सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
सजीवन का अंग
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अथ सजीवन का अंग २६
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ॥ 1 ॥
दादू जे तूं जोगी गुरुमुखी, तो लेना तत्त्व विचार ।
गह आयुध गुरु ज्ञान का, काल पुरुष को मार ॥ 2 ॥
नाद बिंदु सौं घट भरै, सो जोगी जीवै ।
दादू काहे को मरै, राम रस पीवै ॥ 3 ॥
साधु जन की वासना, शब्द रहै संसार ।
दादू आतम ले मिलै, अमर उपावनहार ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-सजीवन का अंग 26
राम सरीखे ह्वै रहें, यहु नांही उनहार ।
दादू साधू अमर हैं, विनशै सब संसार ॥ 5 ॥
जे कोई सेवे राम को, तो राम सरीखा होइ ।
दादू नाम कबीर ज्यों, साखी बोलै सोइ ॥ 6 ॥
अर्थ न आया सो गया, आया सो क्यों जाइ ।
दादू तन मन जीवतां, आपा ठौर लगाइ ॥ 7 ॥
जे जन बेधे प्रीति सौं, सो जन सदा सजीव ।
उलट समाने आप में, अन्तर नांही पीव ॥ 8 ॥
दया विनती
दादू कहै-सब रंग तेरे तैं रंगे, तूं ही सब रंग मांहि ।
सब रंग तेरे तैं किये, दूजा कोई नांहि ॥ 9 ॥
सजीवन
काटै फन्द तो छूटै द्वन्द, छूटै द्वन्द तौ लागै बंद ।
लागै बन्द तो अमर कंद, अमर कंद दादू आनन्द ॥ 10 ॥
प्रश्न
कहँ जम जोरा भंजिये, कहाँ काल कौ दंड ।
कहाँ मीच को मारिये, कहाँ जरा सत खंड ॥ 11 ॥
अमर ठौर अविनाशी आसन, तहाँ निरंजन लाग रहे ।
दादू जोगी जुग जुग जीवै, काल ब्याल सब सहज गये ॥ 12 ॥
रोम रोम लै लाइ धुनि, ऐसे सदा अखंड ।
दादू अविनाशी मिले, तो जम को दीजे दंड ॥ 13 ॥
दादू जरा काल जामण मरण, जहाँ जहाँ जीव जाइ ।
भक्ति परायण लीन मन, ताको काल न खाइ ॥ 14 ॥
मरणा भागा मरण तैं, दुःखैं नाठा दुःख ।
दादू भय सौं भय गया, सुःखैं छूटा सुःख ॥ 15 ॥
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श्री दादूवाणी-सजीवन का अंग 26
जीवन मरण
जीवित मिले सो जीवते, मूये मिल मर जाइ ।
दादू दोन्यों देखकर, जहाँ जानैं तहँ लाइ ॥ 16 ॥
सजीवन
दादू साधन सब किया, जब उनमन लागा मन ।
दादू सुस्थिर आत्मा, यों जुग जुग जीवैं जन ॥ 17 ॥
रहते सेती लाग रहु, तो अजरावर होइ ।
दादू देख विचार कर, जुदा न जीवै कोइ ॥ 18 ॥
जेती करणी काल की, तेती परिहर प्राण ।
दादू आतमराम सौं, जे तूं खरा सुजाण ॥ 19 ॥
विष अमृत घट में बसै, विरला जानै कोइ ।
जिन विष खाया ते मुये, अमर अमी सौं होइ ॥ 20 ॥
दादू सब ही मर रहे, जीवै नांही कोइ ।
सोई कहिये जीवता, जे कलि अजरावर होइ ॥ 21 ॥
देह रहै संसार में, जीव राम के पास ।
दादू कुछ व्यापै नहीं, काल झाल दुख त्रास ॥ 22 ॥
काया की संगति तजै, बैठा हरि पद मांहि ।
दादू निर्भय ह्वै रहै, कोई गुण व्यापै नांहि ॥ 23 ॥
