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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-विनती का अंग 34
साहिब साधु दयालु हैं, हम ही अपराधी ।
दादू जीव अभागिया, अविद्या साधी ॥ 28 ॥
सब जीव तोरैं राम सौं, पै राम न तोरे ।
दादू काचे ताग ज्यों, टूटै त्यों जोरे ॥ 29 ॥
सजीवन
फूटा फेरि संवार कर, ले पहुँचावे ओर ।
ऐसा कोई ना मिलै, दादू गई बहोर ॥ 30 ॥
ऐसा कोई ना मिलै, तन फेरि संवारै ।
बूढे तैं बाला करै, खै काल निवारै ॥ 31 ॥
परच करूणा विनती
गलै विलै कर बीनती, एकमेक अरदास ।
अरस परस करुणा करै, तब द्रवै दादू दास ॥ 32 ॥
साँईं तेरे डर डरूँ, सदा रहूँ भैभीत ।
अजा सिंह ज्यों भय घणा, दादू लिया जीत ॥ 33 ॥
पोख प्रतिपाल रक्षक
दादू पलक मांहि प्रकटै सही, जे जन करैं पुकार ।
दीन दुखी तब देखकर, अति आतुर तिहिं बार ॥ 34 ॥
आगे पीछे संग रहै, आप उठाये भार ।
साधु दुखी तब हरि दुखी, ऐसा सिरजनहार ॥ 35 ॥
सेवक की रक्षा करै, सेवक की प्रतिपाल ।
सेवग की वाहर चढै, दादू दीन दयाल ॥ 36 ॥
विनती सागर तरण
दादू काया नाव समंद में, औघट बूड़े आइ ।
इहि अवसर एक अगाध बिन, दादू कौन सहाइ ॥ 37 ॥
यहु तन भेरा भौजला, क्यों कर लंघे तीर ।
खेवट बिन कैसे तिरै, दादू गहर गंभीर ॥ 38 ॥

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