सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-पारिख का अंग 27
पूरण ब्रह्म विचारिये, तब सकल आत्मा एक।
काया के गुण देखिये, तो नाना वरण अनेक ॥ 17 ॥
नरबिड़ रूप पशु
मति बुद्धि विवेक विचार बिन, माणस पशु समान।
समझायां समझै नहीं, दादू परम गियान ॥ 18 ॥
सब जीव प्राणी भूत हैं, साधु मिलैं तब देव।
ब्रह्म मिलै तब ब्रह्म हैं, दादू अलख अभेव ॥ 19 ॥
करतूती कर्म
दादू बँध्या जीव है, छूटा ब्रह्म समान।
दादू दोनों देखिये, दूजा नांही आन ॥ 20 ॥
कर्मों के वश जीव है, कर्म रहित सो ब्रह्म।
जहँ आत्म तहँ परमात्मा, दादू भागा भ्रम ॥ 21 ॥
पारिख अपारिख
काचा उछलै ऊफणै, काया हाँडी मांहि।
दादू पाका मिल रहै, जीव ब्रह्म द्वै नांहि ॥ 22 ॥
दादू बाँधे सुर नवाये बाजैं, एह्वा शोध रु लीज्यो।
राम स्नेही साधु हाथे, वेगा मोकल दीज्यो ॥ 23 ॥
प्राण जौहरी पारिखु, मन खोटा ले आवै।
खोटा मन के माथे मारै, दादू दूर उड़ावै ॥ 24 ॥
सांच
श्रवणां हैं, नैनां नहीं, तातैं खोटा खाहिं।
ज्ञान विचार न उपजै, साच झूठ समझाहिं ॥ 25 ॥
सांच
दादू साचा लीजिये, झूठा दीजे डार।
साचा सन्मुख राखिये, झूठा नेह निवार ॥ 26 ॥
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