दादू तज संसार सब, रहे निराला होइ ।
अविनाशी के आसरे, काल न लागे कोइ ॥ 24 ॥
जागहु लागहु राम सौं, रैन बिहानी जाइ ।
सुमिर सनेही आपणा, दादू काल न खाइ ॥ 25 ॥
दादू जागहु लागहु राम सौं, छाड़हु विषय विकार ।
जीवहु पीवहु राम रस, आतम साधन सार ॥ 26 ॥
मरै तो पावै पीव को, जीवत बंचै काल ।
दादू निर्भय नाम ले, दोनों हाथ दयाल ॥ 27 ॥
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श्री दादूवाणी-सजीवन का अंग 26
दादू मरणे को चला, सजीवन के साथ ।
दादू लाहा मूल सौं, दोनों आये हाथ ॥ 28 ॥
करुणा
दादू जाता देखिये, लाहा मूल गँवाइ ।
साहिब की गति अगम है, सो कुछ लखी न जाइ ॥ 29 ॥
सजीवन
साहिब मिलै तो जीविये, नहीं तो जीवै नांहि ।
भावै अनंत उपाय कर, दादू मूवों मांहि ॥ 30 ॥
सजीविन साधै नहीं, तातैं मर मर जाइ ।
दादू पीवै राम रस, सुख में रहै समाइ ॥ 31 ॥
दिन दिन लहुड़े होंहि सब, कहैं मोटा होता जाइ ।
दादू दिन दिन ते बढ़ें, जे रहैं राम ल्यौ लाइ ॥ 32 ॥
न जाणूं हाँजी, चुप गह, मेट अग्नि की झाल ।
सदा सजीवन सुमिरिये, दादू बंचै काल ॥ 33 ॥
जीवन मुक्ति
दादू जीवित छूटै देह गुण, जीवित मुक्ता होइ ।
जीवित काटै कर्म सब, मुक्ति कहावै सोइ ॥ 34 ॥
दादू जीवित ही दुस्तर तिरे, जीवित लंघे पार ।
जीवित पाया जगद्गुरु, दादू ज्ञान विचार ॥ 35 ॥
जीवित जगपति को मिलै, जीवित आत्मराम ।
जीवित दर्शन देखिये, दादू मन विश्राम ॥ 36 ॥
जीवित पाया प्रेम रस, जीवित पिया अघाइ ।
जीवित पाया स्वाद सुख, दादू रहे समाइ ॥ 37 ॥
जीवित भागे भ्रम सब, छूटे कर्म अनेक।
जीवित मुक्त सद्गति भये, दादू दर्शन एक ॥ 38 ॥
- 260 -
श्री दादूवाणी-सजीवन का अंग 26
जीवित मेला ना भया, जीवित परस न होइ।
जीवित जगपति ना मिले, दादू बूड़े सोइ ॥ 39 ॥
जीवित दुस्तर ना तिरे, जीवित न लंघे पार।
जीवित निर्भय ना भये, दादू ते संसार ॥ 40 ॥
जीवित प्रकट ना भया, जीवित परिचय नांहि।
जीवित न पाया पीव को, बूड़े भवजल मांहि ॥ 41 ॥
जीवित पद पाया नहीं, जीवित मिले न जाइ।
जीवित जे छूटे नहीं, दादू गये विलाइ ॥ 42 ॥
दादू छूटे जीवतां, मूवाँ छूटे नांहि।
मूवाँ पीछे छूटिये, तो सब आये उस मांहि ॥ 43 ॥
मूवाँ पीछे मुक्ति बतावैं, मूवाँ पीछे मेला।
मूवाँ पीछे अमर अभय पद, दादू भूले गहिला ॥ 44 ॥
मूवाँ पीछे वैकुंठ वासा, मूवाँ स्वर्ग पठावैं।
मूवाँ पीछे मुक्ति बतावैं, दादू जग बोरावैं ॥ 45 ॥
मूवाँ पीछे पद पहुँचावैं, मूवाँ पीछे तारैं।
मूवाँ पीछे सद्गति होवै, दादू जीवित मारैं ॥ 46 ॥
मूवाँ पीछे भक्ति बतावैं, मूवाँ पीछे सेवा।
मूवाँ पीछे संयम राखैं, दादू दोजख देवा ॥ 47 ॥
सजीवन
दादू धरती क्या साधन किया, अंबर कौन अभ्यास ?
