सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-विनती का अंग 34
राखणहारा राख तूँ, यहु मन मेरा राखि ।
तुम बिन दूजा को नहीं, साधू बोलैं साखि ॥ 17 ॥
माया विषय विकार तैं, मेरा मन भागे ।
सोई कीजे साँईयाँ, तूँ मीठा लागे ॥ 18 ॥
साँई दीजे सो रति, तूँ मीठा लागे ।
दूजा खारा होइ सब, सूता जीव जागे ॥ 19 ॥
ज्यों आपै देखे आपको, सो नैना दे मुझ ।
मीरां मेरा मेहर कर, दादू देखे तुझ ॥ 20 ॥
विनती
दादू पछतावा रह्या, सके न ठाहर लाइ ।
अर्थ न आया राम के, यहु तन योंही जाइ ॥ 21 ॥
दादू कहै- दिन दिन नवतम भक्ति दे, दिन दिन नवतम नांव ।
दिन दिन नवतम नेह दे, मैं बलिहारी जांव ॥ 22 ॥
साँई संशय दूर कर, कर शंका का नाश ।
भान भ्रम दुविध्या दुख दारुण, समता सहज प्रकाश ॥ 23 ॥
दया विनती
नांही प्रकट ह्वै रह्या, है सो रह्या लुकाइ ।
संइयाँ पड़दा दूर कर, तूँ ह्वै प्रकट आइ ॥ 24 ॥
दादू माया प्रकट ह्वै रही, यों जे होता राम ।
अरस परस मिल खेलते, सब जीव सब ही ठाम ॥ 25 ॥
दया करै तब अंग लगावै, भक्ति अखंडित देवै ।
दादू दर्शन आप अकेला, दूजा हरि सब लेवै ॥ 26 ॥
दादू साध सिखावैं आत्मा, सेवा दिढ कर लेहु ।
पारब्रह्म सौं विनती, दया कर दर्शन देहु ॥ 27 ॥
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