो मांही ॥ 15 ॥
सबल साल मन में रहै, राम बिसर क्यों जाइ ।
यहु दुख दादू क्यों सहै, साँई करो सहाइ ॥ 16 ॥

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