रवि शशि किस आरंभ तैं ? अमर भये निज दास ॥ 48 ॥
साहिब मारे ते मुये, कोई जीवै नांहि।
साहिब राखे ते रहे, दादू निज घर मांहि ॥ 49 ॥
जे जन राखे राम जी, अपने अंग लगाइ।
दादू कुछ व्यापै नहीं, जे कोटि काल झख जाइ ॥ 50 ॥
- 261 -
श्री दादूवाणी-सजीवन का अंग 26
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरू-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुबुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
छब्बीसवां सजीवन का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 26 ॥ साखी 50 ॥
दादूराम
सत्यराम
- 262 -
पारिख
का
अंग
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अथ पारिख का अंग २७
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥
साधुत्व परीक्षा
दादू मन चित आतम देखिये, लागा है किस ठौर?
जहँ लागा तैसा जाणिये, का देखै दादू और ॥ 2 ॥
दादू साधु परखिये, अन्तर आतम देख ।
मन मांहि माया रहै, कै आपै आप अलेख ॥ 3 ॥
दादू मन की देख कर, पीछे धरिये नांव ।
अन्तरगति की जे लखैं, तिनकी मैं बलि जांव ॥ 4 ॥
- 263 -
श्री दादूवाणी-पारिख का अंग 27
यहु परख सराफी ऊपली, भीतर की यहु नांहि ।
अन्तर की जाणैं नहीं, ता तैं खोटा खांहि ॥ 5 ॥
दादू बाहर का सब देखिये, भीतर लख्या न जाइ ।
बाहर दिखावा लोक का, भीतर राम दिखाइ ॥ 6 ॥
दादू जे नांही सो सब कहैं, है सो कहै न कोइ ।
खोटा खरा परखिये, तब ज्यों था त्यों ही होइ ॥ 7 ॥
दह दिशि फिरै सो मन है, आवै जाइ सो पवन ।
राखणहारा प्राण है, देखणहारा ब्रह्म ॥ 8 ॥
घट की भान अनीति सब, मन की मेट उपाध ।
दादू परिहर पंच की, राम कहैं ते साध ॥ 9 ॥
अर्थ आया तब जानिये, जब अनर्थ छूटे ।
दादू भाँडा भरम का, गिरि चौड़े फूटे ॥ 10 ॥
दादू दूजा कहबे को रह्या, अन्तर डारा धोइ ।
ऊपर की ये सब कहैं, मांहि न देखै कोइ ॥ 11 ॥
दादू जैसे मांहि जीव रहै, तैसी आवै बास ।
मुख बोले तब जानिये, अन्तर का परकास ॥ 12 ॥
दादू ऊपर देख कर, सबको राखै नांव ।
अंतरगति की जे लखैं, तिनकी मैं बलि जांव ॥ 13 ॥
जग जन विपरीत
तन मन आत्म एक है, दूजा सब उनहार ।
दादू मूल पाया नहीं, दुविधा भ्रम विकार ॥ 14 ॥
काया के सब गुण बँधे, चौरासी लख जीव ।
दादू सेवक सो नहीं, जे रंग राते पीव ॥ 15 ॥
काया के वश जीव सब, ह्वै गये अनन्त अपार ।
दादू काया वश करै, निरंजन निराकार ॥ 16 ॥
- 264 -
श्री दादूवाणी-पारिख का अंग 27
पूरण ब्रह्म विचारिये, तब सकल आत्मा एक।
काया के गुण देखिये, तो नाना वरण अनेक ॥ 17 ॥
नरबिड़ रूप पशु
मति बुद्धि विवेक विचार बिन, माणस पशु समान।
समझायां समझै नहीं, दादू परम गियान ॥ 18 ॥
सब जीव प्राणी भूत हैं, साधु मिलैं तब देव।
ब्रह्म मिलै तब ब्रह्म हैं, दादू अलख अभेव ॥ 19 ॥
करतूती कर्म
दादू बँध्या जीव है, छूटा ब्रह्म समान।
दादू दोनों देखिये, दूजा नांही आन ॥ 20 ॥
कर्मों के वश जीव है, कर्म रहित सो ब्रह्म।
जहँ आत्म तहँ परमात्मा, दादू भागा भ्रम ॥ 21 ॥
पारिख अपारिख
काचा उछलै ऊफणै, काया हाँडी मांहि।
दादू पाका मिल रहै, जीव ब्रह्म द्वै नांहि ॥ 22 ॥
दादू बाँधे सुर नवाये बाजैं, एह्वा शोध रु लीज्यो।
राम स्नेही साधु हाथे, वेगा मोकल दीज्यो ॥ 23 ॥
प्राण जौहरी पारिखु, मन खोटा ले आवै।
खोटा मन के माथे मारै, दादू दूर उड़ावै ॥ 24 ॥
सांच
श्रवणां हैं, नैनां नहीं, तातैं खोटा खाहिं।
ज्ञान विचार न उपजै, साच झूठ समझाहिं ॥ 25 ॥
सांच
दादू साचा लीजिये, झूठा दीजे डार।
साचा सन्मुख राखिये, झूठा नेह निवार ॥ 26 ॥
- 265 -
श्री दादूवाणी-पारिख का अंग 27
साचे को साचा कहै, झूठे को झूठा।
दादू दुविधा को नहीं, ज्यों था त्यों दीठा ॥ 27 ॥
पारिख अपारिख
दादू हीरे को कंकर कहैं, मूरख लोग अजान।
दादू हीरा हाथ ले, परखैं साधु सुजान ॥ 28 ॥
हीरा कौड़ी ना लहै, मूरख हाथ गँवार।
पाया पारख जौहरी, दादू मोल अपार ॥ 29 ॥
अंधे हीरा परखिया, किया कौडी मोल।
दादू साधू जौहरी, हीरे मोल न तोल ॥ 30 ॥
सगुरा निगुरा
सगुरा निगुरा परखिये, साध कहैं सब कोइ।
सगुरा साचा, निगुरा झूठा, साहिब के दर होइ ॥ 31 ॥
सगुरा सत संयम रहै, सन्मुख सिरजनहार।
निगुरा लोभी लालची, भूंचै विषय विकार ॥ 32 ॥
कर्त्ता कसौटी
खोटा खरा परखिये, दादू कस-कस लेइ।
साचा है सो राखिये, झूठा रहण न देइ ॥ 33 ॥
पारिख अपारिख
खोटा खरा कर देवै पारिख, तो कैसे बन आवै।
खरे खोटा का न्याय नबेरे, साहिब के मन भावै ॥ 34 ॥
दादू जिन्हें ज्यों कही, तिन्हें त्यों मानी, ज्ञान विचार न कीन्हा।
खोटा खरा जीव परख न जानै, झूठ सच करि लीन्हा ॥ 35 ॥
कर्त्ता कसौटी
जे निधि कहीं न पाइये, सो निधि घर-घर आहि।
दादू महँगे मोल बिन, कोई न लेवे ताहि ॥ 36 ॥
- 266 -
श्री दादूवाणी-पारिख का अंग 27
खरी कसौटी कीजिये, वाणी बधती जाइ।
दादू साचा परखिये, महँगे मोल बिकाइ ॥ 37 ॥
दादू राम कसै सेवक खरा, कदे न मोड़ै अंग।
दादू जब लग राम है, तब लग सेवक संग ॥ 38 ॥
दादू कस कस लीजिये, यहु ताते परिमान।
खोटा गाँठ न बाँधिये, साहिब के दीवान ॥ 39 ॥
खरी कसौटी पीव की, कोई बिरला पहुँचनहार।
जे पहुँचे ते ऊबरे, ताइ किये तत सार ॥ 40 ॥
दुर्बल देही निर्मल वाणी, दादू पंथी ऐसा जाणी।
काहू जीव विरोधे नांही, परमेश्वर देखे सब माँही ॥ 41 ॥
दादू साहिब कसै सेवक खरा, सेवक को सुख होइ।
साहिब करै सो सब भला, बुरा न कहिये कोइ ॥ 42 ॥
दादू ठग आमेर में, साधौं सौं कहियो।
हम शरणाई राम की, तुम नीके रहियो ॥ 43 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
सत्ताईसवां पारिख कअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 27 ॥ साखी 43 ॥
- 267 -
उपजन का अंग
अथ उपजन का अंग २८
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगततः ।। 1 ।।
विचार
दादू माया का गुण बल करै, आपा उपजै आइ ।
राजस तामस सात्विकी, मन चंचल ह्रै जाइ ।। 2 ।।
आपा नाहीं बल मिटै, त्रिविध तिमिर नहिं कोइ ।
दादू यहु गुण ब्रह्म का, शून्य समाना सोइ ।। 3 ।।
- 268 -
श्री दादूवाणी-उपजन का अंग 28
उपजन
दादू अनुभव उपजी गुणमयी, गुण ही पै ले जाइ।
गुण ही सौं गहि बंधिया, छूटै कौन उपाइ ॥ 4 ॥
द्वै पख उपजी परिहरै, निर्पख अनुभव सार।
एक राम दूजा नहीं, दादू लेहु विचार ॥ 5 ॥
दादू काया ब्यावर गुणमयी, मनमुख उपजै ज्ञान।
चौरासी लख जीव को, इस माया का ध्यान ॥ 6 ॥
आत्म उपज आकाश की, सुनि धरती की बाट।
दादू मारग गैब का, कोई लखै न घाट ॥ 7 ॥
आत्म बोधी अनुभवी, साधु निर्पख होइ।
दादू राता राम सौं, रस पीवेगा सोइ ॥ 8 ॥
प्रेम भक्ति जब ऊपजै, निश्चल सहज समाधि।
दादू पीवे राम रस, सतगुरु के प्रसाद ॥ 9 ॥
प्रेम भक्ति जब ऊपजै, पंगुल ज्ञान विचार।
दादू हरि रस पाइये, छूटै सकल विकार ॥ 10 ॥
दादू बंझ बियाई आत्मा, उपज्या आनन्द भाव।
सहज शील संतोष सत, प्रेम मगन मन राव ॥ 11 ॥
निन्दा
जब हम ऊजड़ चालते, तब कहते मारग मांहि।
दादू पहुंचे पंथ चल, कहैं यहु मारग नांहि ॥ 12 ॥
उपजन
पहले हम सब कुछ किया, भरम करम संसार।
दादू अनुभव उपजी, राते सिरजनहार ॥ 13 ॥
सोई अनुभव सोई ऊपजी, सोई शब्द तव सार।
सुनतां ही साहिब मिले, मन के जाहिं विकार ॥ 14 ॥
- 269 -
श्री दादूवाणी-उपजन का अंग 28
परिचय जिज्ञासा उपदेश
पारब्रह्म कह्या प्राण सौं, प्राण कह्या घट सोइ ।
दादू घट सब सौं कह्या, विष अमृत गुण दोइ ॥ 15 ॥
दादू मालिक कह्या अरवाह सौं, अरवाह कह्या औजूद ।
औजूद आलम सौं कह्या, हुकम खबर मौजूद ॥ 16 ॥
दादू जैसा ब्रह्म है, तैसी अनुभव उपजी होइ ।
जैसा है तैसा कहै, दादू विरला कोइ ॥ 17 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
अट्ठाईसवां उपजन काअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 28 ॥ साखी 17 ॥
- 270 -
दया निर्वैरता का अंग
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अथ दया निर्वैरता का अंग २९
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥
सारमत
आपा मेटै हरि भजै, तन मन तजै विकार ।
निर्वैरी सब जीव सौं, दादू यहु मत सार ॥ 2 ॥
दादू निर्वैरी निज आत्मा, साधन का मत सार ।
दादू दूजा राम बिन, बैरी मंझ विकार ॥ 3 ॥
- 271 -
श्री दादूवाणी-दया निर्वैरता का अंग 29
निर्वैरी सब जीव सौं, संतजन सोई ।
दादू एकै आत्मा, बैरी नहिं कोई ॥ 4 ॥
सब हम देख्या शोध कर, दूजा नांही आन ।
सब घट एकै आत्मा, क्या हिन्दू मुसलमान ॥ 5 ॥
दादू नारी पुरुष का नाम धर, इहि संशय भ्रम भुलान ।
सब घट एकै आत्मा, क्या हिंदू मुसलमान ॥ 6 ॥
दादू दोनों भाई हाथ पग, दोनों भाई कान ।
दोनों भाई नैन हैं, हिंदू मुसलमान ॥ 7 ॥
दादू संशय आरसी, देखत दूजा होइ ।
भ्रम गया दुविधा मिटी, तब दूसर नाहिं कोइ ॥ 8 ॥
किस सौं बैरी ह्वै रह्या, दूजा कोई नांहि ।
जिसके अंग तैं ऊपजै, सोई है सब मांहि ॥ 9 ॥
सब घट एकै आत्मा, जानै सो नीका ।
आपा पर में चीन्ह ले, दर्शन है पीव का ॥ 10 ॥
काहे को दुख दीजिये, घट घट आत्माराम ।
दादू सब संतोषिये, यह साधु का काम ॥ 11 ॥
काहे को दुख दीजिये, साँई है सब मांहि ।
दादू एकै आत्मा, दूजा कोई नांहि ॥ 12 ॥
साहिब जी की आत्मा, दीजे सुख संतोंष ।
दादू दूजा को नहीं, चौदह तीनों लोक ॥ 13 ॥
दादू जब प्राण पिछाणै आपको, आत्म सब भाई ।
सिरजनहारा सबनि का, तासौं ल्यौ लाई ॥ 14 ॥
आत्माराम विचार कर, घट घट देव दयाल ।
दादू सब संतोषिये, सब जीवों प्रतिपाल ॥ 15 ॥
दादू पूरण ब्रह्म विचारले, द्वैत भाव कर दूर ।
सब घट साहिब देखिये, राम रह्या भरपूर ॥ 16 ॥
- 272 -
श्री दादूवाणी-दया निर्वैरता का अंग 29
दादू मंदिर काँच का, मर्कट सुनहाँ जाइ ।
दादू एक अनेक है, आप आपको खाइ ॥ 17 ॥
आत्म भाई जीव सब, एक पेट परिवार ।
दादू मूल विचारिये, तो दूजा कौन गँवार ॥ 18 ॥
दादू सूखा सहजैं कीजिये, नीला भानै नांहि ।
काहे को दुख दीजिये, साहिब है सब मांहि ॥ 19 ॥
दया निर्वैरता
घट घट के उनहार सब, प्राण परस है जाइ ।
दादू एक अनेक है, बरतैं नाना भाइ ॥ 20 ॥
आये एकंकार सब, साँई दिये पठाइ ।
दादू न्यारे नांम धर, भिन्न भिन्न है जाइ ॥ 21 ॥
आये एकंकार सब, साँई दिये पठाइ ।
आदि अंत सब एक है, दादू सहज समाइ ॥ 22 ॥
आतम देव आराजिये, विरोधिये नहिं कोइ ।
आराधे सुख पाइये, विरोधे दुःख होइ ॥ 23 ॥
ज्यों आपै देखे आपको, यों जे दूसर होइ ।
तो दादू दूसर नहीं, दुःख न पावै कोइ ॥ 24 ॥
दादू सम कर देखिये, कुंजर कीट समान ।
दादू दुविधा दूर कर, तज आपा अभिमान ॥ 25 ॥
अदया हिंसा
दादू अर्श खुदाय का, अजरावर का थान ।
दादू सो क्यों ढाहिये, साहिब का नीशान ॥ 26 ॥
दादू आप चिणावै देहुरा, तिसका करहि जतन ।
प्रत्यक्ष परमेश्वर किया, सो भानै जीव रतन ॥ 27 ॥
मसीत संवारी माणसाँ, तिसको करैं सलाम ।
ऐन आप पैदा किया, सो ढाहैं मुसलमान ॥ 28 ॥
- 273 -
श्री दादूवाणी-दया निर्वैरता का अंग 29
दादू जंगल मांही जीव जे, जग तैं रहैं उदास।
भयभीत भयानक रात दिन, निश्चल नाहीं वास ॥ 29 ॥
वाचा बंधी जीव सब, भोजन पानी घास।
आत्म ज्ञान न ऊपजै, दादू करहि विनास ॥ 30 ॥
काला मुँह कर करद का, दिल तैं दूर निवार।
सब सूरत सुबहान की, मुल्लां मुग्ध न मार ॥ 31 ॥
गला गुस्से का काटिये, मियाँ मनी को मार।
पंचों बिस्मिल कीजिये, ये सब जीव उबार ॥ 32 ॥
वैर विरोधे आत्मा, दया नहीं दिल मांहि।
दादू मूरति राम की, ताको मारन जांहि ॥ 33 ॥
दया निर्वैरता
कुल आलम यके दीदम, अरवाहे इखलास।
बद अमल बदकार दुई, पाक यारां पास ॥ 34 ॥
काल झाल तैं काढ कर, आतम अंग लगाइ।
जीव दया यहु पालिये, दादू अमृत खाइ ॥ 35 ॥
दादू बुरा न बांछै जीव का, सदा सजीवन सोइ।
परलै विषय विकार सब, भाव भक्ति रत होइ ॥ 36 ॥
सतगुरु संतों की यह रीत, आत्म भाव सौं राखैं प्रीत।
ना को बैरी ना को मीत, दादू राम मिलन की चीत ॥ 37 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
उन्तीसवां दया निर्वैरता काअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 29 ॥ साखी 37 ॥
- 274 -
सुंदरी का अंग
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अथ सुन्दरी का अंग ३०
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ।। 1 ।।
सुन्दरी विलाप
आरतवन्ती सुन्दरी, पल पल चाहे पीव ।
दादू कारण कंत के, तालाबेली जीव ।। 2 ।।
काहे न आवहु कंत घर, क्यों तुम रहे रिसाइ ।
दादू सुन्दरी सेज पर, जन्म अमोलक जाइ ।। 3 ।।
- 275 -
श्री दादूवाणी-सुन्दरी का अंग 30
आतम अंतर आव तूं, या है तेरी ठौर।
दादू सुन्दरी पीव तूं, दूजा नांही और ॥ 4 ॥
दादू पीव न देख्या नैन भर, कंठ न लागी धाइ।
सूती नहीं गल बाँह दे, बीच हि गई बिलाइ ॥ 5 ॥
सुरति पुकारै सुन्दरी, अगम अगोचर जाइ।
दादू विरहनी आत्मा, उठ उठ आतुर धाइ ॥ 6 ॥
साँई कारण सेज सँवारी, सब तैं सुन्दर ठौर।
दादू नारी नाह बिन, आण बिठाये और ॥ 7 ॥
कोई अवगुण मन बस्या, चित तैं धरी उतार।
दादू पति बिन सुन्दरी, हाँडै घर-घर बार ॥ 8 ॥
अन्य लगन व्यभिचार
प्रेम प्रीति सनेह बिन, सब झूठे श्रृंगार।
दादू आतम रत नहीं, क्यों मानै भरतार ॥ 9 ॥
दादू हौं सुख सूती नींद भर, जागै मेरा पीव।
क्यों कर मेला होइगा, जागै नांही जीव ॥ 10 ॥
सखी न खेलै सुन्दरी, अपने पीव सौं जाग।
स्वाद न पाया प्रेम का, रही नहीं उर लाग ॥ 11 ॥
पंच दिहाड़े पीव सौं, मिल काहे न खेले।
दादू गहली सुन्दरी, क्यों रहै अकेले ॥ 12 ॥
सखी सुहागिन सब कहैं, हौं री दुहागिन आहि।
पिव का महल न पाइये, कहाँ पुकारूँ जाहि ॥ 13 ॥
सखी सुहागिन सब कहैं, कंत न बूझै बात।
मनसा वाचा कर्मणा, मूर्च्छ मूर्च्छ जीव जात ॥ 14 ॥
सखी सुहागिन सब कहैं, पीव सौं परस न होइ।
निशवासर दुख पाइये, यहु व्यथा न जान कोइ ॥ 15 ॥
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